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Thursday, November 14, 2019

बमहम: बरसों की मेहनत से बनी एक आवाज

Rajnish BaBa Mehta With Unique Instrument BAMHAM

Rajnish BaBa Mehta With Unique Instrument BAMHAM





























खुद से खुद की मुलाकात, अक्सर यूं होती नहीं, 
अपनी हसरतों की तले, कभी खामोश बात होती नहीं।।
उलझे धागों की तरह जिंदगी सुलझाने की तमन्ना तो है 
बिखरे पन्नों पर ख्वाहिशों के, जज़्बात अब समेटी जाती नहीं।।
बेवक्त बेरूखी लिए किसी की धुन पर, अपनी राग छेड़ने की फिराक में हूं
परिंदों की जागती ज़िदगी को देख, अब अपनी उड़ान भरने की इंतजार में हूं।  
लो लिख दिया तुम्हारी बातें, अब तो गुनाहगार होकर भी ठहरने की फिराक में हूं। 
बरसों बीत जाते हैं, कभी कभी एक बात कहने में,
हर बार जमाने गुज़र जाते हैं, कभी-कभी अपनी ख्वाहिश संजोने में।।
उम्र गुजर गई एक सपने को पूरे करने में। 
आज सोचता हूं कई रातों की मेहनत के बाद,
एक साज बनाया, एक श्रृंगार बनाया 

बरसों की मेहनत से, एक आवाज बनाया ।।


नार्थ इस्ट की यात्रा के दौरान नागालैंड के दीमापुर में हमारी मुलाकात मोआ सुबॉंग से हुई। मोआ ने बमहम नाम का एक म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट बनाया। जिसके लिए उसे राष्ट्रपति के हाथों नेशनल अवॉर्ड भी मिल चुका है। 

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 

Sunday, July 28, 2019

।।यथार्थ के पटल पर वो नंगा साधु ।।

Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 

शिखर से बूटियां बटोरता हिमालय की तराई में सोता, आज वो नंगा साधु शिथिल था
मानव श्रृंगार से बेखबर यथार्थ के पटल पर बंद आंखें किए, आज वो थोड़ा जटिल था।। 

एकांत की भीड़ से निकलकर , शोर में सन्नाटे लिए छोड़ अपनी तप वो, क्यूं बेसुध पड़ा 
लालिमा वाली भोर तले, सारी आसक्तियों को छोड़ पांवो तले, वो जीवन पर क्यूं अड़ा।।

किशोर भरी उम्र लिए सारे भोग से भागकर ,हसीन लम्हों को नापकर जो भेष जोग का पहन लिए
सामने वाली परवाह ना थी,उम्मीदों वाली गवाह ना थी, बस तपते तलवे लिए,जो नंगे पांव चल दिए ।।

सन्यास के सफर पर त्याग भरे वैराग्य की साधना में ,अब हर सफर सोच की, एकांत में होगी 
मन के भंवर के पार खड़ा, हर सौभाग्य की भावना में, अब तृष्णा वस्तु की, अंत में भी ना होगी।

मोह की माया से परे ,जन्मजननी को छोड़ खड़े, अब वैराग्य के सफऱ पर एक नया जीवन-सुर बनाना है 
जन्म -मृत्यु का चक्र छोड़ ,हठ योगी बन सुर सारंगी लिए ,अब वो गेरूआ वाला अंगवस्त्र ही अपनाना है ।।

गुजर गई सारी बातें, बीत गई बरसों रातें , सो गई कईयों की सांसे, लौट रहा हूं कुछ अंत का अनंत लिए
माघ वाली महादिशा की ओर, बदल रहा है उर्जा का प्रवाह हर ओर, चल रहा हूं सोच में अब भी वही संत लिए।।

फिक्र का जिक्र है थक सा गया सफर सोच का, थक सी गई है वो हिमालय वाली कांपती बूढ़ी टांगे 
लौट रहा बेफिक्र ख्याल मन का, वैराग्य हुआ पराया, मोह का बचा ना माया, फिर भी ये मन क्यूं तन ही मांगे ।।

सवालों की उलझनों में सिमटा हूं, बंद आंखें लिए अब ना जाने क्यूं सामाजिक सोच में लिपटा हूं 
तोड़ पाउंगा उन जंजीरों को उंगलियों से, हर जवाब की ताक में अब तो अंधेरों से ही सिमटा हूं।। 

 दुनिया देख रही अंत के अनंत को ,फिर भी
शिखर से बूटियां बटोरता हिमालय की तराई में सोता, आज वो नंगा साधु शिथिल था
मानव श्रृंगार से बेखबर यथार्थ के पटल पर बंद आंखें किए, आज वो थोड़ा जटिल था।।

कातिब & कहानीबाज

रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, December 21, 2016

खुद की खोज़ में बाबा




रात का रण हो 
या सूर्य का कण हो ।।
सांसों में समाया हो 
या सदियों में जमाया हो।।

ना तू रोक पाया 
ना तू रक़ीब बन पाया,
तू राख था
मैं पत्थर सा पड़ा,
तू सोच था मैं शब्द सा अड़ा
अब चल अचल की ओर
क्योंकि तू बेड़ी सा पड़ा
मैं जंजीर सा लिपटा रहा ।।




कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Monday, May 13, 2013

लो......आ गई मेरी फ़िदाई

Rajnish baba mehta

मेरी फ़िदाई कल मेरे पास थी
ख्वाबों से दूर कहानियों के करीब
कैसे आई मेरे पास पता नहीं
लेकिन बे अन्दाज़ा खुशी फ़सानों सा दिखने लगा
एकाएक मेरी ज़हीर मेरे ज़ार के मर्म को कैसे समझ पाई
सवालों की उलझन में रकीबों का भी खयाल आया
लेकिन वो वक्त मेरा था
क्योंकि मैं महान जो हो चला था।
ठहरो....कहीं ये मेरी इश्तियाक-ए-इश्क का पयाम तो नहीं
कोई परखने की कोशिश तो नहीं
फिर ख्याल आया क्यों डरता हूं मैं
मेरी फ़िदाई मेरे पास आ तो गई।
अब ज़िदगी का क्या आसरा होगा पता नहीं
लेकिन मेरी फ़िदाई अब भी मेरे पास है।।

क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता

Rajnish BaBa Mehta
                                                      रजनीश बाबा मेहता 

1.-फ़िदाई= प्रेमी,
2.-बे अन्दाज़ा= अन्तहीन, अपार,
3.-फ़साना= प्रेमकथा, कहानी, किस्सा,
4.- ज़हीर- दोस्त
5.-ज़ार= लालसा, इच्छा
6.इश्तियाक-ए-इश्क - प्रेम की लालसा
7.- पयाम= संदेश

Sunday, April 7, 2013

अश्फ़ाक की तलाश में ...तू... या मैं ?

तू या मैं ?



मेरी पामाल ज़िंदगी का सहारा हो तुम
कैसे कहूं तुम्हें, कि मौज़ूं सहारा हो तुम
रात की तन्हाई टहनियों तले बीतती है
फिर भी मेरे लबों की अख़्ज हो तुम
अग़लात लिए आक़िल सा
तेरे रूहों की रवानियत सा
छोटे छोटे अश्कों की बूदों सा
अपने अऱज पर अपनी आंचल को समेटे हुए
मुझे अर्जमन्द ना जाने क्यों समझती जा रही हो तुम
अज़नबी रहने की आदत है मेरी
संभलना है तो संभलो अभी
वरना आब-ए-तल्ख़ में खो जाओगी तुम
सोच मेरी,  समंदर है,  या है दायरा
ना जाने ज़िदगी क्यों बन गई मुशायरा
अब एहतियाज-ए-इख्लास की ख्वाहिश ना है मेरी
क्योंकि अब ना तो तू है.. ना ही सौगंध तेरी।

रजनीश बाबा मेहता 


अगल़ात= अशुद्धियां, अख्ज़= पकड़नेवाला, लेनेवाला, छीनने वाला, लोभी, आक़िल= बुद्धिमान, अऱ्ज= धरती, क्षेत्र, पृथ्वी, अर्जमन्द= महान, आफ़ताब= सूर्य,
आब-ए-तल्ख़= कड़वा पानी, शराब, आंसू, एहतियाज= आवश्यकता, इख्लास= प्रेम, सच्चाई, शुद्धता, निष्ठ
अश्फ़ाक= सहारा,

Sunday, June 26, 2011

मेरी तलाश

अजनबी की तलाश में चलता रहा




एक अजनबी की तलाश में चलता रहा


खामोश गलियों में तेरा इंतजार करता रहा



जहां टूटे हैं सपने...


वहां हाथों की लकीरों को देखे हैं अपने


कदमों तले रास्तों के फासलों का क्या पता


रकीबों के शहरों में अनजान बनकर चलता रहा



चांद की चांदनी तले रात रात भर


ख्वाबों की सूनी सड़कें नापता रहा


अब तो मंजिल का पता नहीं



फिर भी...


तेरी आगोश में सिमटने की ख्वाहिश से जीता रहा


ये मेरी भूल थी या तेरी आंखो की सरगोशियां


जो तेरे आंसूओं से भीगी काजल को पीता रहा



अब तो इंतजार की भी इंतहा हो गई


फिर भी


तेरी नशीली पलकों का इंतजार


बंद गलियों में किए जा रहा हूं।







ऱजनीश कुमार

Thursday, January 1, 2009

मेरी जिंदगी, तुम्हारी जिंदगी


मेरी जिंदगी, तुम्हारी जिंदगी



जिंदगी ,जिंदगी ,जिंदगी
हर मोड़ पर खड़ी है एक नई जिंदगी..
खुशियों को हर पल तलाशती है जिंदगी
गमों से पार पाना चाहती है जिंदगी...
अंधेरी सुनसान बंद गलियों में खड़ी है हमारी जिंदगी..
वक्त ने दिखाया है आज एक नया आईना...
अंधेरों से निकलकर आज आजाद हुई है हमारी जिंदगी.....
आंखे उठाकर आसमां की ओर देख रहा हूं मैं...
हर एक तारें में दिख रही है हमारी जिंदगी....
पत्थरों की प्यास में झलकती है हमारी जिंदगी....
हर दीवार के जर्रे में है एक जिंदगी....
एक राह पर दौड़ रही है दो जिंदगी.....
फिर भी सोचने को मजबूर है हमारी जिंदगी...
फिर भी रटते रहते हैं हम...
जिंदगी जिंदगी जिंदगी....
हमारी जिंदगी, तुम्हारी जिंदगी...
-- रजनीश कुमार

Saturday, November 22, 2008

शब्दों के बीच जिंदगी....!


ब्दों के बी जिंगी....!


एक पल के इंतजार में चलता जा रहा हूं मैं


अपनी आवाज को सुनने की चाहत में जिए जा रहा हूं मैं।


वो रहगुजर भी मेरे इंतजार में पलकें बिछाए बैठी है


जिसके आखिरी छोड़ पर मेरी मंजिल मेरे इंतजार में बैठी है।


अपने आप को ढूंढने की फिराक में हर पल गुम होता जा रहा हूं,


अब तो तुम्हारें आने का आसरा भी नही दिखता


फिर न जाने क्यों मैं शब्दों में गुम होता जा रहा हूं।


धीरे धीरे धुंधली पड़ती जा रही है तेरी यादें


अब तो शब्द ही जीने का सहारा बनता जा रहा है।

----रजनीश कुमार

Sunday, October 19, 2008

मैं निजामों के शहर में था..मैं मुगलों के शहर में हूं...






मैं निजामों के शहर में था.......अब मैं मुगलों के शहर में हूं...







एक धुंध सा भरा सवेरा मैनें, निजामों से शहर में देखा
एक दूसरा सवेरा मैंने मुगलों के शहर में देखा।
याद आती है वो पल जिसे मैंने गुजारा था निजामों के शहर में,
जहां हर दीवारों के जर्रों में एक झलक थी दीवानों की
एक ऐसा शहर जहां मोती खुद को ही पिरोते हुए नज़र आती थी।
जिसकी बिरयानी खुद की स्वादों को चखने के लिए हरपल भूखी नजर आती थी।
जिसके सागर की लहरों में, खुद की उफान को देखने की तमन्ना लिए, पलकें बिछाए रहती थी।
जिसकी फिज़ाओं में दिखती है एक इतिहास के पन्नौं की जैसी कहानी ।
रात होती तो जगते जुगनुओं के समान होती इंसानी जिंदगी
जिसको जीने की तमन्ना लिए आज भी उगते सूरज की ओर देखता हूं मैं।
जब से मैंने छोड़ा निजामों के शहरों को
एक बूंद गिरी मेरी आंखों से, वो आंसू जो आज भी मुझे याद है
जिसे मैने देखा और वो बूढ़ी आंखों ने देखा।
जो मेरे सामने मूक बनकर, मुझे उन्ही आंखो से घूर रहा था।

आज मैं मुगलों के शहर में एक अनजाना परिंदा बनकर घूम रहा हूं
न तो तुम मुझे जानते हो न वो तारें जो मुझे दिलासा दिलाते हैं अपनी काबिलियत की।
दौड़ती जिंदगी के जैसा इस शहर में, हर कोई दिखता है अनजाना
जहां दूसरों से पूछता है, हर कोई अपना ठिकाना।
लोगों को डर है कि इस चलती भीड़ मे गुम न हो जाए..
इसी गुमनामी से डर मैं किनारे पर बैठकर देखता हूं इस भागती भीड़ को।
कितना मुश्किल है इन्सानों की जिंदगी में,
हर कोई सोच कर इसे भूलने की फिराक में रहता है।
अगर कुछ न मिला तो, खुद को ही ढ़ूढ़ने की तलाश में रहता है।
हर कदम पर मिलती मुश्किलों को नकारता जा रहा हूं,
हर बार यही सोच कर चलता जा रहा हूं मैं,
कि निज़ामों के शहर को तो मैं भूल नहीं पाया,
लेकिन मुगलों के शहर में मैं खुद को ही ढ़ूंढ नहीं पाया।
---------------रजनीश कुमार

Monday, September 15, 2008

एक रिश्ता



एक रिश्ता जो अभी-अभी बन रहा था
टूटने लगा मगर बनने से पहले
सीखने लगे थे हम आपसे मुस्कुराना
रूला दिया मगर हंसने से पहले
एक महल बनाया सपनों की दुनिया का
गिर गया वो नींव रखने से पहले
भिक्षा के लिए जो हमने झोली फैलाई
खींच लिया हाथ मगर कुछ देने से पहले
जिंदगी की परिभाषा जो खोजने हम निकले
जिंदगी छीन गई जीने से पहले
क्या यही अर्थ होता है रिश्तों का
ढ़ूंढ़ना होता है उन्हें बनने से पहले


-रजनीश कुमार

Sunday, September 14, 2008

किस्मत के धनी

किस्मत के धनी
हर राह पर चलता हूं
गिरते-पड़ते आगे बढ़ता हूं
ठोकरे खाते-खाते मंजिल को य़ाद करता हूं
गिरकर जब उठता हूं तो लहू से रंगा पाता हूं अपना पैर
लोगो से सहारे की उम्मीद कर, निराश होता मैं
पूछता हूं मैं रहगुज़र से ज़माने भर का सवाल
सोचता हूं मैं, क्यों बेबस है इंसान यहां पर
एक मंजिल की तलाश में क्यों भटकता हैं इंसान यहां पर
आगे बढ़ने की चाहत लेकर चल रहा हूं मैं
हाताश सा निराश सा दिखता है हर चेहरा यहां पर
जब चलते है जिंदगी के इन मुश्किल रास्तों पर
हर कोइ ढूंढ़ता है एक ठंडी छांव रास्तों पर
पांव में पड़ते है जब छाले तो आंखे उठती है सूरज़ की ओर
वो जलाता सूरज इन राहों को
कभी-कभी भी मेहरबान नहीं होता इन्सानों पर
फिजाओं की महकती हवा ही होती है एक सहारा
फिर भी इन आंखों में होती है मंजिल पाने की ललक
अपने रास्तों पर चलता जाउंगा
तब तक जब तक रास्तें न खत्म हो जाए....
--------रजनीश कुमार

मां का चेहरा



मां का चेहरा


हर कोई बचपन की कहानी कहता है
मै भी एक ऐसी ही कहानी सुनाता हूं
शाम का ढ़लता हुआ मंजर देखता था
मां के सर पर दुपट्टा, हाथ में दीया
सामने अस्त होते सूरज की ओर, मां का चेहरा
बंद आंखे ,हाथ में दीपक, भक्ति भाव से भरा चेहरा
मासूम भरी मेरी आंखो में होता एक अनसुलझा सवाल
कभी देखता मां का चेहरा
कभी देखता बुझता दिया ,तो कभी अस्त होता सूरज
सवालों में हर पल उलझता था
सोचता था क्या ये गांव है पूरी दुनिया
हर सवाल का जबाब खुद ही देता
शाम गुजरती घिर के आता घनघोर अंधेरा
रसोई में होती मां और चौबारे पर पढ़ते पापा
लालटेन की धीमी रोशनी भी करती मुझे बैचेन
जब भी दिखती मुझे टिमटिमाती रोशनी
फिर घिर जाता मैं सवालों से
सोचता था न रात होती न होती रोशनी
होता तो सिर्फ दिन का उजाला
रोज हजारों सवालों से जूझता था मैं
मां से डॉट खाने के बाद भी पूछता था मैं
सोने के लिए बिस्तर भी था एक सवाल मेरे लिए
नींद आती खो जाता मै सपनो की दुनिया में
सुबह होती टकराती सूरज की किरणें ऑखों से
मां की आवाज गूंजती मेरे कानो में
सुबह की टेंशन से घबराता था मैं.
स्कूल जाने पर रोता था मैं
किसी तरह स्कूल पहुंच ही जाता
प्रार्थना के लिए घंटी बजती
फिर एक सवाल मेरे दिमाग में कौंधता
कब मिलेगा छुटकारा इन बंदिशो से
इन्हीं सवालो से घिरकर मैने अपनी जवानी में रखा कदम
मां हुई, बूढ़ी पापा ने भी पढ़ना छोड़ा
वक्त गुज़रता गया मंज़र बदलता गया
मां ने अब चुप रहना सीख लिया
पापा ने चौबारे पर जाना छोड़ दिया
एक बार फिर मैं सवालों से घिरता चला गया
सोचता था मां के आवाजों की खनक कब सुनाई देगी
पापा के डांट में वो गुस्सा कब होगा
वक्त गुजरता गया बीबी का साथ मिला
फिर भी मैं मां के सिराहने पर सर रख कर सोता था
अपने आंसू को पीकर भी मै कुछ नहीं कह पाता
कि मां, मै सपने में अब भी तुम्हें ही देखता हूं
याद आती है वो बचपन की बातें
याद आती है वो मां का दुपट्टा
जिससे मां मेरा आंसू पोछा करती थी
सोचता हूं काश लौट के आते वो लम्हें
लौट के आता वो चंदा, वो सूरज
जिसे मै ख्वाबों में देखता था
बचपन तो सवालों के बीच गुजरा
लेकिन अब मैं सुकून से रहना चाहता हूं
अब न तो सवाल है न ही जवाब
पर अब भी मै देना चाहता हूं
अपनी जिंदगी को नया आयाम
मेरे शब्द समाप्त होने को आए
फिर भी एक सवाल गूंज रहा है मेरे जेहन में
क्या लौट कर आएगा वो दिन
जिसे मैने गुजारा था मां के साथ.......



-----रजनीश