Monday, March 9, 2020

।।धूप के बिना भी परछाई को चलते देखा था।





बेबसी की उस गुमनाम कासनी रातों को ख्यालों के धागों से पहली बार बांधा था,
गुम होती होश बदनाम बिस्तरों के किनारे,उन गिरहों को हर बार खुलते देखा था।।
टूटती सांसों के दरम्यां बंजर रास्तों पर चलने वाला, आखिरी सवाल थोड़ा इश्काना था,
बंद दरबाजों के तले खुलती आंखों ने , धूप के बिना भी परछाई को चलते देखा था।।

भरी दोपहरी में यादों के बिन-बयारों तले,अक्सर अफ़सानों को बिन आंसू रोते देखा था,
आसमानी आरज़ू की फ़िराक में, कई गुमनाम बस्तियों को बिन आग जलते देखा था।।
सरे-शाम जो किया अहद-ए-वफ़ा, लालिमा तले अब वो गुनाह-ए-राख सा हो गया, 
क्योंकि मस्ती-ए-पैमाने तले, खुशबू-ए-कबाओं में लम्स-ए-जनाना को पिघलते देखा था।।

मेरे शीशे में आहिस्ता-आहिस्ता ढ़लने की फिराक में, हर पल उसे बिखरते देखा था,
टूटते आइनों के कोरों से झांकती रिश्तों की गिरहों तले, हर पल उसे संवरते देखा था।।
राहों से कई रहगुज़र ज़त्थों में गुज़र क्या गए, हर झरोखों पर उसे यूं ही इतराते देखा था, 
हासिल हसरतों को लब पर लिए, ख्वाबों-ओ-नक्श की चाह में उसे आखिरी बार मरते देखा था।।

बेशमीकमती था गमहा-ए-मोहब्बत मगर फ़ुरकत-ए-यार का सब्र लिए,अब गेसू जो हवा में यूं ही लहराए,
बिन आवाज कोई तो पुकार लो इक उम्र में थोड़ी ज़िद की ज़द लिए,अब नफ़्स बादलों में यूं हीं ना ठहराए।।
शुक्र है ठिठुरन भरी सर्द रातों की, बिन तेरे साथ हाथों में लिए हाथ,अब होगी ना कोई हिज़्र की क़ासनी रात,
गर बाजी इश्क की हारी तो डर कैसा अब कब्र करीब है,जाओ मोहब्बत मातम से कह दो, यूं ही ना घबराए।। 


कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता

सरे-शाम = शाम के समय।।अहद--वफ़ा= वफ़ा की प्रतिज्ञा।।मस्ती--पैमाने= शराब के प्याले की मस्ती।।ख़ुशबू--क़बा= वस्त्र की सुगंध।।लम्से-जनाना=  प्रेमिका का स्पर्श।।फ़ुरक़ते-यार-= प्रेमिका से विरह।। गेसू -बालों की लट।। 








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