Wednesday, April 29, 2020

इरफान खान।

Tribute to irrfan khan death poem written by Rajnish BaBa Mehta 

कैसे कहूं, क्या कहूं
तुम लफ्जों में, सिमट ही नहीं पाते। 
उम्र तो बस एक भरोसा था 
तुम्हारे साथ लंबे सफर की
मगर बीच राहों में छोड़ यूं 
अनजान राहों पर गुम क्यों हो गए ?

अभी तो हमने ख्वाबो के परिंदे गिनने ही शुरू किए 
अभी तो हमने तुम्हारी बड़ी-बड़ी आंखों से 
छोटी दुनिया में झांकना ही शुरू किया
तुमने उन बड़ी बड़ी आंखों को बंद क्यों कर लिया। 
उम्मीदों भरे एहसास को डिब्बी में बंद क्यों कर दिया।

मुझे पता है तुम कभी लौट कर ना आओगे 
भरोसा नहीं होता तुम अकेले ही सफर पर निकल जाओगे।
तुम खुद ना सही मगर अपनी रूह का एहसास हर पल कराओगे, 
वादा किया था तुमने , मगर कैसे कहूं  कि तुम अब कभी ना मिलने आओगे।। 

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

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