Sunday, April 16, 2017

।।मेरा जिस्म साधू ना होगा।।


इश्क भी एक रोग है, जिस्म का नहीं, जे़हन में बैठा
तेरा मेरा एक जोग है, तुझसा ही सही मुझमें सिमटा
गलियों के किस्से बन गए, मेरी कहानी तुझमें लिपटा 
भला हम मानते कब थे, जो तुम सब कुछ जानते थे
तुम छोटी सी गजल में, लेकिन वो सितारों की पनघट पर थे
तुम धीमी आहटों में , लेकिन वो चाहतों की सन्नाटों में थे।।
उसे मालूम ही कहां था, तेरी सांसों की सिवलट पर हमआयल की
मैंने ज़िक्र ही कहां किया ,तेरे होठों की गुलाबी मुस्कुराहट की
तेरे आंखों की इशारों से जो हुआ जिस्म बेपर्दा घायल की
वो सफ्फाक सा संगमरमरी बदन लिए, तू मुझमें कैसे पेवस्त की ।।
तेरी जुल्फों की अंगड़ाई, तेरी पाजेब की रंग मेरे माथों पर घर कर गई
फिर भी ना मेरा दिल बेकाबू होगा, ना ही मेरा जिस्म साधू होगा
तेरी-मेरी गलियों की आखिरी छोड़ पर, ना तेरा निशां होगा ना मेरा शमां होगा
बस यादों के पन्नों पर, बिखरे लफ्जों की तरह, दो शब्द तेरा होगा, दो शब्द मेरा होगा।।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

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