Tuesday, April 7, 2020

।।गांव का रस्ता।।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish Baba Mehta


छोटे शहरों की जिंदगी का अजीब सा फ़साना है, 
ढ़लते सूरज की धूप का अपना ही अफ़साना है ।।
लौटते कदमों की आहट लिए, घर पहुंचने की जिद है,
ज़ेहन में एक ही बात की फिक्र है,मां का आंगन जो सूना है।।

गुजर गया दिन फिर भी क्यों लगता है कुछ ना कुछ भूल गए हैं 
अंधियारे में मन क्यों सोच रहा, कुछ ना कुछ काम था जो रह गए हैं। 
खड़ी खाट जो जमीन पर गिराया,मानों उसके टूटे पांव फिर से टूट गए हैं,
रसोई में अम्मा चौबारे पर बाबा, लगता है दोनों फिर से रूठ गए हैं।।

धीमी आंच पर बनते रिश्तों की सारी खुशबू एक साथ आए हैं,
चढ़ती चांदनी तले मानों दुआरे पर बिखरी रोशनी भी पैगाम साथ लाए हैं।। 
सूनी गलियों से अकेले गुजरने वाले, फटी जेब में खुद के साए साथ लाए हैं,
छप्पड़ के एक ही कमरों में सब सोए हैं, मानों मकान नहीं अपने घर आए हैं। 

बरसों-बरसों से था दिलों में जो बसता, सीने में कभी ना था वो सस्ता
शहर की सकरीं गलियों में जिसे भूल ना पाया,था वो अपना गांव का रस्ता।।
सारी हसरतें पूरी कर जब आंख खुली, बस चल पड़ा उठा के अपना बस्ता,
नए सफर की शुरूआत होने लगी, आखिरकार था भी तो वो अपने गांव का रस्ता।।

कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता

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