Monday, April 3, 2017

।। मैं कृष्ण रण में खड़ा ।।

Rajnish BaBa Mehta 

लफ़्ज लाल कर दे तू
मैं जिस्म लाल कर दूंगा।।
एक पल में सोच समेट ले तू 
मैं समंदर खाक कर दूंगा।।
रूह बनकर सवेरा जो उठा है
रात बनकर आजमा ले मुझे तू
चांदनी सा मैं खड़ा, अडिग अपने पथ पर पड़ा
कर रहा वार प्रहार, घने बादल के साजिश तले तू।।
छोड़ षड़यंत्रों का खेला,
खड़ा मैं रण में तेरे लिए अकेला
उठा विष, चला बाण, कर प्रहार जोर का तू
फिर भी जिस्मों के झुंड में , मुझे खड़ा अकेला पाएगा तू।
उस वक्त माफी की गुंजाईश ना होगी
क्रोध की अग्नि में अगर मैं जला ,तो तेरे सर धड़ ना होगी।
ना कोई गीतासार सुनाएगा, ना कोई विनाश का व्यवहार समझाएगा
क्योंकि बना कृष्ण मैं, तुम्हें सिर्फ सर्वनाश का मंजर दिखाएगा।।
रोक ले लफ़्ज को लाल होने से तू
रोक ले विष बाण का प्रहार तू
तो फिर ना समंदर खाक होगा
तो फिर ना रूह किसी का राख होगा।।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Friday, February 24, 2017

।। तू आक़िल नहीं ।।



RAJNISH BABA MEHTA 

राह की सरगोशियों की आवाज़ सुनी मैंनें
मेरी तारीफ़ के लफ़्ज़ तेरी ज़ुबान से सुनी मैंने
तेरे ज़ेहन की ज़ेहनियत को भी ख़ूब सुना मैंने 
सोचता हूं कि तू ऐसा क्यूं सोचता है, जैसे नहीं सोचा मैंने।।
मैं आक़िल , तेरी गिरफ़्त से क्या निकला
तू खुद अर्ज़मन्द बन, मुझे बुरा बताकर ले लिया बदला
भूल गया तू लम्हों ही लम्हों में, बातों ही बातों में सारे फ़ैसलों को
जो बदल दिया था एक रात में तेरी राहों की हर एक मुसीबतों को ।।
ना किसी बात का गिला, ना फ़िक्रमंद होकर रहता हूं
बस तेरे शब्दों के बाण से कभी कभी चिंतित हो जाता हूं ।
इस प्रवीर पथ पर मैं बिना थके, बिना रूके चलता रहूंगा
शब्दों के आग़ोश में, आफ़ताब की रोशनी में शिखर पर बहता रहूंगा।।
आक़िल- बुद्धिमान ।।अर्जमन्द - महान ।। आफ़ताब - सूर्य।।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

।।खुदा के साथ मैं खड़ा।।


राहें हुई जुदा
मयस्सर बनके खुदा
खोज लेंगे खुद को कहीं नहीं 
तन्नहाइयों तले खुदा के भीतर वहीं।।
सोचा इश्क़ का पयाम होगा दोगुना
रात कटी बिस्तर पर जैसे चाँद चौगुना ।
खुली होगी आँखें, हुआ होगा भोर का सवेरा
थोड़ी आवाज़ आई कानों में, सो जाओ बचा है अंधेरा।।
सपनों की गश्त पर फिर निकला जो हौले सा हुआ था इशारा
ढूंढने में ख़ूब लगा वक्त, मिली कड़ियां ऐसे, जैसे बना मैं बेचारा !
मुर्ग़े की बांग से डरकर, ख़ूब दौड़ा ख़्वाबों में, क्योंकि वक्त का था जो पहरा
छूट रही थी सांसे , ज़ेहन के जज़्बातों में , क्योंकि दिल का राज जो था गहरा।
आँखें खुली शर्त लगाई मैंनें हवाओं से दोनों हाथ फैलाकर
सन्न सी करती आई हवाएँ, क़ब्र के कोनों से गिरगिराकर
पांव में बन बेड़ियां, मेरी रूह को रोकने की कोशिश की वो भरपूर चाहकर
खुदा के साथ पाया मुझे खड़ा, ख़ाली हाथ लौट गया वो आख़िर हारकर।।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Tuesday, February 14, 2017

।। ज़ुबान उर्दू होनी चाहिए ।।


ज़ुबान उर्दू होनी चाहिए 
और अल्फाज़ में रूहानियत।।
ज़ेहन में ख्वाबगीर सा लंबा सफर 
तो शब्दों में ज़हर सा हो असर।।

तस्वीर तसव्वुर के करीब हो तो मज़ा है
वरना तेरी उम्र एक वक्त के बाद तेरे लिए सजा है।
सोच में सच्ची साज़, औऱ उम्मीदों में अच्छी आवाज़ हो 
तो फिर किसी के लिए फ़क्र होगे, तो किसी के लिए नाज़ हो ।।

ज़िंदगी में नुक्कड़ ना हो, तो फिर  नासमझी का सवाल नहीं 
रिश्तों की समझ ना हो, तो फिर काबिल तेरा जवाब नहीं 
तू सोच की समंदर लिए ,चलना मेरे साथ कभी 
फिर भी रौंदा जाएगा मेरे कदमों तले, बिना आवाज़ किए कभी भी।।

सोच ले , समझ ले, मेरी रूहानियत को अभी भी 
बेवक्त वक्त है तेरे पास, बना ले ज़ुबान उर्दू सी अभी भी।।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

।।ख़त तेरे लिए।।

जमाने बाद लिखा खत,  मैंने आज 
पुरानी गलियों के दरवाजे से बाहर निकला आज 
कुछ रिश्ते पीछे छूटे , छूट गया कुछ पुराने दोस्तों का मेला 
जिसके साथ खेला था, मैंने नंगे पांव ज़िंदगी का खेला। 

सब्र के लिए शुक्रिया कहा औऱ आंसू लिए निकल पड़ा 
चंद कदम बाद अहसास हुआ, शरीर ही तो है आत्मा थोड़ी ना निकल पड़ा ।
पहली बार लगा,  मेरे शब्दों की आवाज थी नहीं आज 
काश बिना बोले समझकर, मुझे शुक्रिया ही कह देते आज।।

ना कोई गिला है ना कोई शिकवा है, बस थोड़ी रिश्तों की बेबसी है 
लेकिन कहीं पहुंचने के लिए ,कहीं से निकलना ,ना तेरी ना मेरी बेबसी है। 
उम्मीदों की आंच पर, वादा है मेरा, दुआओं में नहीं हकीकत में होगा साथ 
नए रास्ते, नई सोच, नए सपने, नई ख्वाहिशें लिए ढ़ूंढ लेंगे गोशा फिर तेरे साथ।।
  
                            ।।गोशा - कोना ।।

साथ देने के लिए शुक्रिया 
    कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, February 8, 2017

।।नजरिया उम्र का नजर आया।।

POET Rajnish BaBa Mehta 



बिखर गई सारी कविताएं
रूक गया शब्दों का शोर
चलता नहीं अब स्याहियों का जोर 
ख्वाबों और कल्पनाओं का मेल रहा पूरजोर।
बीते पन्नों पर नए रंग से फिर भरना है
नए शब्दों के साथ नई लाइनों पर चलना है
छोड़ कर कहानियां फिर कविताओं के संग नाची है
रिश्तों की बेमेल बुनियादी बातों के संग फिर सोची है।
अकड़ी उगलियों में आज जान भर तो आया
उठते दवात तो थे मगर कलम कहीं नजर नहीं आया
भेजा बुलावा, दस्तक भी रोज हुई, लेकिन हरकोई था पराया
उठाके मेज के संग रखी कुर्सियां तो नजरिया उम्र का नजर आया।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, February 2, 2017

रात कोई मशवरा नहीं

रात कोई मशवरा नहीं 
दिन कभी खला नहीं 
Writer, Director Rajnish BaBa Mehta
वो शाम सी शिकस्त नहीं 
बनके नग़्म मैं, मुझमें अब नाज़िश नहीं ।।

ग़फलत में जिंदगी बेमान सी चलती नहीं 
रात के दरम्यां वो रास्तों पर सोती नहीं 
गोशा ख्वाब की थी या ख़्वाहिश गोशा नहीं 
पाने की तमन्ना में मैं, मुझसे गश़ की परवाह नहीं ।।

पूरा ख़ालिश सच है तो नादारी का डर नहीं 
सोच के साथ गैरत है तो उसे बात का फ़क्र नहीं
झांकती दीवारों के दरारों से बड़ा ख्वाबगीर मैं 
वक्त को बंद मुट्ठी में किया फिर जिक्र नहीं, नातर्स नहीं।।

वो रात कोई अब भी मशवरा नहीं 
वो दिन कोई अब भी खला नहीं 
वो शाम सी अब भी कोई शिकस्त नहीं 
बनके नग़्म मैं , मुझमें अब भी नाजिश नहीं।।  

               कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

नग़्म=संगीत का सुर । नाज़िश= घमंड, गर्व । ग़फलत= असावधानी । गोशा= कोना,एकान्तता । 
। गश़= बेहोशी,नशे में उन्मत्त । नादारी= गरीबी। ग़ैरत=शालीनता । नातर्स= कठोर हृदय।




Monday, January 23, 2017

मैं अकबर तेरे वास्ते ।

Rajnish baba mehta poet
रह लूंगा रहगुजर तेरे वास्ते 
ये सोच लेना कभी तुम मेरे वास्ते ।
सोच की आहटों तले चल-चल 
बंद कर सांसों की गरमाहट के वास्ते ।
बंद मुट्ठियों में शिकन की शिकायत ना करना 
दर्द की गिरह को पकड़ ले, सूजी उंगलियों के वास्ते। 
पहुंचना कभी मेरे ख्वाब की आतिश तले 
आखिर में पकड़ा है कलम क़ातिब, तेरे वास्ते ।
ढ़ूंढ लेना अपना मकाम अपने बख़्त को परख के 
जब भी सर उठाएगा तू, अकबर होउंगा मैं तेरे वास्ते। 
मैं अज़ल ख्वाब नहीं, हकीकत हूं सबके वास्ते। 
मैं अज़ल ख्वाब नहीं, हकीकत हूं सबके वास्ते। 

आतिश = आग, बख्त़= सौभाग्य, भाग्य,अज़ल= अनन्तकाल,


                कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, January 12, 2017

लाई है …….!


रजनीश बाबा मेहता की कविता लाई है ....!
लाई है …….!

रात रहनुमा चांदनी रात सी लाई है 
दरकते दरारों संग दीवार लाई है
महकती आंगन के झरोखों से चौपाल लाई है
पढ़कर भूल आया मैं लेकिन किताबों की सौगात लाई है ।।
शख्स था वो चेहरों में सच की पूरी बात लाई है
जानें दो आसूंओं को बूंदों की सैलाब लाई है 
छोड़ रहा हूं तेरा आंगन, कदमों की जो बात लाई है
जाने दे मुझे चौखट तले, सख्त रास्ते जो साथ लाई है।।
छोड़ा था एक पल रोशनी , जिसने अंधेरों को साथ लाई है 
अब बस बानगी बची है दीवानगी की 

जो पूरे पन्नों के बीच शब्दों सी ज़ज्बात लाई है । 



 कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Tuesday, January 3, 2017

क्रांति....2017

Rajnish baba mehta
क्रांति....
सर्द रातों की तरह, सुबह खुशनुमा निकला हूं,
बीते लम्हों की तरह, शब्दों सा नया निकला हूं ।।
छोड़ दी पुरानी सोच की तरह यादों से निकला हूं,
बंद कर दी अब मैंने, ज़ज्बातों के दरवाजों से निकला हूं ।।
काट दिए पुराने पन्नों पर बुरे लम्हें, नई सोच के साथ निकला हूं,
कोरे कागज पर नई कलम से, खुद की नई दास्तान लिखने निकला हूं।।
शीशे की शक्ल को साफ कर, नई तस्वीर बनाने निकला हूं,
मिलना मेरे नए रास्तों में, क्योंकि सिनेमा से खुद की तकदीर बनाने निकला हूं।।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, December 21, 2016

खुद की खोज़ में बाबा




रात का रण हो 
या सूर्य का कण हो ।।
सांसों में समाया हो 
या सदियों में जमाया हो।।

ना तू रोक पाया 
ना तू रक़ीब बन पाया,
तू राख था
मैं पत्थर सा पड़ा,
तू सोच था मैं शब्द सा अड़ा
अब चल अचल की ओर
क्योंकि तू बेड़ी सा पड़ा
मैं जंजीर सा लिपटा रहा ।।




कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Sunday, November 20, 2016

सिसकियां





















दु: गया दिल , उबल पड़े चंद शेर 
आंसूओं में बह गया, वो सिसकियों का ढ़ेर ।।
डूबने नहीं, उगने वाला था सुबह का वो सिकंदर
साहिल पे था, मौत के चेहरों का वो हुजूम--मंजर ।।

ना मिली पल की मोहलत, जो आंख भरकर देख पाता 
छुपते-छुपाते सन्नाटें में जो शोर मचाती आई ।।
नींद की आगोश में, करवटों के किनारे, सपनों के सहारे 
शब--मर्ग बाद, पौ तो फटी मगर जिंदगी ना नजर आई ।।

रक्खा था ज़मीनों पर कई कशीदा-सर 
चाहकर भी देख ना पाया वो हुजूम--मंजर।।
रूह-रूह में जो इस तरह वो पेवस्त हुई 
राख सा जिस्म थर्राया नहीं ध्वस्त हुई ।।

तोड़कर आईना--ज़िदंगी जो तू मौत कर गया 
रेल की सीटी सी गुनगुनाकर जो तू हममें घर कर गया 
 तलाश लेना तू वो बिस्तर जिसपर तेरी नींद मुकम्मल हो 
-->
क्योंकि तेरी सिसकियां हमें पूरा पत्थर कर गया ।।

                     कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 



शब-ए-मर्ग -रात का आखिरी पहर, कशीदा-सर -खुला सर 

















Wednesday, November 9, 2016

किस्सागोई बाबा की

रजनीश बाबा मेहता Rajnish baba mehta Fillum 
खुद की बंदगी 
दिल की दिल्लगी 
राहों की बेपनाहगी 
सांसों में संजीदगी 
सोच में सादगी 
जिस्म में अदायगी 
शौक में दीवानगी 

ऐसी ही शख्सियत सिनेमा की 
ऐसी है किस्सागोई बाबा की 

सपनों की राह का राहगीर सा होगा 

मेरे राहों का वो ख्वाबगीर सा होगा ।।

                 कातिब 
         रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, November 2, 2016

इंतजार (विधा- चौरंगा)


Rajnish BaBa Mehta Peom Chauranga style 

सोखती शाख़ों पर सूखे पत्ते 
संदूकों में बंद रिश्तों के प्याले
जड़ ढ़ूढ़ती जोश में काले मुर्दे
स्याह सी लगती है जीवन के ये सारे परदे ।।
ढ़ोल सी बजती तो ढम से आती आवाज़ें
रेल की सीटी सी गूँजती वो सन्नाटें
बिस्तरों पर टूटती उनकी वो कराहें
प्यास लगती तो गूँजती मयखानों में वो आहें ।।
सुबह ढ़ूढ़ती शामों में आसरों के रास्ते
दूर खड़ी पगडंडी पर चलती वो मेरे वास्ते
पहरों की क़ब्र में कैद होकर ख़ूब बरसते
सोच की संसार में खुद से लड़ती वो मिलने को तरसते ।।
अब काग़ज़ के छोटे नावों से बचा है आसरा
गलियों में ना जाने किस बात का सन्नाटा है पसरा
लंबे वक़्त के बाद लगता है पुरी होगी लंबी ख़्वाहिश
लो आ गई झरोखों से आख़िरी वक़्त की ख़्वाहिश
चाह कर भी कोई चाह ही पाया
हिम्मत करते भी कोई हिम्मत नहीं कर पाया
क्योंकि जड़ में जड़ गई वो काले मुर्दे
अब भी स्याह सी लगती है जीवन के ये सारे परदे ।।            

                कातिब 
         रजनीश बाबा मेहता 

Sunday, September 18, 2016

वेद में लिपटा बाबा

वेद में लिपटा बाबा - रजनीश बाबा मेहता 
लिखना बगावत है


मैं वाह, प्रवाह, वेग, व्यास, वेद में लिपटा हूं,
तू बन बेड़ी , मैं जंजीर बन के लिपटा हूं । 
सुबह की सूरज सी धूप सा सहमा हूं,
चंदा की रोशनी सी रात में सिमटा हूं ।।
जख्म दिया जो तूने पीठ पे 
मरहम की आस में खुद से लिपटा हूं ।।
आज पलकों भर आंसू से रोया हूं 
तू क्या जाने आज ख्वाब को किस कदर खोया हूं ।।

यादें संभाल कर रखूंगा इस दिल में 
मरहूम सा दुबक कर ना सोउंगा मैं बिल में ।।
ख्वाब-ए-इश्क को फना भी मैं ही करूंगा 
खुदा का मैं नेक बंदा फैसला भी मैं ही करूंगा।
जुबान बंद कर जो दर्द पिया वो तर्जुबा हुआ 
ख्वाहिश की मंजिल तक जो मैं पहुंचा वो भी तर्जुबा हुआ ।।
मेरी किस्मत भी नाज करती है मुझपे 
हर नजर को निगाह-ए-हक है मुझपे  ।।
अब पहुंचा हूं जो तारीख पर 
हैरान रह जाओगे मेरा मुकाम देखकर ।।

अच्छा हुआ बिखरे जमाने कब के गुजर गए 
लगी जोर की ठोकर जो हम बच गए ,
बंधे थे खुद की ख्वाहिश-ए-ख्वाबगीर में
बरना कबके हम भी बिखर गए होते ।।
शुक्रिया तेरा है जो तूने खुद ही खुद का सोचा 
वरना आज भी हम हीरा नहीं 
तपती रेत में पत्थर की तरह बिखर गए होते । 

             कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 
आज दिल में कुछ रोष है और व्यक्त करने का माध्यम इससे बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता ।