Wednesday, April 6, 2016

मस्तानों सा रेत सा अकेला ।

Rajnish BaBa Mehta
मस्तानों सा रेत सा अकेला ।

रिश्तों में आई दरार ने ,
हमें रास्तों पर ला दिया ।
ख्वाहिश थी एक जुम्बिश की,
हवाओं ने बयार ला दिया ।।
सांसों की उलझनों से,
जो सुलझाया था सिलवटों को ।
नंगे कदमों की आहट ने,
जिस्म में गुबार ला दिया ।।

पहचान बनाने में ज़िद में ,
ज़िंदगी उलझती चली गई ।
सुलझा हुआ इश्काना ,
नम आंखों में उलझती चली गई।।
मस्तानों की दुनिया में,
रह गया रेत सा अकेला ।।
झुरझुरी लिए जिस्म में,
जीना होगा अकेला ।।
          क़ातिब
  रजनीश बाबा मेहता
 फिiLLuM
rajnish-e-rajnish.blogspot.com



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