Saturday, May 13, 2017

।।मिल के भी मुलाकात ना हो पाएगी ।।

Rajnish BaBa Mehta Director Fillum


मिल के भी मुलाकात ना हो पाएगी 
दिल मे जो बात थी वो जज्बात ना हो पाएगी। 
गम़्माज़ों के शहर में तेरी-मेरी हमरात ना हो पाएगी 
तू चल उल्टे पांव कभी सीधी गलियों में बुरक़े तले 
आखिरी छोड़ पर तूझे शम्मा के अलावा आंखे ना देख पाएगी।।

उंगलियों पर आरजू गिनते-गिनते, मिलूंगा इब्तिसाम भोर से पहले- पहले
आराईश तेरे बदन की देखकर सोच लिया, ख्वाहिश होगी शाम से पहले- पहले।।
खुश हुआ गुमशुदा मेरा दिल, कि तूने अश्क को पलकों पर छोड़ वफा किया तूने 
सोचज़दा की ज़द में बैठा हूं, लोग कब्र तक पहुंच जाते हैं अंजाम से पहले-पहले।

सामने ख्वाब पड़ी है,मलंगियत इश्काना का, छोड़ ना पाउंगा तूझे मौत से पहले-पहले
हौसला दिया ज़हीर बनकर रकीबों के सामने, कि मोहब्बत निभा दिया तूने
वरना लोग लहू से लाल हो जाते है, अंजाम--इश्क के इन्क़िलाब से पहले- पहले
दुहाई देंगे तेरी-मेरी मजनूयत की,जिक्र होगी हर चौराहे पर इतिहास से पहले-पहले।। 

लो चला मैं अब, मिल के भी मिल ना पाएंगे हम, मुलाकात से पहले-पहले
चांद लहराया गगन में, बात करके भी बात ना हो पाएगी, हमरात से पहले-पहले।।

क़ातिब 
रजनीश बाबा मेहता 


।।गम़्माज़= चुगलीबाज।।इब्तिसाम= मुस्कुराहट।।आराईश= सजावट।।ज़हीर- दोस्त।। रकीब- दुश्मन।।इन्क़िलाब= क्रान्ति।।

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