Thursday, July 11, 2019

।।सारी दुनिया उसकी लिखी हुई एक आखिरी साजिश है।।

Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 


सारी दुनिया उसकी लिखी हुई एक आखिरी साजिश है 
रेंगती राहों पर ये जिस्म मानो उसकी बरसों की ख्व़ाहिश है ।।
अब तो टूटते हैं बदन लगता है मौत से पहले की आजमाईश है,
ख्व़ाबों के खाक तले, माथे पर चांद लिए, ये खुदा की कैसी आराईश है।।

मन सोचता संयोग से वियोग में तराफ कर हर हर्फ़ मिट जाएगी 
खुले दरवाजों की सांकल तले बैठा है, जैसे रूह पल में सिमट जाएगी।।
सारी दीवारें सियाह हो गई,अब वो लाल लफ्ज तक का रास्ता यूं ही कट जाएगी 
गुजर गया ज़माना गले लगाए हुए,अब तो उसकी साजिशों के तले अंजाम भी भटक जाएगी।।

मन सोचता है, कि फ़ैज अपनी कब्र पर कौन सी मर्सिंया किसे पैगाम कर रहा होगा 
भरी जुगनुओँ की भीड़ में फ़िराक़ सुपुर्द-ए-ख़ाक होने पर भी किसकी फिराक में होगा।।
वो इलाहाबाद का अकबर ना जाने किससे कल्त की बात कर आह भी ना भर रहा होगा 
साजिशों की साज तले वो बादल ना जाने कल किसकी गुनाह पर आंसू बहा रहा होगा ।।

कब्र की कैद में जकड़े हजारों शायर, हुजूर की लिहाज में ना जाने किसका लिफाफा लिख रहा होगा 
धुआं बनकर उड़ते दिनकर ना जाने कुटुंब कृष्ण से महाभारत का कौन सा गूढ़ रहस्य समझ रहा होगा ।।
संगम में सोए सूर्यकांत निराला,इलाहाबाद के पथ पर टूटते पत्थर की आवाज में मर्म ही ढ़ूंढ़ रहा होगा 
इमरोज की पीठ पर सोई अमृता को, साहिर ना जाने कौन सी सूनी दुनिया में अकेले तलाश रहा होगा ।।

अरसों से बरसों तक बेबसी का ये अजीब सा आलम है , 
खुदा से रिश्ता-ए-हस्ती की फिराक में मौत ही मयस्सर मातम है ।।
खुद को आजमाउंगा मैं भी उसी रोज,जब इल्म होगा कि यही आखिरी ख्व़ाहिश है 
देखूंगा नज़र से, कि कैसे सारी दुनिया उसकी लिखी हुई एक आखिरी साजिश है ।।

कातिब & कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 

Friday, June 7, 2019

।। तू कभी ख़फ़ा ना होगी।।

Writer, Director Rajnish BaBa Mehta 

बंद आंखों वाली अकेली अल्हड़ इश्क़ है जो कभी ख़फ़ा ना होगी 
खुली आंखों से जो देखूंगा ख़्वाहिश को वो कभी बेवफा ना होगी ।।
शाख--गुल को जला दी उसने, जो हर हर्फ़ तले कभी दफा ना होगी
शहरे--राख से आबाद हुआ जिस्म, कि कोई कब्र अब ख़फ़ा ना होगी।।

स्याह धुंधली धुंध के तले ख्वाहिशों के मोड़ पर अब उमर-उमर की ही बात है 
लाल जिस्मों तले तुझे देखकर ऐसा लगा मानो बचपन से फिर मुलाकात है ।।
रब का वास्ता है तुझे छोड़ आना फिर मुझे उसी अधजली गलियों के मुहाने तले ,
जब आखिरी रात बीतेगी तब एहसास होगा उस रोज भी कि मौत की ही तो बात है ।।

फकीरों सा नाउम्मीदी का दिल लिए अब एहसास वाला सफ़र नाकाम ही तो है 
सदियों से लंबी मगर सोई है शाम वाली हसरतों के तले वो बेज़ुबान शाम ही तो है।।
इक फुर्सत--गुनाह के पैमाने पर चलते-चलते थक सा गया वो पांव वाली पयाम ही तो है
देखा है झरोखों से मर्सिया गाते उसे, पहचानने की फिराक़ में उमर गुजर गई मगर वो राम ही तो है ।।

सोच आउंगा तेरी समंदर सी सिराहनों को जो तू अब कभी ख़फ़ा ना होगी 
राह--मंजिल के दरम्यां समेट लूंगा तूझे आगोश में जो तू अब कभी बेवफा ना होगी।।
जलाउंगा तेरी ज़िद में जिस्म को, जो तू अब कभी खुद की मौत के बाद भी दफा ना होगी 
मेरा शहर रूह--राख तो होगा, लेकिन नफ़्स(आत्मा) की आंसू तले तू अब कभी ख़फा ना होगी ।।

कातिब & कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, May 9, 2019

।।गुजारिश बीती बात की, गुजारिश जज़्बात की।।

Poet, Writer, Director Rajnish BaBa Mehta


गुज़ारिश बीती बात की नहीं, गुज़ारिश इस बार जज़्बात की है 
ख़्वाब तले जो लफ़्ज़ समेटे हैं, बात उन लफ्जों के बरसात की है ।।
सीधी उँगलियों से खिचीं है टेढ़ी लकीरें, उन लकीरों पर अब थोड़ी घात सी है 
संकरी गलियों में खड़ी है सामने, ना जाने क्यूं लगता अब वो आखिरी मुलाकात सी है ।।

रूख़सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ के शामों में बुझती शमाओं की फ़ितरत भी अजीब है
मेरे फिगार-ए-बदन तले बुझते दीयों में दिखता आज मेरा सूर्ख लहू कुछ-कुछ ग़रीब है।। 
जुमलों की नुमाईश है,आखिरी शौक़ की आजमाईश है, फिर भी गले में क्यूं सूखा सलीब है
मुर्ग़-ए-बिस्मल की मानिंद जनाज़े के क़रीब लेटा है, खुदा की ख़ैर तले फिर भी तू मेरा आखिरी रक़ीब है।।

तंगदस्ती के मौसम में सोच लेता सच्चे फ़क़ीर-ए-साज तले, 
खुद को ढ़ूंढ़ लेता दर्द की बारगाह में कभी मेरी आवाज तले।।
खानक़ाह की ज़द में खड़ा था,परियों जैसी हुस्नों-ओ-फ़क़ीर के मेले में
अल्लाह से आखिरी इबादत की है, क़यामत वाले रोज ना फसूंगा तेरे झमेले में। 

काग़ज़ों के किनारे काली स्याही की शक में ज़िंदा रहूंगा तेरी संवेदनाओं के सहारे
मोल सिर्फ जिस्मों का होगा, चर्चा सिर्फ जम्हूरियत में होगी, जब बहेगी राख गंगा किनारे।।
तेरी आखिरी पैगाम पर क्यूं आया, कोसता हूं यतीम लहू को, अब जो सफेद चादर लिए ज़र्द रात पुकारे
उम्र-ए-रफ्ता की फिक्र में गुजर गई गलियों के गोशे में जिंदगी, अब ना बैठूंगा कभी ख़ुदगर्ज ख़ुदा के सहारे ।।

लो चला मैं अफ़सुर्दा अफ़सानों की फ़िराक में , बातें ना अब कभी होगी सुराख में,  
इस बार फिर गुजारिश बीती बात की नहीं, होगी आखिरी गुजारिश तेरी-मेरी जज़्बात में ।।
सीधी उंगलियों से जो खिचीं होगी टेढ़ी लकीरें, उन लकीरों पर चर्चा ना होगा कभी घात में , 

फरिश्तें तो सदियों से बैठें हैं इस फिराक में, कि कुछ तो बात होगी तेरी-मेरी आखिरी मुलाकात में।। 

रूख़सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ - प्रेम के कारवां की विदाई।। फ़िगार-ए-बदन - ज़ख़्मी शरीर ।।सलीब - सूली का चिह्न।।मुर्ग़-ए-बिस्मल- घायल परिंदे की तरह ।। रक़ीब - दुश्मन ।। तंगदस्ती-दरिद्रता ।।खानक़ाह-सूफ़ियों का आश्रम ।।उम्र-ए-रफ्ता -बीती हुई उम्र ।।गोशे- कोना।।

कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता 

Saturday, April 13, 2019

।। हिम्मत ना हारेगी तरल हार ।।

poet, Writer, Director Rajnish BaBa Mehta

शिखर सोच की है, सफर सांसों की बेतरबीब सी बिखरी हुई, 
तमन्नाएं होश की है, जो राहों में हौसलें अब यूं ही गिरवी हुई ।।
हर पल हार का ज़िक्र है, मगर ज़ेहन में जीत अब भी सिमटी हुई, 
वक्त की है थोड़ी आजमाईश, जो आराईश कहानियों पर टिकी हुई ।।

सांझ की कोलाहल तले बिखरती ज्योति ना जाने अब क्यूं घनी हुई, 
काले घुमड़ते बादलों के बीच छोटे तारों जैसी ना जाने सोच अब भी क्यूं फंसी हुई।।
मांझी के पतवारों के बीच निर्जन सागर की कोलाहल तले क्यूं खड़ी हुई 
चित्र-पट की माया पर सोचता हूं, ना जाने क्यूं मेरा सत्य सफर में उलझी हुई।।

भोर वाली सवेरा हुई जागो जीवन के प्रभात हिमनद पर खड़ा हूं मैं 
खो गया था विश्वास, लौट आया जीवन का श्वास जो दीवारों पर टिका हूं मैं ।।
अब हर पल्लव पुलकित होंगे, आशा मेरे अंकुरित होकर जो झूमेंगे 
देख लेना माली, हर उपवन की क्षितिज पर अब कोई ख्वाब ना टूटेंगे।।

कसक कूक सी उठेगी, जो काली आंखों वाली अंधकार पर होगा वार -प्रहार
मद चेतना जागेगी , मधुर व्यथा लिए शून्य चीर पर बनाएगी अपना आकार।।
सपनों के बादल फिर बुनेंगे जो मिलेगी रात के अंधियारों तले कहानीबाजी का दुलार

हर हौसलों तले अबस जीत का जश्न होगा, हारेगी ना हिम्मत अब कभी तरल हार।।

कातिब कहानीबाज & सिनेमाई साधू
रजनीश बाबा मेहता 


Saturday, March 23, 2019

।। मुझे जोगी ही रहने दो।।

Poet, कहानीबाज & सिनेमाई साधु & Director Rajnish baba Mehta with marry kom 

एक कहानी कह लेने दो 
वो आखिरी निशानी छू लेने दो ।। .
इस बार प्यार नहीं, परिभाषा बदलेगी 
बस उसके जज़्बातों को लबों से छू लेने दो ।। .

सफर में अगर कभी रात होगी, तो होगी रोशनी
उस चाँद को अपनी चांदनी तले, सूरज को छू लेने दो ।। .
महफ़िल लगी है सरेबाज़ार चैराहों पर लफ्फाज़ी की 
आखिरी लफ्ज़ की तलाश में, अब उस नापाक इश्क़ को छू लेने दो ।। 

सूर्ख धागों से बुनी लिबासों लाल की लालच नहीं है मुझमें
जो किरदार पसंद है मुझे , हर पल मुझे उसी में रहने दो।।
ये तो वक्त की बेवक्त आवाज है, वरना हम भी जागते जोगी हैं,
क़यामत--खाक़ गुजारिश है तुझसे ,कि मुझ जोगी को जोगी ही रहने दो।। 

ये लम्हा तो वक्त के पल दो पल की बस आजमाईश सी क्षणिक है
फिसलती रेत की जैसी अपनी आवाज तले,अब मुझे मेरे ख्वाबों में जीने दो। 
पता है मुझे खुद के सांसों की, जो हवाओं के परों पर खूब पलती है 

सुनहरे सपनों की चादर तले रोज सोता हूं, कि अब मुझे मेरे हक़ीकत में जी लेने दो। 


कातिब &कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 







Tuesday, March 12, 2019

।।खुद की आजमाईश।।

Poet, Writer & Director Rajnish BaBa mehta 


दो लफ्जों वाली सुनी-अनसुनी बात है, 
शायद आज खुद से आखिरी मुलाकात है।।
रोती राहों में ढ़ूंढ़ती तमन्नाओं की अकेली आस है,
ना जाने क्यों जिंदगी लगती बाजी की आखिरी बिसात है।।

सोच के परों पर साहिल समंदर तले सिसकती सांस सी है 
जो उठी है लहर रेत तले वो लौ जैसी भभकती फांस सी है ।।
बोझिल कदमें ,बोझिल लम्हें झुलसती हवाओँ में कहती काश सी है,
ये आऱाईश वक्त की जो ठहरा है रक्त में वो कैसी आजमाईश सी है । 

गलियों से गुजरती शाम वाली भोर तले, शक क्यों है खुद की साख पर
बहार-ए-हिज़्र में तौला है खुद को, फिर भी ना जाने क्यों खड़ा हूं राख पर।। 
दिल दिलासाओँ के भंवर में तैर रही, फिर भी तमन्नाओँ वाली बात क्यों खाक पर। 
ना कोई दवा है ना कोई मशवरा-ए-दुआ है, फिर क्यों खामोश हूं खुद की फिराक़ पर ।। 

सफ़र की सोच तले अब सजा रहा हूं खुशी चेहरे पर 
जो काफ़िया ग़म का कभी गोशे में उभरने ना दिया ।।
गुज़रे ज़माने की बात कर, हर लम्हों को यूं ही खराब ना कर 
क्योंकि ख्वाहिश वाली मसर्रत जिंदगी को उस पल जो संवरने ना दिया ।।

ख्वाबों वाली अब भोर भी होगी, ख्वाहिशों वाली अब शोर भी होगी , 
अंधेरी कासनी रातों तले जो गिरे आंसू, वो भोर में उम्मीदों वाली सैलाब होगी। 
सफर सोच की हर पल ज़िंदा जैसी होगी , गरीबी में भी अब गुरबत वाली बातें ना होगी। 
मकाम जब जश्न की होगा, तो रोशनी तेरे घर भी होगी , रोशनी मेरे घर भी होगी।।

कातिब & कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता  

Sunday, March 3, 2019

।।कब्र वाला मंदिर।।

POET, WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA

हर साख वाली गुरूर जहां राख हो जाती है 
जहां हर सख्त वाली तख्त भी भंवर हो जाती है ।
महलों की जागीर यहां , मनहूस मातम मनाती है 
कब्र की जद में लेटे हैं , ख्वाबों को अब भी समेटे हैं।
किस्मत का फेर है कि, यहां कब्र भी मंदिर कहलाती है ।।

मासूम मखमली बदन तले लपेटकर, सदियों के लिए सोए हैं 
अपनों की भीड़ में लेटे हुए, ना जाने क्यों पूरी दुनिया से खोए हैं । 
ख्वाहिश-ए-ख़ाक हुई, जिस्म राख हुई, फिर भी अकेली आंखे जो रोए हैं
जली है चिताएं चौबारे पर बारी बारी, फिर भी बीज ना जाने क्यों बोए हैं ।
किस्मत का फेर हैं कि धूप तले आज भी, यहां कब्र ही मंदिर तले सोए हैं ।। 

कभी जो गुरूर गौरव था , कभी जो गुरूर आन था, कभी जो गुरूर गान था
अब सूखी मिट्टी तले वो गुरूर, श्मशान में बस सोती सिसकती शान था ।
महलों तले कभी इठलाती जिंदगी, अब वो मौत के सामने सिर्फ अपमान था, 
काश रोक लेता लम्हों को, रोक लेता सांसो को, जो आखिरी समर तेरा शेष था।  
किस्मत का फेर है कि, उस वीरान में अकेला तेरा कब्र , रूठे मंदिर जैसा ही था ।।

जो खुला घर छोड़कर जाएगा , ना कभी तू लौट कर आएगा 
सख्त वाली तख्त कि फिराक में, अब कभी पैबंद ना तू लगा पाएगा ।
सदियां शौक से सुनेगी तेरी दास्तान, जो तू अब मिट्टी का मूर्दा हो जाएगा 
जिंदगी की बिसात पर, चली है मौत आखिरी चाल, जब फिरदौस भी फना हो जाएगा ।
किस्मत का फेर है, कि फिर भी तेरा वो वीराने वाला कब्र,  मंदिर ही कहलाएगा  ।।

कातिब &  कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 




नवंबर 2018 में गोल्डन सिटी जैसलमेर की यात्रा के दौरान कई कहानियों को तराशने की फिराक में था। हालांकि अपने सबसे बेहतरीन दोस्त के साथ जैसलमेर में एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था, और इसी बहाने मुझे कहानीबाजी करने का मौका मिल गया। फिर क्या था जैसलमेर की हर गलियों की धूल मेरे पैरों पर चिपकती चली गई। हर गली में कोई ना कोई महल, औऱ उस महल के पीछे उसकी अनगिनत दास्तान। कुछ सुनी-सुनाई तो कुछ अनसुनी कहानियां अपने झोले में समेटते जा रहा था। इसी दौरान मैं एक ऐसे जगह पर जा पहुंचा जहां सिर्फ और सिर्फ मंदिर के गुबंद बने हुए थे और नीचे छोटा चबूतरा। एक पल के लिए तो लगा कि मंदिरों का शहर है कहानियां तो इसके पीछे होगी जरूर, लेकिन पता चला कि वो मंदिरों का शहर दरअसल जैसलमेर राजघराने का श्मशान घाट था । कितनी अजीब है मौत की परिकल्पना, औऱ कितने अजीब हैं उसके रिवाज। सोचने पर कभी कभी दम घुटने लगता है क्योंकि कुछ इंसान अपनी मौत में भी जिंदगी देखता है। मरघट में भी राजसी अंदाज में जीने की परिकल्पना करता है, लेकिन शायद उसे पता नहीं कि लिबास कोई भी हो, शरीर का आखिरी अंजाम मिट्टी ही है।  


JAISALMER YATRA ।।कब्र वाला मंदिर।।

Sunday, February 10, 2019

।।ख़त तेरे लिए।।

poet, writer & Director Rajnish BaBa Mehta 



जमाने बाद लिखा खत, मैंने आज
पुरानी गलियों के दरवाजे से बाहर निकला आज
कुछ रिश्ते पीछे छूटे , छूट गया कुछ पुराने दोस्तों का मेला 
जिसके साथ खेला था, मैंने नंगे पांव ज़िंदगी का खेला।

सब्र के लिए शुक्रिया कहा औऱ आंसू लिए निकल पड़ा
चंद कदम बाद अहसास हुआ, शरीर ही तो है आत्मा थोड़ी ना निकल पड़ा ।
पहली बार लगा, मेरे शब्दों की आवाज थी नहीं आज
काश बिना बोले समझकर, मुझे शुक्रिया ही कह देते आज।।

ना कोई गिला है ना कोई शिकवा है, बस थोड़ी रिश्तों की बेबसी है
लेकिन कहीं पहुंचने के लिए ,कहीं से निकलना ,ना तेरी ना मेरी बेबसी है।
उम्मीदों की आंच पर, वादा है मेरा, दुआओं में नहीं हकीकत में होगा साथ
नए रास्ते, नई सोच, नए सपने, नई ख्वाहिशें लिए ढ़ूंढ लेंगे गोशा फिर तेरे साथ।।

।।गोशा - कोना ।।

साथ देने के लिए शुक्रिया
क़ातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता

Sunday, February 3, 2019

।।अफ़सोस ढ़लती उम्र का ।।

Writer, Poet, Director Rajnish BaBa Mehta 

तारीख़ों की तफ्तीश में अब उमर आग सी लगती है, 
जश्न कभी ज़िंदगी,इश्क की तलाश में, अब फाग सी लगती है ।
ख़्वाहिश खोखली हुई हर गोशे में, क़दमों तले रास्ते लाल सी लगती है,
ख़्यालों की सतरंगी धुन है, मगर वो पाज़ेब की धुन अब भी राग सी लगती है ।।

शिकायत शिकवों से नहीं, शिकायत लम्हों से नहीं, 
हर पन्नों पर बिखरे लफ़्ज़ों जैसी, शिकायत सांस सी लगती है। 
जो मिला है हसरतों से हसरतों में, अब उनसे गुजारिश नहीं होती, 
बीते आइनों की शक्लें धुंधली सी है, आज भी वो मेरे जिस्म में जिस्म सी लगती है।।

वक्त की आड़ में सफ़र सोच सी नहीं, एक उमर सी लगती है, 
किसी का बेहद-बेपनाह अकेलापन, वो आखिरी मोहब्बत सी लगती है ।
जो खो गया वो वक्त की तफ्तीश सी थी, मगर मलाल दिल में ज़हर सी लगती है,
गुजरे वक्त में भी पाने की तमन्ना तो है, लेकिन बालों को देख,जिंदगी एक उमर सी लगती है । 


सफर पीछे का है जनाब , अब बढ़ते कदम अफ़सानों सी क्यों लगती है,
फिर से जवां होने की खातिर, उस आने वाली बुढ़ापों से डर क्यों लगती है ।।
हर वक्त के पहर दर पहर में , अबस मौत की सोच कुछ इस कदर लगती है, 
अफ़सोस इश्क को पाने की नहीं , अब अफ़सोस ढ़लती उमर की ही लगती है।।


कातिब, कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, January 17, 2019

।।अब ज़ुबान मजबूर ना होगी।।

POET, WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA



अपनी मशरूफ़ियत में मगरूरर थे, मगर जनाज़े से पहले जिंदा जिस्म लिए मजबूर क्यों 
हुनर हौसलों की उड़ान पर गुरूर में थे, मगर शाम वाली रात से पहले मजबूर क्यों ।। 
संवेदनाओँ वाली लहू आंखों में लाल से थे, मगर आंसू से पहले काजल मजबूर क्यों,
रंजिश ज़ेहन में, जागती जिस्म को जगाते थे , मगर ज़ुबान आज खुद से मजबूर क्यों ।। 

गुजरते वक्त को ज़ेहन में झंझोर सा दिया, आज़िम आदत मानो मेरी हंसी पर रो सा दिया 
वक्त के पैमाने में खुद को बंद कर बैठा हूं, वो जवानी मानो मेरी मजबूरी पर रो सा दिया ।।
खुदगर्ज़ी की खोज में ख्वाहिश ख़ाक सा कर दिया, झूठे लिबासों में जिस्म आज रो सा दिया
बांध कर बेड़ियों में चेहरा सियाह ज़र्द सा कर दिया, भरी महफ़िल में हालात हुस्न पर रो सा दिया।। 

गोशे में बैठा हूं गिला गुलशन से नहीं, आक़िबत की फिराक में अर्जमन्द आक़िल से कहता हूं 
लम्हों की है थोड़ी आजमाईश ,अब तुझसे नहीं, बादलों में बसी आफ़ताब की रोशनी से डरता हूं।।  
ये जो वक्त तेरा है, वो वक्त जो मेरा नहीं , सामने खड़े ज़फर से अब गुज़ारिश नहीं तल्ख़ कहता हूं 
मर्यादा मान की होगी, सम्मान मेरे अभिमान की होगी, ज़ुबान अगर जली तो जिस्म राख सी होगी 
आखिरी लफ़्जों की बारिश है, सफर मर्ज़ी का आवारामिज़ाजी है,अब ये बात तुझसे नहीं फरिश्तों से कहता हूं ।।

अबस अपनी मशरूफ़ियत फिर मगरूर होगी, जो ज़िंदा जिस्म जनाज़े से पहले मजबूर ना होगी 
हुनर हौसलों की उड़ान पर गुरूर होगी, जो शाम वाली रात से पहले मजबूर ना होगी।।
रूख हवाओं का होगा जिधर हम होंगे , जो महफिलों में अब हुस्न मजबूर ना होगी
नसीब मुसाफिर का , अब मुझसा होगा, जो ज़ुबान अब कभी खुद से मजबूर ना होगी ।। 
  

कातिब &कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता
आज़िम= दृढ़ ।। गोशा - कोना।।गिला= रोष, शिकायत।।गुलशन= फूलों या गुलाबों का उपवन।।आक़िबत= अन्त,भविष्य।।अर्जमन्द= महान।।आक़िल-बुद्धिमान।।आफ़ताब= सूर्य ।।जफ़र= विजय, जीत, लाभ।।

Sunday, December 23, 2018

।।मकबरे पर रोती है रानियां ।।

POET, WRITER, DIRECTOR RAJNISH BaBa MEHTA


गुजारिश गुलजार की है, बेबसी के सहारे 
मकबरों की मातम में है, रानी बादलों के सहारे ।।
गुजरी सदियां, गौहर की बातें अब यादों के किनारे ।
इश्तियाक़-ए-इश्क़ की फ़िराक में अब फिरदौस भी, 
फ़सानों सी वो नदिया रेत सी बनकर, चांद को रोज पुकारे ।।

रात की रंजिश बनकर शाम वाली मोहब्बत, ख़्वाब से यूं कह दे 
बंद कर आंखें ,अब तेरे क़सीदें में, हम खाक बनकर ही रह लें ।
हर गिरहों को खोल, दरवाजे पर खड़ी होकर रात से ही कह दे।
काफिला बेनसीब बनकर,  तेरे साहिल से प्यासे गुजर जाते हैं 
किसी रोज झूठे लफ्जों की बारिश पर, अपनी बदन की सारी बिसात ही रख दे ।।

खुदमस्ती की ख़ातिर अब राख भी है , आखिरी साख के सहारे 
धड़कती नब्जों में आखिरी इश्क पेवस्त है, लहू वाली आग के किनारे ।।
रोक ना पाया, तेरे जनाजे की जागीर को, फिर भी घूंघट से तूझे ही पुकारे।
कुछ कदमों की बात है, सुलगती गाह वाली बारगाह से अब मुलाकात है
लो अब जला है ज़र्द जिस्म, नंगी रूह लिए, नदियां रावी-चेनाब के किनारे ।।

लौट रहा हूं सूरत-ए-सांस भरकर , जाओ कोई उसकी गलियों के मुहाने से कह दे 
मिलूंगा उस रोज जब शक होगी सांसों पर, जाओ ये बात कोई फरिश्तों से कह दे ।
बीरान मकबरे पर अब रोती है रानियां , ये बात कोई महलों वाले फकीरों से कह दे  
रूकूंगा ना मेलों में अब मातम मनाने, रूकूंगा ना हरे दुपट्टे का शामियाना बनाने  
अब मेरा बसेरा तेरे शहर के किनारे पर होगा, जाओ ये बात कोई उसके कब्र से कह दे। ।

कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता 


इश्तियाक़= चाह, इच्छा, लालसा ।। फ़िरदौस= स्वर्ग, उपवन ।।

Saturday, November 10, 2018

।। सवाल गरीब खुदा से ।।

Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 

लफ्जों की, अगर-बेअगर लिबास होती
तो सिल देता तेरे चेहरे की सिलवटों को  
बदन की गोदराई तराशों पर यकीन होता
तो सिल देता, तेरी रूह--वफाई को ।।

अगली भीड़ वाली मोड़ पर मेरा मकसद तू नहीं तेरी ख्वाहिश है ,
अकेली रात में मेरा मिलना तूझसे नहीं, तेरी आजमाईश है ।।
झरोखों से झांकती नजर--नाश,बोलती सन्नाटों की फरमाईश है,
फरेब सी फांस है तनिक फासलों पर, लेकिन बदन की खूब आराईश है ।।

कुछ इस तरह पेश आउंगा अबकी बार 
जहां रूह--मलंगियत का जिक्र होगा हर-बार।।
जोगी जागकर कुछ कहेगा तो सब सुनेंगे 
जहां इबादती इश्क वाली खामोश बात सब सुनेंगे ।।

कभी- कभी बेअसर ख्वाहिशों में खराश ही जाती है 
छोटे सपने हो तो फिर खुद के अक्स में दरार ही जाती है।।
नादारी नादिमी बन अगर शोक है तो फिर काबा क़ल्ब हो जाता है 
ख़ानुम तेरी ख़िदमत--ख्याल से, ख़ालिश ख़लिश खामोश हो जाती है ।।

तेरे शिकवों की अब फिक्र नहीं
लेकिन मेरा जिक्र तो ऐसा ही होगा। 
टूटती बेदम सांसों पर निगाहें तो होगी 
फिर भी मेरा जिक्र पहले जैसा ही होगा ।।

जागते जोगी के ज़ख्म को जाने देना जिस्म के करीब से 
मुलाकात होगी जब पिछली वाली दरवाजों की दहलीज पर।।
 गमज़दा ख्यालों के खेल को खूब लुटने देना इस रकीब से 
लम्हों की होगी बारिश, तब सवाल पूछे जाएंगे खुदा जैसे गरीब से ।।


आराईश- सजावट नादारी= गरीबी। नादिम= लज्जाशील।क़ल्ब= दिल, आत्मा ख़ानुम(ख़ानम)=राजकुमारी ख़ालिस= शुद्ध, निष्कपट(मित्र) ख़लिश= चुभन, पीड़ा  

कातिबकहानीबाज

रजनीश बाबा मेहता 

Friday, August 31, 2018

।।भोर वाली कबाबी मुलाकात।।

Poet Rajnish BaBa Mehta 

शाम--भोर वाली साख पर सिमट गया उसकी लिहाफ़ पर 
जुगनुओं सी जागती गई, अफ़सानों की पहली फ़िराक पर 
बदन की अंगड़ाइयों तले इठलाते रहे, दोनों अपनी काली लिबास पर 
पहली मुलाकात थी बंबईया नुक्कड़ पर, वो भी कबाब की आस पर।।

वक्त का था पहरा, मेरी जुबां ना जाने किस आस में, उस पर ही था ठहरा 
उलझती जुल्फों तले, वो इज़्तिराब-सी थी, या था कोई साजिश गहरा 
मखमली सफ्फ़ाक सा बदन लिए,गुलाबी होठों पर क्या खूब सज रहा था चेहरा 
लफ्ज़ों की जुगलबंदी जिस्म में क्या पेवस्त हुई, बोल पड़ी वक्त का है थोड़ा पहरा।।

गर्दिशे-अफ़लाक की फिक्र में,छोड़ आया उसे उसकी काफ़िलों की जिक्र में
कहती रही, राहें जुदा होती रही,बोल गई लब से मिलूंगी आखिरी सब्र में 
लम्हों को गिनती थी लफ्जों पर, कारवां को कारवां ना बताती वक्त़े-सफ़र में 
अल्हड़ सी अदायगी लिए,अगर आज नहीं मिली तो कहती मिलूंगी आखिरी कब्र में ।।

विदा सी ज़ुदा हुई, नज़्मों की अलाप वो जोगन जैसे ज़ेहन में आ गई 
रागिनी गाती हुई, वो इस अफ़सानानिगार के मल्हारी सांसों में समा गई 
पिछली भोर वाली शाम की सितार, मेरी रगों में कतरा कतरा टूटती चली गई
देख रहा हूं अब भी अंधेरी कासनी स्याह रातों में, कैसे जिस्म में खोती चली गई। 

वो एक पहली औऱ आखिरी मुलाकात,उसके लिए ना जाने, क्या होगी शादमानी 
हयाते-चंद-रोज़ा समझ इस कातिब के लिए,वो बस इतनी सी है अधूरी कहानी।।

कातिब
रजनीश बाबा मेहता 
———————————————————————————————
।।इज़्तिराब-सी- बैचेन सी।।गर्दिशे-अफ़लाक - काल चक्र।।शादमानी -हर्ष।।हयाते-चंद-रोज़ा- चार दिन की कहानी।
———————————————————————————————


Thursday, August 30, 2018

।।सफर कुछ ऐसा होता है।।


Poet Rajnish baba mehta 




सफर कुछ ऐसा ही होता है
सामने सीढ़ीनुमा रास्ता होता है 
दूर बंद दरवाजे जैसी मंजिल होती है 
पैरों तले ख्वाहिश जैसा, कुछ कांटा भी होता है  

एहसास जेहन में नहीं जोश में होता है 
ख्वाब सामने मगर कुछ बेहोश सा होता है 
पा लेने की ज़िद ,खुद को जिंदा रखता है 
खो जाने पर हर लम्हा,मौत सा दिखता है  

फिर से उठने पर मन ना जानें, क्यूं घबरा जाता है 
सोच में सिहरन तो देह बात-बात पर, यूं ही कांप जाता है
कामयाब कोशिश का फितूर,फिर भी ना जाने क्यों होता है  
आखिर मौत की बात सुनकर मन एकबारगी क्यूं घबरा जाता है  

फिर से उठा हूं इस बार भी सफर कुछ वैसा ही होगा
सामने सीढ़ीनुमा रास्ता भी होगा,तो दूर बंद दरवाजे जैसी मंजिल भी होगी 
पैरों तले ख्वाहिश भी होगा, जमीन पर बिछा कुछ नुकीला कांटा भी होगा 
लेकिन इस बार जश्न जीत की होगी,रोशनी आएगी तो मौत सिर्फ शरीर की होगी। 

            कातिब 
     रजनीश बाबा मेहता

Monday, August 13, 2018

सफेद-स्याह उदासी वाला ईश्क

POET, DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA


सफेद सी जिस्म का लिबास लिए , मगर सांसों में हल्की सी आस लिए
जिंदा है जान उसकी उदास मन लिए, छोड़ फेरों की बात यूं ही चल दिए ।।
नाक़द्र बन पहलू में यूं ही सिमट जाती, हर बार नाक़ाबिल की हल्की फिक्र किए 
अज़ीम ख्वाहिश है उस ख्वाबशानी की, क्यों लेटी है कब्र पर यू हीं सफेद चादर लिए।।

हर लफ्जों में इश्क वाली शिकन हैं, मगर बातों में ना जाने क्यों उदासी लिए
छोड़ गई डगर पनघट की राहों पर, मगर आंखें चमकती रही ना जाने क्यों अश्क लिए।।
समेट लेती है संसार अपनी शब्दों में, छोड़ जाती है अधूरे अफ़साने हर लफ्जों में  
अर्जमन्द बनने का फैसला है उसका, नातर्स बन सिमटी है गोशे में, बेलिहाफ नौजवानी लिए ।।

छोड़ आया उसे सपनों के सिरहाने तले, फिर भी खोज रही है वो ख़िदमत की तलाश में ख़ुदा लिए 
आखिरात में सफेद -स्याह रक्त होगी, लंबे बिस्तरों पर अधूरी नींद तलाशेगी मौत लिए ।। 
आराईश अपनी बदन की समेट ना पाती है, इफ़्तितखार की तलाश में इनाद क्यों पालती है 
खुद की ख्वाहिश में ज़ियारत ज़ख्म समझ, इस कातिब के किस्से में हरबार क्यों चली आती है ।।
      
     कातिब 
                                                 रजनीश बाबा मेहता 


  • अर्जमन्द= महान ।।नातर्स= कठोर।।गोशा-कोना।।नौजवानी= यौवन।।आराईश= सजावट।।इफ़्तितखार= मान, ख्याति।।इनाद= विरोधता, दुश्मन।।

Saturday, August 4, 2018

।। इश्क वाली मर्सिया ।।


सदियों से दार सी है मोहब्बत, हुस्न--ज़ार के मेले में 
ख़्वाहिश--ऱाख सी है मोहब्बत,भरी जिस्मों के अकेले में ।।
खुदा का खौफ़ है, कि इबादत फंसा है फकीरों के झमेले में 
सोती रूह--राख भी रोती है, इश्क के मज़ारों पर अकेले में ।।

सुना है कैस की कब्र पर रोती है लैला, रूमी की बातों पर 
कफ़न की क़ाबू में सोई है सनम, अल्लाह की झूठी इरादों पर।।
तपती खंजर की तपिश याद है, फिर भी यकीन तेरी फरियादों पर
टूटा है जिस्म का हर कोना, लूटा है तेरे जनाज़े--जुनूं का रोना 
क़यामत क़ौम की होगी, जब परियां रोएगी मोहब्बत की लाशों पर।।

बीत गई बातें, गुजर गई रातें, सो गई हल्की सांसें, जिस्म में बची ना आहें 
फिर भी कहता है रूमी, मोहब्बत तेरा शुक्रिया, कि तूने जीना सीखा दिया 
 मोहब्बत तेरा शुक्रिया, कि तूने हर लम्हों में मुझे मरना सीखा दिया ।।
 इबातन अगर इश्क है, तो तूने मुझे आदतन फनां होना सीखा दिया 
क़फ़स की कैद में क़ातिल होकर भी, तूने दुआओँ में रहना सीखा दिया 
शम्स लिए कब्र में सोया रूमी, कि तूने दुनिया को अकेले जीना सीखा दिया।।

लफ़्जों--लाल होगी सदियों तक, फिर भी मोहब्बत दार पर होगी सदियों तक 
ख़ुदा जब-जब ख़ामोश होगा, तब-तब फ़िदाई राह सी ढ़ूढ़ेगी तूझे सदियों तक ।।
नंगे पांव वाला क़ाफिला तो होगा ,लेकिन नफ़्स तलाशेंगे तूझे,आखिरी रूह की गुलामी तक 
खोज लेना मर्सिया मौत की जिंदा जिस्म लिए, वरना इश्क रोएगी अपनी आखिरी मौत तक ।।

                                                                                                कातिब & कहानीबाज
                                                                                              रजनीश बाबा मेहता
—————————————————————————————————————
दार-फांसी।।कैस-मजनूं।।रूमी-महान उपदेशक।।क़फ़स-पिंजरा।।फ़िदाई-प्रेमी।।मर्सिया-शोक-कविता ।।

—————————————————————————————————————