Friday, August 31, 2018

।।भोर वाली कबाबी मुलाकात।।

Poet Rajnish BaBa Mehta 

शाम--भोर वाली साख पर सिमट गया उसकी लिहाफ़ पर 
जुगनुओं सी जागती गई, अफ़सानों की पहली फ़िराक पर 
बदन की अंगड़ाइयों तले इठलाते रहे, दोनों अपनी काली लिबास पर 
पहली मुलाकात थी बंबईया नुक्कड़ पर, वो भी कबाब की आस पर।।

वक्त का था पहरा, मेरी जुबां ना जाने किस आस में, उस पर ही था ठहरा 
उलझती जुल्फों तले, वो इज़्तिराब-सी थी, या था कोई साजिश गहरा 
मखमली सफ्फ़ाक सा बदन लिए,गुलाबी होठों पर क्या खूब सज रहा था चेहरा 
लफ्ज़ों की जुगलबंदी जिस्म में क्या पेवस्त हुई, बोल पड़ी वक्त का है थोड़ा पहरा।।

गर्दिशे-अफ़लाक की फिक्र में,छोड़ आया उसे उसकी काफ़िलों की जिक्र में
कहती रही, राहें जुदा होती रही,बोल गई लब से मिलूंगी आखिरी सब्र में 
लम्हों को गिनती थी लफ्जों पर, कारवां को कारवां ना बताती वक्त़े-सफ़र में 
अल्हड़ सी अदायगी लिए,अगर आज नहीं मिली तो कहती मिलूंगी आखिरी कब्र में ।।

विदा सी ज़ुदा हुई, नज़्मों की अलाप वो जोगन जैसे ज़ेहन में आ गई 
रागिनी गाती हुई, वो इस अफ़सानानिगार के मल्हारी सांसों में समा गई 
पिछली भोर वाली शाम की सितार, मेरी रगों में कतरा कतरा टूटती चली गई
देख रहा हूं अब भी अंधेरी कासनी स्याह रातों में, कैसे जिस्म में खोती चली गई। 

वो एक पहली औऱ आखिरी मुलाकात,उसके लिए ना जाने, क्या होगी शादमानी 
हयाते-चंद-रोज़ा समझ इस कातिब के लिए,वो बस इतनी सी है अधूरी कहानी।।

कातिब
रजनीश बाबा मेहता 
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।।इज़्तिराब-सी- बैचेन सी।।गर्दिशे-अफ़लाक - काल चक्र।।शादमानी -हर्ष।।हयाते-चंद-रोज़ा- चार दिन की कहानी।
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Thursday, August 30, 2018

।।सफर कुछ ऐसा होता है।।


Poet Rajnish baba mehta 




सफर कुछ ऐसा ही होता है
सामने सीढ़ीनुमा रास्ता होता है 
दूर बंद दरवाजे जैसी मंजिल होती है 
पैरों तले ख्वाहिश जैसा, कुछ कांटा भी होता है  

एहसास जेहन में नहीं जोश में होता है 
ख्वाब सामने मगर कुछ बेहोश सा होता है 
पा लेने की ज़िद ,खुद को जिंदा रखता है 
खो जाने पर हर लम्हा,मौत सा दिखता है  

फिर से उठने पर मन ना जानें, क्यूं घबरा जाता है 
सोच में सिहरन तो देह बात-बात पर, यूं ही कांप जाता है
कामयाब कोशिश का फितूर,फिर भी ना जाने क्यों होता है  
आखिर मौत की बात सुनकर मन एकबारगी क्यूं घबरा जाता है  

फिर से उठा हूं इस बार भी सफर कुछ वैसा ही होगा
सामने सीढ़ीनुमा रास्ता भी होगा,तो दूर बंद दरवाजे जैसी मंजिल भी होगी 
पैरों तले ख्वाहिश भी होगा, जमीन पर बिछा कुछ नुकीला कांटा भी होगा 
लेकिन इस बार जश्न जीत की होगी,रोशनी आएगी तो मौत सिर्फ शरीर की होगी। 

            कातिब 
     रजनीश बाबा मेहता

Monday, August 13, 2018

सफेद-स्याह उदासी वाला ईश्क

POET, DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA


सफेद सी जिस्म का लिबास लिए , मगर सांसों में हल्की सी आस लिए
जिंदा है जान उसकी उदास मन लिए, छोड़ फेरों की बात यूं ही चल दिए ।।
नाक़द्र बन पहलू में यूं ही सिमट जाती, हर बार नाक़ाबिल की हल्की फिक्र किए 
अज़ीम ख्वाहिश है उस ख्वाबशानी की, क्यों लेटी है कब्र पर यू हीं सफेद चादर लिए।।

हर लफ्जों में इश्क वाली शिकन हैं, मगर बातों में ना जाने क्यों उदासी लिए
छोड़ गई डगर पनघट की राहों पर, मगर आंखें चमकती रही ना जाने क्यों अश्क लिए।।
समेट लेती है संसार अपनी शब्दों में, छोड़ जाती है अधूरे अफ़साने हर लफ्जों में  
अर्जमन्द बनने का फैसला है उसका, नातर्स बन सिमटी है गोशे में, बेलिहाफ नौजवानी लिए ।।

छोड़ आया उसे सपनों के सिरहाने तले, फिर भी खोज रही है वो ख़िदमत की तलाश में ख़ुदा लिए 
आखिरात में सफेद -स्याह रक्त होगी, लंबे बिस्तरों पर अधूरी नींद तलाशेगी मौत लिए ।। 
आराईश अपनी बदन की समेट ना पाती है, इफ़्तितखार की तलाश में इनाद क्यों पालती है 
खुद की ख्वाहिश में ज़ियारत ज़ख्म समझ, इस कातिब के किस्से में हरबार क्यों चली आती है ।।
      
     कातिब 
                                                 रजनीश बाबा मेहता 


  • अर्जमन्द= महान ।।नातर्स= कठोर।।गोशा-कोना।।नौजवानी= यौवन।।आराईश= सजावट।।इफ़्तितखार= मान, ख्याति।।इनाद= विरोधता, दुश्मन।।

Saturday, August 4, 2018

।। इश्क वाली मर्सिया ।।


सदियों से दार सी है मोहब्बत, हुस्न--ज़ार के मेले में 
ख़्वाहिश--ऱाख सी है मोहब्बत,भरी जिस्मों के अकेले में ।।
खुदा का खौफ़ है, कि इबादत फंसा है फकीरों के झमेले में 
सोती रूह--राख भी रोती है, इश्क के मज़ारों पर अकेले में ।।

सुना है कैस की कब्र पर रोती है लैला, रूमी की बातों पर 
कफ़न की क़ाबू में सोई है सनम, अल्लाह की झूठी इरादों पर।।
तपती खंजर की तपिश याद है, फिर भी यकीन तेरी फरियादों पर
टूटा है जिस्म का हर कोना, लूटा है तेरे जनाज़े--जुनूं का रोना 
क़यामत क़ौम की होगी, जब परियां रोएगी मोहब्बत की लाशों पर।।

बीत गई बातें, गुजर गई रातें, सो गई हल्की सांसें, जिस्म में बची ना आहें 
फिर भी कहता है रूमी, मोहब्बत तेरा शुक्रिया, कि तूने जीना सीखा दिया 
 मोहब्बत तेरा शुक्रिया, कि तूने हर लम्हों में मुझे मरना सीखा दिया ।।
 इबातन अगर इश्क है, तो तूने मुझे आदतन फनां होना सीखा दिया 
क़फ़स की कैद में क़ातिल होकर भी, तूने दुआओँ में रहना सीखा दिया 
शम्स लिए कब्र में सोया रूमी, कि तूने दुनिया को अकेले जीना सीखा दिया।।

लफ़्जों--लाल होगी सदियों तक, फिर भी मोहब्बत दार पर होगी सदियों तक 
ख़ुदा जब-जब ख़ामोश होगा, तब-तब फ़िदाई राह सी ढ़ूढ़ेगी तूझे सदियों तक ।।
नंगे पांव वाला क़ाफिला तो होगा ,लेकिन नफ़्स तलाशेंगे तूझे,आखिरी रूह की गुलामी तक 
खोज लेना मर्सिया मौत की जिंदा जिस्म लिए, वरना इश्क रोएगी अपनी आखिरी मौत तक ।।

                                                                                                कातिब 
                                                                                              रजनीश बाबा मेहता
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दार-फांसी।।कैस-मजनूं।।रूमी-महान उपदेशक।।क़फ़स-पिंजरा।।फ़िदाई-प्रेमी।।मर्सिया-शोक-कविता ।।

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