Thursday, February 1, 2018

।।मगरूर मोहब्बत।।

Poet, Writer, Director Rajnish BaBa Mehta

सब कुछ कह दिया, दिल--अंजाम से पहले-पहले
मगरूर थे मोहब्बत में हम, नाकाम से पहले-पहले।।
सर्द रातों में चादर का कोना लपेटे लेटे रहे 
धीरे धीरे धड़कने बंद होने लगी, सुबह की शाम से पहले-पहले।।
अब जीने नहीं देती तेरी रूसवाई 
मेरी ख्वाहिश को जगा दे, मेरे मरने से पहले-पहले।।

फिक्र ही फिक्र तो किया था, खुद के जिक्र में इक रोज 
गेसू तले सोती सिसकती रही, पामाल सी थी वो उस रोज ।।
बहते रक्त की रंजिश ना थी, अब बस खामोशियां है हर रोज ,
वादा है ये तूझसे, अल्फाजों में अब ना उलझाउंगा किसी रोज ।।
आखिरी ज़नाजे की ज़ियारत--जिक्र जैसी महफिल तो होगी
लेकिन आंसूओं में डूबी बारात ना होगी, बस तन्हा हमरात होगी हर रोज।।

इश्क अश्कों में छुपाकर, ज़फा-ए-जीत से मिली पहले-पहले
ले जाउंगा तेरी शहर से वो यादें, जो मिली मुझे उम्र से पहले-पहले 
छोड़ ये आखिरी ज़ेहन, खो जा मेरी आगोश में सिमटने से पहले -पहले 
दस्तक बेधड़क होने लगी है अब, सीधी छत के छोटे दरवाजों पर,
लो,
अबस होने लगी बंद ज़ुबां,बंद होने लगी आंखें, तेरी मौत से पहले -पहले ।
आना कभी मेरी कब्र के सिराहने तले, इश्कज़दा होना मगर रोने से पहले-पहले।।

क़ातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

शब्दार्थ
।।गेसू= लटाएं, केशों के छल्ले।।पामाल= पैरों के नीचे कुचला हुआ।।जफ़ा= अन्याय।।ज़ियारत= तीर्थयात्रा।।

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