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Wednesday, December 21, 2016

खुद की खोज़ में बाबा




रात का रण हो 
या सूर्य का कण हो ।।
सांसों में समाया हो 
या सदियों में जमाया हो।।

ना तू रोक पाया 
ना तू रक़ीब बन पाया,
तू राख था
मैं पत्थर सा पड़ा,
तू सोच था मैं शब्द सा अड़ा
अब चल अचल की ओर
क्योंकि तू बेड़ी सा पड़ा
मैं जंजीर सा लिपटा रहा ।।




कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Tuesday, February 11, 2014

मसक्कली की मौत

मसक्कली की मौत By Rajnish BaBa Mehta
टीन के छत से फड़फड़ाकर गिरी
सांसों को थामने में बिखरी रही
मौत से बचने की फिराक में थी
कई बार पंख से हवाओं का भी सहारा लिया
खेलते बच्चों ने भी जमकर उकसाया
सहसा दातों के बीच लहू में रंग गई
मौत के दामन से भागती मसक्कली
मौत के आगोश में ही समा गई
सोचता हूं, क्यों नहीं हाथों में उठाया
क्यों नहीं जिस्मों से लगाया
क्यों हत्यारा सा महसूस कर रहा हूं
क्यों टीन के छत से फड़फड़ाकर गिरी।।
                                            क़ातिब
                                     रजनीश बाबा मेहता 

Sunday, June 26, 2011

यादों का बसेरा






तू ही तू









याद है तू



ख्वाब है तू



राहों की ताकीद है तू



मेरी परछाई



क्यों चले तेरे संग-संग



हर बार साए के साथ है तू ।






ज़िंदगी लम्हों में गुजरती जा रही है



फिर भी इनकार है तू



मानो हर लम्हों में हर वक्त साथ है तू ।






वों आंचल वो बाहें



तेरी छुअन मानो एक नया एहसास है तू



नजरों के सामने होकर



क्यों ओझल सी रहती है तू ।






अब तो बता क्यों खफ़ा है तू



मेरी आगोश में आकर



क्यों सिमटती जा रही है तू।






रजनीश कुमार



8 अप्रैल 2011

Friday, July 24, 2009

मेरी यादें मेरा बसेरा





कॉलेज में मेरी यादें

वो फूलों की डाली वो पत्तों में कांटे
हर मोड़ पर बिछी है मेरी निगाहें
वो ख्वाबों की हकीकत वो यादों का बसेरा
हर गम में है बस तेरा ही तेरा सहारा
वो कॉलेज की गलियों में गुमनाम अंधेरा
हर कदम पर नहीं मिला मुझे साथ तेरा
वो बसों की पायदान पर बना रिश्ता मेरा औऱ तुम्हारा
फिर भी वो सांसों में नहीं दिखा अपनापन तुम्हारा
वो खाली सीढ़ीयों पर बैठ मैने किया लंबा इंतजार
वो तेरी परछाई की आहट ने मुझे किया था बेकरार

वो आखिरी दिनों में एक उम्मीद के सहारे जिया था मैने
न जानें क्यों हरपल तुम्हें ही सोचा था मैंने ।


रजनीश कुमार

Thursday, June 18, 2009

मेरी यादें, मेरा बसेरा

तू नहीं तो कुछ भी नहीं.....

गुमनाम रास्तों पर तू चल
तू मुझे बता तू समझ
कि जख्म को तू नकार दे
अंधेरे रास्तों पर तू चला चल
आंधियों को तू पुकार दे
बहती कश्तियों की मझधार में
उड़ती धूल में तू खुद को समेट ले।
जून की दोपहरी में छांव तलाश रहा है तू
भीड़ भरी बाजारों में नंगे पांव चला जा रहा है तू।
ये बता कि, क्या हुई है खता, क्यों है तू खफा।
जुल्म की आगोश में क्यों सिमट रहा है तू
आने वाली आंधियों को क्यों नकार रहा है तू
अपने अतीत को, क्यों खुद याद कर रहा है तू
टूटे आईनों के सामने क्यों आंसू बहा रहा है तू।
रोक ले तू अपनी कल्पनाओं को
आने वाली जिंदगी के बारें में तू सोच
उस भीड़ में उजाले की तरह तुम दिखना
खामोशी बनकर तुम यूं ही मेरी गुमनाम यादों में बसना।


रजनीश कुमार

Saturday, October 4, 2008

दाखिला लेने की चाहत




दाखिला लेने की चाहत



याद है मुझे कॉलेज के बाद का वो दिन,
आगे की पढ़ाई जारी ऱखने का टेंशन।
हर कोई दाखिला ले रहा था एम.ए. और एम.बी.ए. में,
मुझे तो दाखिला चाहिए था सिर्फ पत्रकारिता में।
हर कॉलेज, हर विश्व विघालय का चक्कर लगाता था मैं,
वो दिल्ली में गर्मी का दिन जून के महीने में,
वो दाखिला लेने की चाहत मजबूत बनाती थी मुझे।
फार्म खरीदने के लिए लगती थी लंबी कतार,
मगर मजबूत किस्म के लड़को की नहीं होती थी कोई कतार।
आखिर किसी तरह नंबर आता फार्म खरीदने के लिए पैसे बढ़ाता,
काउंटर वाला भी खुदरे पैसे के लिए सभी को तड़पाता।
पर वो दाखिला लेने की चाहत मजबूत बनाती थी मुझे।
फार्म खरीदकर पेड़ों के नीचे बैठता था मैं,
मगर हवा के गर्म थपेड़ों से घबराता था मैं।
वो गर्म हवा हमें एहसास दिलाती थी, अपने काबिलियत की,
वो गर्म हवा की चुभन से सिहर उठता था मैं।
सोचता था कितनी मुश्किलें हैं हमारी जिंदगी में।
मगर वो दाखिला लेने की चाहत मजबूत बनाती थी मुझे।
फार्म खरीदकर घर जाने के लिए बस पकड़ता था,
खिड़की के पास खाली सीट देखकर जल्दी से बैठता था।
जब बस चलती फिर वही गर्म हवा चेहरे से टकराती,
फिर वही मजबूरियां हमें याद आती ।
मगर वो दाखिला लेने की चाहत मजबूत बनाती थी मुझे।


-----रजनीश कुमार