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Wednesday, February 8, 2017

।।नजरिया उम्र का नजर आया।।

POET Rajnish BaBa Mehta 



बिखर गई सारी कविताएं
रूक गया शब्दों का शोर
चलता नहीं अब स्याहियों का जोर 
ख्वाबों और कल्पनाओं का मेल रहा पूरजोर।
बीते पन्नों पर नए रंग से फिर भरना है
नए शब्दों के साथ नई लाइनों पर चलना है
छोड़ कर कहानियां फिर कविताओं के संग नाची है
रिश्तों की बेमेल बुनियादी बातों के संग फिर सोची है।
अकड़ी उगलियों में आज जान भर तो आया
उठते दवात तो थे मगर कलम कहीं नजर नहीं आया
भेजा बुलावा, दस्तक भी रोज हुई, लेकिन हरकोई था पराया
उठाके मेज के संग रखी कुर्सियां तो नजरिया उम्र का नजर आया।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, January 12, 2017

लाई है …….!


रजनीश बाबा मेहता की कविता लाई है ....!
लाई है …….!

रात रहनुमा चांदनी रात सी लाई है 
दरकते दरारों संग दीवार लाई है
महकती आंगन के झरोखों से चौपाल लाई है
पढ़कर भूल आया मैं लेकिन किताबों की सौगात लाई है ।।
शख्स था वो चेहरों में सच की पूरी बात लाई है
जानें दो आसूंओं को बूंदों की सैलाब लाई है 
छोड़ रहा हूं तेरा आंगन, कदमों की जो बात लाई है
जाने दे मुझे चौखट तले, सख्त रास्ते जो साथ लाई है।।
छोड़ा था एक पल रोशनी , जिसने अंधेरों को साथ लाई है 
अब बस बानगी बची है दीवानगी की 

जो पूरे पन्नों के बीच शब्दों सी ज़ज्बात लाई है । 



 कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Sunday, November 20, 2016

सिसकियां





















दु: गया दिल , उबल पड़े चंद शेर 
आंसूओं में बह गया, वो सिसकियों का ढ़ेर ।।
डूबने नहीं, उगने वाला था सुबह का वो सिकंदर
साहिल पे था, मौत के चेहरों का वो हुजूम--मंजर ।।

ना मिली पल की मोहलत, जो आंख भरकर देख पाता 
छुपते-छुपाते सन्नाटें में जो शोर मचाती आई ।।
नींद की आगोश में, करवटों के किनारे, सपनों के सहारे 
शब--मर्ग बाद, पौ तो फटी मगर जिंदगी ना नजर आई ।।

रक्खा था ज़मीनों पर कई कशीदा-सर 
चाहकर भी देख ना पाया वो हुजूम--मंजर।।
रूह-रूह में जो इस तरह वो पेवस्त हुई 
राख सा जिस्म थर्राया नहीं ध्वस्त हुई ।।

तोड़कर आईना--ज़िदंगी जो तू मौत कर गया 
रेल की सीटी सी गुनगुनाकर जो तू हममें घर कर गया 
 तलाश लेना तू वो बिस्तर जिसपर तेरी नींद मुकम्मल हो 
-->
क्योंकि तेरी सिसकियां हमें पूरा पत्थर कर गया ।।

                     कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 



शब-ए-मर्ग -रात का आखिरी पहर, कशीदा-सर -खुला सर 

















Wednesday, November 2, 2016

इंतजार (विधा- चौरंगा)


Rajnish BaBa Mehta Peom Chauranga style 

सोखती शाख़ों पर सूखे पत्ते 
संदूकों में बंद रिश्तों के प्याले
जड़ ढ़ूढ़ती जोश में काले मुर्दे
स्याह सी लगती है जीवन के ये सारे परदे ।।
ढ़ोल सी बजती तो ढम से आती आवाज़ें
रेल की सीटी सी गूँजती वो सन्नाटें
बिस्तरों पर टूटती उनकी वो कराहें
प्यास लगती तो गूँजती मयखानों में वो आहें ।।
सुबह ढ़ूढ़ती शामों में आसरों के रास्ते
दूर खड़ी पगडंडी पर चलती वो मेरे वास्ते
पहरों की क़ब्र में कैद होकर ख़ूब बरसते
सोच की संसार में खुद से लड़ती वो मिलने को तरसते ।।
अब काग़ज़ के छोटे नावों से बचा है आसरा
गलियों में ना जाने किस बात का सन्नाटा है पसरा
लंबे वक़्त के बाद लगता है पुरी होगी लंबी ख़्वाहिश
लो आ गई झरोखों से आख़िरी वक़्त की ख़्वाहिश
चाह कर भी कोई चाह ही पाया
हिम्मत करते भी कोई हिम्मत नहीं कर पाया
क्योंकि जड़ में जड़ गई वो काले मुर्दे
अब भी स्याह सी लगती है जीवन के ये सारे परदे ।।            

                कातिब 
         रजनीश बाबा मेहता