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Monday, December 16, 2019

।।ये सर क्यों झुक सा गया है ?।।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta

ये सर ना जाने क्यों झुक-सा गया है,
चलती राहों पर क्यों रूक-सा गया है ?
गुरूर गर्व था मगर बेबसी बातों में क्यों थी,
सवाल दूसरों से नहीं बस खुद औऱ खुदा से पूछता हूं,
तेज दौड़ तो रहा हूं ,फिर भी ना जाने ये सर क्यों झुक-सा गया है ?

लहू का रंग एक, जिस्म की बनावट एक, 
मातृभूमि की शीष पर जन्म औऱ मरण एक, 
भूख एक, निवाला एक, ज़ुबान एक, आवाज एक,
धरती एक, आसमान एक, इबादत एक, आदत एक, 
फिर भी चलती राहों पर मेरी निगाहें क्यों झुक सा गया है ? 

सवालों की फेहरिस्त लिए चल तो रहा हूं 
लेकिन हौसला क्यों रूक-सा गया है ?

अरसे बाद वक्त ने बेवक्त आवाज दी 
चारों दिशाओं ने अपनी-अपनी परवाह दी 
गगन गूंज कर भरी भीड़ में हिदायत भी दी 
अल्लाह ने बिन मांगे कौम को कयामत भी दी
फिर भी लाल लफ्ज़ के आगे क्यों झुक-सा गया हूं ? 

बिन मांगे मिली मौत, अब हर पल का तोहफा क्यों नज़र आने लगी है,
एक ही धागों से बुनते कपड़े, लेकिन मेरी पहचान क्यों लिबासी होने लगी है ?
मुझको लूटते देख पौरूष, तेरे अंदर वही पुराना शैतान क्यों पलने लगा है, 
ये कैसी मोहब्बत-भरी-दुश्मनी है, जो सारे ज़माने को अंधी आंखों से नज़र आने लगी है। 

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता

Monday, November 25, 2019

।।हिन्दी मेरी भाषा।।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta

आओ कुछ बातें और मुलाकातें हिंदी में हो जाए,
कुछ टेढ़ी लकीरों का आकार हिंदी में हो जाए।
बरसों से सिमटी सपनों का साकार हिंदी में हो जाए,
हर ख़्वाबों भरी ख्वाहिशों का संसार अब हिंदी में बसा लिया जाए।  

हिंदी हमारी सभ्यता संस्कृति की पहचान जो है। 
हिंदी हमारी गंगा जमुनी तहज़ीब की आन जो है। 
हिंदी , हर हिंदुस्तानी का सम्मान है।
जिसके बिना हिंद थम जाए 
ऐसी जीवनरेखा है हिंदी। 
हर हिंदुस्तानी का अभिमान है हिंदी 
हिन्दी, मादर--हिंद की शान है , हिंदी।  
इस धरा पर बहती संगम की हर धारा है हिंदी
जन-भेद का मतभेद मिटाती ऐसी हमजोली है हिंदी। 
सात सुरों का साज सजाती, हर रंगों का मेल कराती है हिंदी
चारों दिशाओं का गठजोड़ , हर धर्मों का एक पाठ पढ़ाती है हिंदी।।
जीवन की आधार है हिंदी , सदियों पुरानी व्यवहार है हिंदी
ली है शपथ, खाई है कसम जिसकी, वो मातृभाषा है हिंदी।। 
हिन्दी मेरी भाषा , हिन्दी मेरी आशा ,
हिन्दी का उत्थान करना, हर हिंदुस्तानी की जिज्ञासा।




हिंदुस्तान में समय-समय पर हिंदी को लेकर विरोध जब जब होता है, तब-तब मैं अपनी मातृभाषा में सिकुड़ना का एहसास महसूस करता हूं। इसकी वजह सिर्फ एक ही है, वो है अपने ही देश के अंदर हिंदी का विरोध। लेकिन आजादी के बाद हिंदी विरोध की जगह धीरे-धीरे सिकुड़ती जा रही है। 
हिंदी की जबरस्त लोकप्रियता का एहसास मुझे उस वक्त हुआ, जब मैं नार्थ इस्ट की यात्रा के दौरान वहां के लोगों को इस भाषा को लेकर उत्साहित देखा। 7 राज्यों वाली नार्थ इस्ट अब 8 राज्यों मे तब्दील हो गई, लेकिन यहां हिंदी पहले के मुकाबले काफी मजबूत अंदाज में दिखाई देती है। अरूणाचल प्रदेश से लेकर मेघालय, सिक्किम से लेकर मिज़ोरम तक हर कोई अपनी लोकल भाषा का प्रयोग तो हर रोज करते हैं, लेकिन जैसे ही उनकी ज़ुबान पर हिंदी आती है , तो हिंदी के साथ एक मुस्कान भी आ जाती है। औऱ ऐसी बात नहीं है कि नार्थ इस्ट में हिंदी आज औऱ कल से बोली जाने लगी है, बल्कि आजादी के बाद सन् 1961 के आस-पास हिंदी ने अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया था। नार्थ इस्ट का अरूणाचल प्रदेश आठ राज्यों में सबसे बड़ा राज्य है। वहां करीब 500 से ज्यादा जनजातियां हैं, जिसकी वजह से वहां बोलियों की संख्या भी ज्यादा है, लेकिन आश्चर्य की बात यै हे कि अरूणाचल में हर जनजाति के लोग हिंदी बोलने को लेकर काफी सहज नजर आते हैं। इतना ही नहीं हिंदी के विकास को लेकर नार्थ-इस्ट के हर राज्य में एक राष्ट्रभाषा प्रचार समिति बनाई गई है। साथ ही कहीं-कहीं हिंदी साहित्य अकादमी भी है, जिनके जिम्मे हिंदी को बढ़ावा देने का है। यहां के कुछ लोगों से जब हिंदी में बात करने का मौका मिला तो फिर कुछ लोगों ने तो यहां तक जानकारी दे डाली कि, 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है  औऱ 10  जनवरी को विश्व हिंदी दिवस – International Hindi Day मनाते हैं। भाई गजब है, औऱ दूसरा गजब तो ये है कि तमिलान्डु में आज भी हिंदी विरोध के स्वर रह-रहकर गूंजने लगते हैं।  1960 के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलन जब व्यापक रूप लेने लगा तो, केंद्र ने विवादित प्रावधान को खत्म कर दिया और आश्वासन दिया कि हिंदी किसी पर थोपी नहीं जाएगी, औऱ तब से कुछ ऐसे तबके पैदा हो गए जिनके लिए हिंदी हाशिए पर एक चंद्रबिंदु की तरह है। 
कहानी बहुत है कहने को औऱ लिखने को। लेकिन कभी कभी इशारा समझना ही बेहतर होता है। 

हर कण में है हिन्दी बसी
मेरी मां की इसमें बोली बसी।।
मेरा मान है हिन्दी
मेरी शान है हिन्दी ।।


कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 


Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta





Wednesday, September 4, 2019

।।कोई ख़्वाब सा, तो कोई रूह सा है।।

Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 
कोई ख़्वाब सा, तो कोई रूह सा है  
आज इस भोर में क्यों कोई मग़रूर सा है ।।
क्या कहूं लफ्ज़ ख़ुद में लाल है
तेरा वो छोटा वाला इश्क़ यूं ही बेमिसाल है।। 
लौट आना कभी तंग गलियों में
जहां हर किसी को सिर्फ तेरा ही ख़्‍याल है ।।
बरसों बीती ख़ुश्क रातों में,
जमाने बाद जली रोशनी बंद दरवाजों तले, फिर भी मन में सवाल है।।
ख़्वाहिशें राख कर दी अलाव में
नंगे पांव नापता रहा राहों को,फिर भी ना जाने क्यूं तुझसे ही लगाव है।।
सारी उमर गुजर गई इम्तिहान में
क्यों तेरी अक्साई ज़िद की ईश्क कभी ना मिली मुझे दान में।। 
देखता हूं तेरी अक्स को ख़तों में
रंक था लेकिन राजा बनकर कभी झांक ना पाया खुद की गिरेबान में।।
तेरी याद में रातें रोती है दिन में
उसी अंधेरी गलियों से गुजर रहा हूं,क्या अब भी तू बसती है इसी आसमान में।।
लो तेरी पाज़ेब को रख दिया दरख़्त में
अब तो लौट आओ काजलों से सने आंखे लिए, मेरे इस अधकच्चे मकान में।।
गुज़ारिश गुनाह है ईश्क--फ़रमान में,
सालती रही तेरी सांसे, सो गई हर ज़ख्में, अब भी ना जाने कौन है तेरे ध्यान में।।
मर्सिया मर्म है सिर्फ़ मयस्सर मौत में,
ईश्क की कगार पर खड़ा, खुद ही हूं ख़ुदा, सारी जिंदगी गुजर गई इसी गुमान में।।

उन धुंधले अफ़सानों की बात पर अब कोई रोया ना करेगा
मौत के पार उमर की लिहाज पर अब कोई सोया ना करेगा ।।
फैसला फ़ासलों की फ़िराक पर अब कोई फिक्र ना करेगा
बात जज़्बात की ज़ेहन में होगी तो तेरा कोई ज़िक्र ना करेगा।।

कातिब & कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 

Monday, August 12, 2019

।।वो कबीर है, या आखिरी फकीर है।।
































चिंतन चीर है, शरीर उसका प्राचीर है
शब्द तीर है, कविता उसका रघुवीर है।
रास्तों पर रोज चलता, खुद का वो राहगीर है,
लाल कफन में लिपटा, दुनिया का वो धर्मवीर है।।

सोच धीर है, मस्तक भुजाओं जैसी प्रबीर है
छन्न छंद नीर है, आकार चांद जैसा रूधीर है। 
मानुष वीर है, लेकिन सकल संसार में अधीर है
ख्वाब क्षीर है, लेकिन खुद में वो ख्वाबगीर है।। 

जिस्म पीर है, फिर भी ना जाने कैसी उसकी तासीर है
ज़ेहन से मीर है, फिर भी भरी महफिल में वो बधिर है
आंखे उसकी हीर है,ये बात कोई औऱ नहीं, कहता कबीर है
लाल रंग लिए शऱीर है,पहचान लो अब तो अपना ही फकीर है।।

तलाशता हूं खुद को लकीरों में, ये मैं नहीं, मेरी ही तकदीर है
टूटी उंगलियों पर लिखी है जो आयत, वो मेरी ही शरीर का प्राचीर है।
धुंधली किरणों की धुन में छेड़ा है जो राग रोशनी का, वो अपना ही कबीर है
लिए हाथ सारंगी ,मिला खड़ा हिमालय पर, वो अब तो आखिरी फकीर है। 

धुनी रमाए रास्तों पर रोज चलता, खुद का वो राहगीर है,
सूर्ख लाल कफन में लिपटा, दुनिया का वो अकेला धर्मवीर है।।
धुंधली किरणों की धुन में छेड़ा है जो राग रोशनी का, वो अपना ही कबीर है
लिए हाथ सारंगी ,मिला खड़ा हिमालय पर, वो अब तो आखिरी फकीर है।। 



कातिब &  कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 



Wednesday, July 5, 2017

।।तू पीर की मजार, मैं साधुओं की समाधि का संसार।।

लेखक,निर्देशक रजनीश बाबा मेहता 


जिस इश्क में आह ना हो ,वो इश्क बेपरवाह सा है 
जिस इश्क में ख्वाब ना हो ,वो इश्क राख सा है ।।
जिस इश्क में ज़ुबान हो ,वो इश्क नाफ़रमान सा है 
अगर हर इश्क की इबादत हो  ,
तो फिर कयामत में भी इश्क होगा ।।
सात पैबंद से बनी दुनिया हठ सा होगा 
जब बात इश्क की होगी,तो हर दरवाजा मठ सा होगा।।

खोल देना दरारों में डाल उंगलियां इश्क की 
पूंछूंगा सवाल जिस्म की, थोड़ी बारिश कर देना अश्क की
दिखेगी दरारों से शक्ल शायर की, फिर भी ईश्क होगी रश्क सी।।
खुलेंगे कुछ पुराने खत ख्यालों के, धूल भरी किताबों की गांठों में    
कुछ रूह सी शब्दों में एहसासों के, बंद पड़े तालों औऱ बक्सों की साठ-गांठों में।।

रोकना ना कदम जब होगी उम्र पूरी क़फ़स तले इम्तिहान--इश्क की 
तोड़ बंदिशो को नाप लेना जमाने के लिए बन सफेद सा नमाज़ी--गुज़र सी 
रमजा़न सा आउंगा अब्द सा लिबास बदन पर लिए अब्सार--ईश्क सुनाउंगा 
वीराने ईदगाह में कब्र के कोनों तले एक दूसरे के लिए फातिहा जो गाउंगा 
तू पीर की मजार बन, मैं साधुओं की समाधि का संसार बन जिंदा जो रहूंगा 
वो इश्कगाह की कब्रगाह में उम्र आंसूओं तले मोतियों सी चमकती ही बुनूंगा ।।

लो मौत की दस्तक ख़जां भी क्या खूब लाई है इश्क के तकिये तले 
जिस्म में बांध जंजीर चार जणा माथे उठाए,तेरे थोड़े अश्क यूं ही मिले  
फ़कीरियत का पैमाना अब ईश्क का इश्काना हठ पर भारी है   
कब्र के कोठों पर खड़े वो इश्कबाज के आगे जो पूरी दुनिया हारी है 
अब सोच और सपनों की सांसों से स्याही की तकदीर शब्दों में जारी है 
फिक्र ना करना अज़ीम बनने की क्योंकि हर बार बेचारी इश्क ही हारी है  


कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 


क़फ़स= पिंजरा।।अब्द-परमात्मा का दास।।अब्सार= आंखें।।ख़ज़ां (ख़िज़ां)=  वृद्धावस्था।।अज़ीम= महान।।

Tuesday, January 3, 2017

क्रांति....2017

Rajnish baba mehta
क्रांति....
सर्द रातों की तरह, सुबह खुशनुमा निकला हूं,
बीते लम्हों की तरह, शब्दों सा नया निकला हूं ।।
छोड़ दी पुरानी सोच की तरह यादों से निकला हूं,
बंद कर दी अब मैंने, ज़ज्बातों के दरवाजों से निकला हूं ।।
काट दिए पुराने पन्नों पर बुरे लम्हें, नई सोच के साथ निकला हूं,
कोरे कागज पर नई कलम से, खुद की नई दास्तान लिखने निकला हूं।।
शीशे की शक्ल को साफ कर, नई तस्वीर बनाने निकला हूं,
मिलना मेरे नए रास्तों में, क्योंकि सिनेमा से खुद की तकदीर बनाने निकला हूं।।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, December 21, 2016

खुद की खोज़ में बाबा




रात का रण हो 
या सूर्य का कण हो ।।
सांसों में समाया हो 
या सदियों में जमाया हो।।

ना तू रोक पाया 
ना तू रक़ीब बन पाया,
तू राख था
मैं पत्थर सा पड़ा,
तू सोच था मैं शब्द सा अड़ा
अब चल अचल की ओर
क्योंकि तू बेड़ी सा पड़ा
मैं जंजीर सा लिपटा रहा ।।




कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, November 9, 2016

किस्सागोई बाबा की

रजनीश बाबा मेहता Rajnish baba mehta Fillum 
खुद की बंदगी 
दिल की दिल्लगी 
राहों की बेपनाहगी 
सांसों में संजीदगी 
सोच में सादगी 
जिस्म में अदायगी 
शौक में दीवानगी 

ऐसी ही शख्सियत सिनेमा की 
ऐसी है किस्सागोई बाबा की 

सपनों की राह का राहगीर सा होगा 

मेरे राहों का वो ख्वाबगीर सा होगा ।।

                 कातिब 
         रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, October 12, 2011

मंडी हाउस का हीरो



एक राह का ऱाहगीर तू
एक ख्वाब का ख्वाबगीर  तू ।
चलता जा सपनों की राहों पर
सन्नाटा लिए मंडी की गलियों में
भटकता है सदियों तक तू ।
ख्वाहिशों का सेहरा सर बांधे
जख्म छुए पैरों को...
धूप जलाए चेहरों को
फिर भी ना दर्द पहुंचे
ना चोट खाए..
ना दाग दिया सीने पर तू ।
अब चलना छांव छांव
कतरा कतरा आंसू लिए तू।
अजीब दर्द की दांस्ता यहां
कहीं मिलेगी छांव ...
तो कही धूप पाएगा तू ।
नाटक की कायनात में ...
आशिकों की तरह भटकता तू...
धुएं में उलझी धूल की तरह
उड़ना चाहता  तू ।
वक्त से टपका जो लम्हा... उसकी तरह
मंडी की गलियों में खुद की निशां तलाशता  तू ।
आई मंजिल पाने की बारी
आई  जीने की बारी
जी लेने दो मुझको .....
खो जाने दो मुझको ।
अब आई मेरी बारी ।


रजनीश "बाबा मेहता"

Wednesday, September 7, 2011

सोच

सपनों की सड़कों पे नंगे पांव चलता हूं
ख्वाबों को हकीकत से कुछ यूं ही नापता हूं
जिंदगी की खोज में... जिंदगी मानो तमाशा बन गई
जहां बच्चों का खेल तो है
लेकिन भीड़ से शोर लापता हो गई
हाशमी मार्ग के हश्र पर अब तो रोना आता है
जहां हीरो समोसे के साथ चाय... तो ब्रेड पकौड़े पर ही जीता है
सपनों की उड़ान तो है ...लेकिन फर्श का पता भी... खूब पता है
जहां ना तो इमेल है...ना जीमेल....ख्वाबों में है.. तो सिर्फ फीमेल
फिर भी भागती जिंदगी को थामने की तमन्ना में जीता जा रहा हूं
हर ख्वाहिश को पाने की तमन्ना में....जहर का घूंट भी पीता जा रहा हूं
धीऱे-धीरे वक्त गुजरता जा रहा है...मंजर बदलता जा रहा है....
राहों से गुजरकर...मंजिल के फासले तो तय कर लिए
लेकिन भागती भीड़ के शोर ने...आज चुप्पी साध लिए...
वक्त के तकाजे तो हमने भी खूब देखे...
क्या करें आंसू भी हमने आंखों से खूब पिए
अब ना तो इंतजार है....न इंतजार की ख्वाहिश
क्योंकि सपनों के टूटने की आवाज नहीं होती
वक्त के मार की जख्म नहीं होती
आज तुम हो...तो हम हैं...
नहीं तो हमें जीने की आदत नहीं होती ।

रजनीश कुमार

Sunday, June 12, 2011

जिस्म की आह...रोको ना तुम ।






जिस्म की आह


जिस्म आगोश में सिमट रहा
हल्की सी प्यास ये बदन की
उठ रही अंगड़ाईयों में
खो जाने दो उन लम्हों में ज़रा ।
अपने ललक की भूख को
हाथों से रोको न तुम
खोजता तू खुद को अपने भीतर
ना जाने कहां गुम हो गया ।
मिलन की आस में लंबी है ना दूरी
लेकिन प्यास अभी भी तेरी अधूरी ।
हर वक्त नहीं, आज नहीं, कल भी करेंगे तेरा इंतजार
बंद आंखों से तूम्हें टूटकर करेंगे प्यार ।
लबों की सूर्ख अदाओं को
लबों से छूने दो जरा ।
जिस्म की आह को
जिस्मों में समाने दो ज़रा ।



----रजनीश कुमार

Thursday, June 11, 2009

।।तू ही बता ! ।।





सपनों कि मंजिल को
तू जा रही है छोड़ के।
तू मुड़ के देख यहां पे
तू किसको जा रही है छोड़ के।
वो वादें वो कसमें
वो इरादें वो बातें
वो तन्हाई भरी रातें
तू याद कर फिर सोच ले
तू जा रही है किसको छोड़ के।
हर गम के बसेरों में तेरा साथ मैने पाया है
आज हू मैं अकेला
जा रही है तू मझे छोड़ के।
यादों की दीवारों पे लिखा है नाम तेरा
वो झांकती झरोखों से तेरी आंखे
किसे भूलूं तू ही बता
किधर को जाऊं तू ही बता।

कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता 

Monday, March 30, 2009

सारी बंदिशों को तू तोड़ दे


ऐ मुसाफिर....तोड़ दे बंदिशों को।


चलते हुए मुसाफिर तू बता क्या है तेरी रज़ा

क्यों धूप छांव में चल रहा तू

क्यों अपनी मंजिल को मुश्किलों में डाल रहा है तू।

हर उन बंदिशों को तू तोड़ दे

हर उन रास्तों को तू नाप ले

जिसपर चलने की हरपल तेरी मंशा रही है।

ऐ मुसाफिर तू न सोच मेरे बारें में

जिंदगी एक खेल है जहां सोचना है तूझे अपने बारें में।

हर कदम पर हर मोड़ पर तू अपने आपको बचा

सामने वालों को अपनी कमजोरियों को न तू बता।

सच झूठ के इस दलदल में कभी न धंसना।

उस अन्त के शुरूआत के बारें में तू सोच

जिस शुरूआत के अन्त पर तू खड़ा है।

---------रजनीश कुमार

Friday, March 20, 2009

वो फिर मुझसे बातें की


पुरानी पहचान.....या.......कुछ और.....?

हर रात की तन्हाईयों में जीने वाली
आज वो मुझसे हंस कर बातें की।

फैशन में लिपटी वो छरहरी काया
तिरछी नज़रों से निगाहें भी मिलाई।

वर्षों बाद प्यार भरी बातें सुनकर ऐसा लगा
मानो सारे जहां की खुशियां बिखेर दी उसने।

हाथों की लकीरों में देखा था कभी मैने उसे
एक समय वो रूठ कर गई थी मुझसे।

लेकिन आज मै मना लाया उसे।
कब तक चलेगा ये सिलसिला

य़े देखना है मुझे और उसे।

----रजनीश कुमार

Wednesday, February 11, 2009

अंधेरी रात.....?


अंधेरी रात.....?
देखो रात फिर घिर के आई है घनघोर अंधेरा लाई है....
दिल ने मेरा... आज चांद चुरा के लाया है.....
जुगनूओं की जगमग ने आज मुझे रास्ता दिखाया है...
चमकती पेड़ की टहनियों पर दिख रही है ओस की बूदें..
जैसे रात की मालाएं लिए है...ओस की बूंदें...
सूने आसमान की ओर तकती है...मेरी आंखे..
काली घनघोर रातें घूम रही है ...फैलाएं अपनी बाहें
रात में जगमग तारों की कहानी लिए
हवाओं ने नई दिशाओं में उड़ान भरी है...
इन अंधेरी रातों में रास्ता भी मुड़ना भूल गई..
चमकती बिजलियों की गड़गड़ाहट में
बारिश भी बरसना भूल गई....
खेतों की रखवाली करता वो किसना...
इन अंधेरी रातों में सोना भूल गया...
खेतों की पगडंडियों के बीच सन्नाटे में...
कोई चलना भूल गया.....
---- रजनीश कुमार

Wednesday, January 21, 2009

इंतजार औऱ मैं....!


इंतजार औऱ मैं....!


तेरे आने की जिद लिए बैठा हूं मैं...
तेरे यादों में जीने के लिए बैठा हूं मैं...
सूनी राह को तकती है हरपल मेरी आंखें..
वो धूप की छांवों में तेरा इंतजार लिए बैठा हूं..
अपने आप की तलाश में भटकता हुआ
तेरे करीब आने की फिराक में बैठा हूं मैं....
लोंगो की नसीहतों को नकारता जा रहा हूं ..
तुझे बेपर्दा होकर जाते देख रहा हूं मैं...
काश तू एक नजर भर देख लेती मेरी निगाहों को...
तो यूं न तेरे इंतजार में बैठा होता मैं...
-----रजनीश कुमार

Tuesday, January 20, 2009

भूखा बालक


भूखा बालक


चांदनी चौक के चौराहे पर बेचारे की तरह खड़ा था वो
लिए हाथ में काला पेपर औऱ पैरों में सफेद जूते
जून की चिलचिलाती गर्मी को महसूस कर रहा था वो

भरी भीड़ में बैचैन सा कभी चलता
तो कभी रूक कर सामने वाले को निहारता था वो।
उसके चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था
मानों वर्षों से भूखा है वो.....

हाथ की छोटी छोटी उंगलियों को घुमाते हुए...
खुद को परेशान कर रहा था वो....
जब भी भूख लगती एक आवाज लगाता खुद को..
फिर थोड़ी देर बाद अपने आप को शांत करता नज़र आता वो...
रात घिरने को आई स्ट्रीट लाइट भी जल उठी...
फिर अपने घर की ओऱ जा रहा था वो...
रास्ते में इधर उधर देखता.....
शायद खाने को कुछ पा लेता वो.....
घर पहुंचने को आया फिर भी भूखा था….
चेहरे की परेशानी से भागने की फिराक में था वो...
घर पहुंच कर लालटेन की रोशनी में सोचने लगा था वो....
मां की आवाज आयी बेटा सोने का वक्त हो गया...
नन्ही उंगलियों से रोशनी को धीमा करके....
बिस्तर की तलाश में चल पड़ा था वो।

-----रजनीश कुमार

Sunday, September 28, 2008

भूल रहा है किसको

भूल रहा है किसको.....


वो जमाना भूल नहीं पाते हम
जब वो हमारे साथ हंसा करती थी।
वो आंसू भूल नहीं पाते है हम
जब हमारे साथ रोया करती थी।

वो वक्त नहीं भूल पाते है हम
जो हमारे साथ बिताया करती थी।
मगर मैं भूलना चाहता हूं हर उन लम्हों को
जो बिताया था उसके साथ
लोगों से पूछता हूं मैं, इस मर्ज की दवा,
लोग हंसकर कहते है, इसका है ही नहीं दवा।

जब मैंने ठाना भूल जाऊंगा उसको,
वो फिर याद आती है
दिल कहता है, तू भूल रहा है किसको ?



-----रजनीश कुमार