| कहानीबाज रजनीश बाबा मेहता |
Friday, September 13, 2019
Wednesday, September 4, 2019
।।कोई ख़्वाब सा, तो कोई रूह सा है।।
| Writer & Director Rajnish BaBa Mehta |
कोई ख़्वाब सा, तो कोई रूह सा है ।
आज इस भोर में क्यों कोई मग़रूर सा है ।।
क्या कहूं लफ्ज़ ख़ुद में लाल है,
तेरा वो छोटा वाला इश्क़ यूं ही बेमिसाल है।।
लौट आना कभी तंग गलियों में,
जहां हर किसी को सिर्फ तेरा ही ख़्याल है ।।
बरसों बीती ख़ुश्क रातों में,
जमाने बाद जली रोशनी बंद दरवाजों तले, फिर भी मन में सवाल है।।
ख़्वाहिशें राख कर दी अलाव में,
नंगे पांव नापता रहा राहों को,फिर भी ना जाने क्यूं तुझसे ही लगाव है।।
सारी उमर गुजर गई इम्तिहान में,
क्यों तेरी अक्साई ज़िद की ईश्क कभी ना मिली मुझे दान में।।
देखता हूं तेरी अक्स को ख़तों में,
रंक था लेकिन राजा बनकर कभी झांक ना पाया खुद की गिरेबान में।।
तेरी याद में रातें रोती है दिन में,
उसी अंधेरी गलियों से गुजर रहा हूं,क्या अब भी तू बसती है इसी आसमान में।।
लो तेरी पाज़ेब को रख दिया दरख़्त में,
अब तो लौट आओ काजलों से सने आंखे लिए, मेरे इस अधकच्चे मकान में।।
गुज़ारिश गुनाह है ईश्क-ए-फ़रमान में,
सालती रही तेरी सांसे, सो गई हर ज़ख्में, अब भी ना जाने कौन है तेरे ध्यान में।।
मर्सिया मर्म है सिर्फ़ मयस्सर मौत में,
ईश्क की कगार पर खड़ा, खुद ही हूं ख़ुदा, सारी जिंदगी गुजर गई इसी गुमान में।।
उन धुंधले अफ़सानों की बात पर अब कोई रोया ना करेगा,
मौत के पार उमर की लिहाज पर अब कोई सोया ना करेगा ।।
फैसला फ़ासलों की फ़िराक पर अब कोई फिक्र ना करेगा
बात जज़्बात की ज़ेहन में होगी तो तेरा कोई ज़िक्र ना करेगा।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Labels:
निर्देशक,
मेरी सोच,
रजनीश बाबा मेहता की कविता
Location:
Mumbai, Maharashtra, India
Friday, August 23, 2019
।। ना जाने क्या पीछे छोड़ आएं हैं ।।
| Writer & Director Rajnish BaBa Mehta |
लफ्जों की तलाश थी, लेकिन हर्फ़ ढ़ूंढ़ लाए हैं,
काली लकीरों की चाह में, अधूरी जिंदगी पीछे छोड़ आए हैं।
ज़ेहन अफ़सुर्दा लेकिन अकबरी अफ़साने किस डगर ले जाए मालूम नहीं
मगर जो संकरे रास्ते घर तक जाती थी, उन पर पैरों के निशान कबके मिटा आए हैं।
उस दूर दुनिया की चाह में , यादों की आलिम उमर को भऱे बाज़ार बेच आए हैं,
चेहरे पर परदे बदलते-बदलते, खुद की पहचान अपनों से ही जुदा कर आए हैं।।
फ़रिश्ताई फिराक की फ़िक्र में, उजालों औऱ अंधरों का फर्क ही भूल आए हैं,
रोज काली लकीरों से अफ़सानों की मद में, अनसुने कई अधूरे किस्से कब्र में छोड़ आए हैं।।
उसी पुरानी सड़क पर खड़ा हूं फिर से, जो जानी-पहचानी अनजान सी लगती है आज
भटकती भीड़ से परे रास्तों की तलाश में, अपनों के शहर में अजनबियों जैसे आ खड़े हुए ।।
कहानियों की ख़्वाहिश वाली बोझ तले, अंधेरी कासनी रातों वाली ख्वाबों की आवाज दबा आए
ज़मीर की ज़द में खुद से खुद की लड़ाई के दरम्यां, मालूम चला अपना असल अस्तित्व ही पीछे छोड़ आए।
अपनी हौसलों वाली दुनिया बसाने के चक्कर में, उस कमजोर चाहत से सरेआम सौदा कर आए,
बंद करता हूं आंखें दिखती है धुंधली रोशनी में ,जो अपनी पुरानी घर की दहलीजों को सूना छोड़ आए हैं।
बेबसी का सौदा सौदा करते , एक रोज घर जलाने वाले चरागों से बिना शर्त ही समझौता कर आए हैं
उमर की दस्तक तले पहली बार पता चला, बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े-खड़े सारी जवानी यूं ही गंवा आए हैं।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Location:
Mumbai, Maharashtra, India
Monday, August 12, 2019
।।वो कबीर है, या आखिरी फकीर है।।
चिंतन चीर है, शरीर उसका प्राचीर है
शब्द तीर है, कविता उसका रघुवीर है।
रास्तों पर रोज चलता, खुद का वो राहगीर है,
लाल कफन में लिपटा, दुनिया का वो धर्मवीर है।।
सोच धीर है, मस्तक भुजाओं जैसी प्रबीर है
छन्न छंद नीर है, आकार चांद जैसा रूधीर है।
मानुष वीर है, लेकिन सकल संसार में अधीर है,
ख्वाब क्षीर है, लेकिन खुद में वो ख्वाबगीर है।।
जिस्म पीर है, फिर भी ना जाने कैसी उसकी तासीर है ,
ज़ेहन से मीर है, फिर भी भरी महफिल में वो बधिर है ।
आंखे उसकी हीर है,ये बात कोई औऱ नहीं, कहता कबीर है
लाल रंग लिए शऱीर है,पहचान लो अब तो अपना ही फकीर है।।
तलाशता हूं खुद को लकीरों में, ये मैं नहीं, मेरी ही तकदीर है
टूटी उंगलियों पर लिखी है जो आयत, वो मेरी ही शरीर का प्राचीर है।
धुंधली किरणों की धुन में छेड़ा है जो राग रोशनी का, वो अपना ही कबीर है,
लिए हाथ सारंगी ,मिला खड़ा हिमालय पर, वो अब तो आखिरी फकीर है।
धुनी रमाए रास्तों पर रोज चलता, खुद का वो राहगीर है,
सूर्ख लाल कफन में लिपटा, दुनिया का वो अकेला धर्मवीर है।।
धुंधली किरणों की धुन में छेड़ा है जो राग रोशनी का, वो अपना ही कबीर है,
लिए हाथ सारंगी ,मिला खड़ा हिमालय पर, वो अब तो आखिरी फकीर है।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Location:
Mumbai, Maharashtra, India
Wednesday, July 31, 2019
।।किस्सों के बीज बो रहा हूं, बड़ा होकर किसान बनूंगा।।
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| WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA |
बरसों से हर रोज किस्से बो रहा हूं
फिर भी लोग बड़ी अजीब बात पूछते हैं ।
सवाल ये कि बड़े होकर क्या बनोगे ?
हर बार की तरह इस बार भी वही जवाब दे रहा हूं ,
बड़ा होकर एक कामयाब किसान बनूंगा
बीतते वक्त के साथ खुद की आजमाईश कर
औऱ भी बेहतर बीज वाले किस्से बोउंगा ।
किस्सों की नस्ल कभी बिहार से तो कभी पंजाब से लाउंगा
कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर गांव की गलियों में जाउंगा
जरूरत पड़ी तो फिर सरहदें पार भी किस्सों की बीज बोउंगा ।
फिर भी किस्सों की फसल अगर एकबारगी वक्त के पैमाने तले कम पड़ी
तो फिर भगत-गांधी -आजाद-बोस को उसकी चिता से जगाउंगा ।
फ़ैज़-फ़िराक-फ़राज-फाजली को उसके कब्र के सिराहनों से आवाज लगाउंगा,
गौहर-जेद्दन-ज़ोहरा की घुंघरूंओ तले हजरत महल के साथ पूरी रात गुजारूंगा।
औऱ जब फसल लग जाएगी तो फिर उसकी उपज सिनेमा की दमाही हर रोज करूंगा।
कातिबा & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
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Location:
Mumbai, Maharashtra, India
Sunday, July 28, 2019
।।यथार्थ के पटल पर वो नंगा साधु ।।
| Writer & Director Rajnish BaBa Mehta |
शिखर से बूटियां बटोरता हिमालय की तराई में सोता, आज वो नंगा साधु शिथिल था
मानव श्रृंगार से बेखबर यथार्थ के पटल पर बंद आंखें किए, आज वो थोड़ा जटिल था।।
एकांत की भीड़ से निकलकर , शोर में सन्नाटे लिए छोड़ अपनी तप वो, क्यूं बेसुध पड़ा
लालिमा वाली भोर तले, सारी आसक्तियों को छोड़ पांवो तले, वो जीवन पर क्यूं अड़ा।।
किशोर भरी उम्र लिए सारे भोग से भागकर ,हसीन लम्हों को नापकर जो भेष जोग का पहन लिए
सामने वाली परवाह ना थी,उम्मीदों वाली गवाह ना थी, बस तपते तलवे लिए,जो नंगे पांव चल दिए ।।
सन्यास के सफर पर त्याग भरे वैराग्य की साधना में ,अब हर सफर सोच की, एकांत में होगी
मन के भंवर के पार खड़ा, हर सौभाग्य की भावना में, अब तृष्णा वस्तु की, अंत में भी ना होगी।
मोह की माया से परे ,जन्मजननी को छोड़ खड़े, अब वैराग्य के सफऱ पर एक नया जीवन-सुर बनाना है
जन्म -मृत्यु का चक्र छोड़ ,हठ योगी बन सुर सारंगी लिए ,अब वो गेरूआ वाला अंगवस्त्र ही अपनाना है ।।
गुजर गई सारी बातें, बीत गई बरसों रातें , सो गई कईयों की सांसे, लौट रहा हूं कुछ अंत का अनंत लिए
माघ वाली महादिशा की ओर, बदल रहा है उर्जा का प्रवाह हर ओर, चल रहा हूं सोच में अब भी वही संत लिए।।
फिक्र का जिक्र है थक सा गया सफर सोच का, थक सी गई है वो हिमालय वाली कांपती बूढ़ी टांगे
लौट रहा बेफिक्र ख्याल मन का, वैराग्य हुआ पराया, मोह का बचा ना माया, फिर भी ये मन क्यूं तन ही मांगे ।।
सवालों की उलझनों में सिमटा हूं, बंद आंखें लिए अब ना जाने क्यूं सामाजिक सोच में लिपटा हूं
तोड़ पाउंगा उन जंजीरों को उंगलियों से, हर जवाब की ताक में अब तो अंधेरों से ही सिमटा हूं।।
दुनिया देख रही अंत के अनंत को ,फिर भी
शिखर से बूटियां बटोरता हिमालय की तराई में सोता, आज वो नंगा साधु शिथिल था
मानव श्रृंगार से बेखबर यथार्थ के पटल पर बंद आंखें किए, आज वो थोड़ा जटिल था।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Location:
Mumbai, Maharashtra, India
Thursday, July 11, 2019
।।सारी दुनिया उसकी लिखी हुई एक आखिरी साजिश है।।
| Writer & Director Rajnish BaBa Mehta |
सारी दुनिया उसकी लिखी हुई एक आखिरी साजिश है
रेंगती राहों पर ये जिस्म मानो उसकी बरसों की ख्व़ाहिश है ।।
अब तो टूटते हैं बदन लगता है मौत से पहले की आजमाईश है,
ख्व़ाबों के खाक तले, माथे पर चांद लिए, ये खुदा की कैसी आराईश है।।
मन सोचता संयोग से वियोग में तराफ कर हर हर्फ़ मिट जाएगी
खुले दरवाजों की सांकल तले बैठा है, जैसे रूह पल में सिमट जाएगी।।
सारी दीवारें सियाह हो गई,अब वो लाल लफ्ज तक का रास्ता यूं ही कट जाएगी
गुजर गया ज़माना गले लगाए हुए,अब तो उसकी साजिशों के तले अंजाम भी भटक जाएगी।।
मन सोचता है, कि फ़ैज अपनी कब्र पर कौन सी मर्सिंया किसे पैगाम कर रहा होगा
भरी जुगनुओँ की भीड़ में फ़िराक़ सुपुर्द-ए-ख़ाक होने पर भी किसकी फिराक में होगा।।
वो इलाहाबाद का अकबर ना जाने किससे कल्त की बात कर आह भी ना भर रहा होगा
साजिशों की साज तले वो बादल ना जाने कल किसकी गुनाह पर आंसू बहा रहा होगा ।।
कब्र की कैद में जकड़े हजारों शायर, हुजूर की लिहाज में ना जाने किसका लिफाफा लिख रहा होगा
धुआं बनकर उड़ते दिनकर ना जाने कुटुंब कृष्ण से महाभारत का कौन सा गूढ़ रहस्य समझ रहा होगा ।।
संगम में सोए सूर्यकांत निराला,इलाहाबाद के पथ पर टूटते पत्थर की आवाज में मर्म ही ढ़ूंढ़ रहा होगा
इमरोज की पीठ पर सोई अमृता को, साहिर ना जाने कौन सी सूनी दुनिया में अकेले तलाश रहा होगा ।।
अरसों से बरसों तक बेबसी का ये अजीब सा आलम है ,
खुदा से रिश्ता-ए-हस्ती की फिराक में मौत ही मयस्सर मातम है ।।
खुद को आजमाउंगा मैं भी उसी रोज,जब इल्म होगा कि यही आखिरी ख्व़ाहिश है
देखूंगा नज़र से, कि कैसे सारी दुनिया उसकी लिखी हुई एक आखिरी साजिश है ।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Labels:
कविता चौरंगा विधा,
कहानीबाज,
रजनीश बाबा मेहता
Location:
Mumbai, Maharashtra, India
Friday, June 7, 2019
।। तू कभी ख़फ़ा ना होगी।।
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| Writer, Director Rajnish BaBa Mehta |
बंद आंखों वाली अकेली अल्हड़ इश्क़ है जो कभी ख़फ़ा ना होगी
खुली आंखों से जो देखूंगा ख़्वाहिश को वो कभी बेवफा ना होगी ।।
शाख-ए-गुल को जला दी उसने, जो हर हर्फ़ तले कभी दफा ना होगी
शहरे-ए-राख से आबाद हुआ जिस्म, कि कोई कब्र अब ख़फ़ा ना होगी।।
स्याह धुंधली धुंध के तले ख्वाहिशों के मोड़ पर अब उमर-उमर की ही बात है
लाल जिस्मों तले तुझे देखकर ऐसा लगा मानो बचपन से फिर मुलाकात है ।।
रब का वास्ता है तुझे छोड़ आना फिर मुझे उसी अधजली गलियों के मुहाने तले ,
जब आखिरी रात बीतेगी तब एहसास होगा उस रोज भी कि मौत की ही तो बात है ।।
फकीरों सा नाउम्मीदी का दिल लिए अब एहसास वाला सफ़र नाकाम ही तो है
सदियों से लंबी मगर सोई है शाम वाली हसरतों के तले वो बेज़ुबान शाम ही तो है।।
इक फुर्सत-ए-गुनाह के पैमाने पर चलते-चलते थक सा गया वो पांव वाली पयाम ही तो है
देखा है झरोखों से मर्सिया गाते उसे, पहचानने की फिराक़ में उमर गुजर गई मगर वो राम ही तो है ।।
सोच आउंगा तेरी समंदर सी सिराहनों को जो तू अब कभी ख़फ़ा ना होगी
राह-ए-मंजिल के दरम्यां समेट लूंगा तूझे आगोश में जो तू अब कभी बेवफा ना होगी।।
जलाउंगा तेरी ज़िद में जिस्म को, जो तू अब कभी खुद की मौत के बाद भी दफा ना होगी
मेरा शहर रूह-ए-राख तो होगा, लेकिन नफ़्स(आत्मा) की आंसू तले तू अब कभी ख़फा ना होगी ।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Labels:
रजनीश बाबा मेहता की कविता
Location:
Daman, Daman and Diu, India
Thursday, May 9, 2019
।।गुजारिश बीती बात की, गुजारिश जज़्बात की।।
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| Poet, Writer, Director Rajnish BaBa Mehta |
गुज़ारिश बीती बात की नहीं, गुज़ारिश इस बार जज़्बात की है
ख़्वाब तले जो लफ़्ज़ समेटे हैं, बात उन लफ्जों के बरसात की है ।।
सीधी उँगलियों से खिचीं है टेढ़ी लकीरें, उन लकीरों पर अब थोड़ी घात सी है
संकरी गलियों में खड़ी है सामने, ना जाने क्यूं लगता अब वो आखिरी मुलाकात सी है ।।
रूख़सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ के शामों में बुझती शमाओं की फ़ितरत भी अजीब है
मेरे फिगार-ए-बदन तले बुझते दीयों में दिखता आज मेरा सूर्ख लहू कुछ-कुछ ग़रीब है।।
जुमलों की नुमाईश है,आखिरी शौक़ की आजमाईश है, फिर भी गले में क्यूं सूखा सलीब है
मुर्ग़-ए-बिस्मल की मानिंद जनाज़े के क़रीब लेटा है, खुदा की ख़ैर तले फिर भी तू मेरा आखिरी रक़ीब है।।
तंगदस्ती के मौसम में सोच लेता सच्चे फ़क़ीर-ए-साज तले,
खुद को ढ़ूंढ़ लेता दर्द की बारगाह में कभी मेरी आवाज तले।।
खानक़ाह की ज़द में खड़ा था,परियों जैसी हुस्नों-ओ-फ़क़ीर के मेले में
अल्लाह से आखिरी इबादत की है, क़यामत वाले रोज ना फसूंगा तेरे झमेले में।
काग़ज़ों के किनारे काली स्याही की शक में ज़िंदा रहूंगा तेरी संवेदनाओं के सहारे
मोल सिर्फ जिस्मों का होगा, चर्चा सिर्फ जम्हूरियत में होगी, जब बहेगी राख गंगा किनारे।।
तेरी आखिरी पैगाम पर क्यूं आया, कोसता हूं यतीम लहू को, अब जो सफेद चादर लिए ज़र्द रात पुकारे
उम्र-ए-रफ्ता की फिक्र में गुजर गई गलियों के गोशे में जिंदगी, अब ना बैठूंगा कभी ख़ुदगर्ज ख़ुदा के सहारे ।।
लो चला मैं अफ़सुर्दा अफ़सानों की फ़िराक में , बातें ना अब कभी होगी सुराख में,
इस बार फिर गुजारिश बीती बात की नहीं, होगी आखिरी गुजारिश तेरी-मेरी जज़्बात में ।।
सीधी उंगलियों से जो खिचीं होगी टेढ़ी लकीरें, उन लकीरों पर चर्चा ना होगा कभी घात में ,
फरिश्तें तो सदियों से बैठें हैं इस फिराक में, कि कुछ तो बात होगी तेरी-मेरी आखिरी मुलाकात में।।
रूख़सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ - प्रेम के कारवां की विदाई।। फ़िगार-ए-बदन - ज़ख़्मी शरीर ।।सलीब - सूली का चिह्न।।मुर्ग़-ए-बिस्मल- घायल परिंदे की तरह ।। रक़ीब - दुश्मन ।। तंगदस्ती-दरिद्रता ।।खानक़ाह-सूफ़ियों का आश्रम ।।उम्र-ए-रफ्ता -बीती हुई उम्र ।।गोशे- कोना।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Saturday, April 13, 2019
।। हिम्मत ना हारेगी तरल हार ।।
तमन्नाएं होश की है, जो राहों में हौसलें अब यूं ही गिरवी हुई ।।
हर पल हार का ज़िक्र है, मगर ज़ेहन में जीत अब भी सिमटी हुई,
वक्त की है थोड़ी आजमाईश, जो आराईश कहानियों पर टिकी हुई ।।
सांझ की कोलाहल तले बिखरती ज्योति ना जाने अब क्यूं घनी हुई,
काले घुमड़ते बादलों के बीच छोटे तारों जैसी ना जाने सोच अब भी क्यूं फंसी हुई।।
मांझी के पतवारों के बीच निर्जन सागर की कोलाहल तले क्यूं खड़ी हुई
चित्र-पट की माया पर सोचता हूं, ना जाने क्यूं मेरा सत्य सफर में उलझी हुई।।
भोर वाली सवेरा हुई जागो जीवन के प्रभात हिमनद पर खड़ा हूं मैं
खो गया था विश्वास, लौट आया जीवन का श्वास जो दीवारों पर टिका हूं मैं ।।
अब हर पल्लव पुलकित होंगे, आशा मेरे अंकुरित होकर जो झूमेंगे
देख लेना माली, हर उपवन की क्षितिज पर अब कोई ख्वाब ना टूटेंगे।।
कसक कूक सी उठेगी, जो काली आंखों वाली अंधकार पर होगा वार -प्रहार
मद चेतना जागेगी , मधुर व्यथा लिए शून्य चीर पर बनाएगी अपना आकार।।
सपनों के बादल फिर बुनेंगे जो मिलेगी रात के अंधियारों तले कहानीबाजी का दुलार
हर हौसलों तले अबस जीत का जश्न होगा, हारेगी ना हिम्मत अब कभी तरल हार।।
कातिब कहानीबाज & सिनेमाई साधू
रजनीश बाबा मेहता
Location:
Daman, Daman and Diu, India
Saturday, March 23, 2019
।। मुझे जोगी ही रहने दो।।
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| Poet, कहानीबाज & सिनेमाई साधु & Director Rajnish baba Mehta with marry kom |
एक कहानी कह लेने दो
वो आखिरी निशानी छू लेने दो ।। .
इस बार प्यार नहीं, परिभाषा बदलेगी
बस उसके जज़्बातों को लबों से छू लेने दो ।। .
सफर में अगर कभी रात होगी, तो होगी रोशनी
उस चाँद को अपनी चांदनी तले, सूरज को छू लेने दो ।। .
महफ़िल लगी है सरेबाज़ार चैराहों पर लफ्फाज़ी की
आखिरी लफ्ज़ की तलाश में, अब उस नापाक इश्क़ को छू लेने दो ।।
सूर्ख धागों से बुनी लिबासों लाल की लालच नहीं है मुझमें,
जो किरदार पसंद है मुझे , हर पल मुझे उसी में रहने दो।।
ये तो वक्त की बेवक्त आवाज है, वरना हम भी जागते जोगी हैं,
ऐ क़यामत-ए-खाक़ गुजारिश है तुझसे ,कि मुझ जोगी को जोगी ही रहने दो।।
ये लम्हा तो वक्त के पल दो पल की बस आजमाईश सी क्षणिक है,
फिसलती रेत की जैसी अपनी आवाज तले,अब मुझे मेरे ख्वाबों में जीने दो।
पता है मुझे खुद के सांसों की, जो हवाओं के परों पर खूब पलती है
सुनहरे सपनों की चादर तले रोज सोता हूं, कि अब मुझे मेरे हक़ीकत में जी लेने दो।
कातिब &कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Location:
Daman, Daman and Diu, India
Tuesday, March 12, 2019
।।खुद की आजमाईश।।
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| Poet, Writer & Director Rajnish BaBa mehta |
दो लफ्जों वाली सुनी-अनसुनी बात है,
शायद आज खुद से आखिरी मुलाकात है।।
रोती राहों में ढ़ूंढ़ती तमन्नाओं की अकेली आस है,
ना जाने क्यों जिंदगी लगती बाजी की आखिरी बिसात है।।
सोच के परों पर साहिल समंदर तले सिसकती सांस सी है
जो उठी है लहर रेत तले वो लौ जैसी भभकती फांस सी है ।।
बोझिल कदमें ,बोझिल लम्हें झुलसती हवाओँ में कहती काश सी है,
ये आऱाईश वक्त की जो ठहरा है रक्त में वो कैसी आजमाईश सी है ।
गलियों से गुजरती शाम वाली भोर तले, शक क्यों है खुद की साख पर
बहार-ए-हिज़्र में तौला है खुद को, फिर भी ना जाने क्यों खड़ा हूं राख पर।।
दिल दिलासाओँ के भंवर में तैर रही, फिर भी तमन्नाओँ वाली बात क्यों खाक पर।
ना कोई दवा है ना कोई मशवरा-ए-दुआ है, फिर क्यों खामोश हूं खुद की फिराक़ पर ।।
सफ़र की सोच तले अब सजा रहा हूं खुशी चेहरे पर
जो काफ़िया ग़म का कभी गोशे में उभरने ना दिया ।।
गुज़रे ज़माने की बात कर, हर लम्हों को यूं ही खराब ना कर
क्योंकि ख्वाहिश वाली मसर्रत जिंदगी को उस पल जो संवरने ना दिया ।।
ख्वाबों वाली अब भोर भी होगी, ख्वाहिशों वाली अब शोर भी होगी ,
अंधेरी कासनी रातों तले जो गिरे आंसू, वो भोर में उम्मीदों वाली सैलाब होगी।
सफर सोच की हर पल ज़िंदा जैसी होगी , गरीबी में भी अब गुरबत वाली बातें ना होगी।
मकाम जब जश्न की होगा, तो रोशनी तेरे घर भी होगी , रोशनी मेरे घर भी होगी।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Labels:
रजनीश बाबा मेहता की कविता
Location:
Daman, Daman and Diu, India
Sunday, March 3, 2019
।।कब्र वाला मंदिर।।
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| POET, WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA |
हर साख वाली गुरूर जहां राख हो जाती है
जहां हर सख्त वाली तख्त भी भंवर हो जाती है ।
महलों की जागीर यहां , मनहूस मातम मनाती है
कब्र की जद में लेटे हैं , ख्वाबों को अब भी समेटे हैं।
किस्मत का फेर है कि, यहां कब्र भी मंदिर कहलाती है ।।
मासूम मखमली बदन तले लपेटकर, सदियों के लिए सोए हैं
अपनों की भीड़ में लेटे हुए, ना जाने क्यों पूरी दुनिया से खोए हैं ।
ख्वाहिश-ए-ख़ाक हुई, जिस्म राख हुई, फिर भी अकेली आंखे जो रोए हैं
जली है चिताएं चौबारे पर बारी बारी, फिर भी बीज ना जाने क्यों बोए हैं ।
किस्मत का फेर हैं कि धूप तले आज भी, यहां कब्र ही मंदिर तले सोए हैं ।।
कभी जो गुरूर गौरव था , कभी जो गुरूर आन था, कभी जो गुरूर गान था
अब सूखी मिट्टी तले वो गुरूर, श्मशान में बस सोती सिसकती शान था ।
महलों तले कभी इठलाती जिंदगी, अब वो मौत के सामने सिर्फ अपमान था,
काश रोक लेता लम्हों को, रोक लेता सांसो को, जो आखिरी समर तेरा शेष था।
किस्मत का फेर है कि, उस वीरान में अकेला तेरा कब्र , रूठे मंदिर जैसा ही था ।।
जो खुला घर छोड़कर जाएगा , ना कभी तू लौट कर आएगा
सख्त वाली तख्त कि फिराक में, अब कभी पैबंद ना तू लगा पाएगा ।
सदियां शौक से सुनेगी तेरी दास्तान, जो तू अब मिट्टी का मूर्दा हो जाएगा
जिंदगी की बिसात पर, चली है मौत आखिरी चाल, जब फिरदौस भी फना हो जाएगा ।
किस्मत का फेर है, कि फिर भी तेरा वो वीराने वाला कब्र, मंदिर ही कहलाएगा ।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
नवंबर 2018 में गोल्डन सिटी जैसलमेर की यात्रा के दौरान कई कहानियों को तराशने की फिराक में था। हालांकि अपने सबसे बेहतरीन दोस्त के साथ जैसलमेर में एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था, और इसी बहाने मुझे कहानीबाजी करने का मौका मिल गया। फिर क्या था जैसलमेर की हर गलियों की धूल मेरे पैरों पर चिपकती चली गई। हर गली में कोई ना कोई महल, औऱ उस महल के पीछे उसकी अनगिनत दास्तान। कुछ सुनी-सुनाई तो कुछ अनसुनी कहानियां अपने झोले में समेटते जा रहा था। इसी दौरान मैं एक ऐसे जगह पर जा पहुंचा जहां सिर्फ और सिर्फ मंदिर के गुबंद बने हुए थे और नीचे छोटा चबूतरा। एक पल के लिए तो लगा कि मंदिरों का शहर है कहानियां तो इसके पीछे होगी जरूर, लेकिन पता चला कि वो मंदिरों का शहर दरअसल जैसलमेर राजघराने का श्मशान घाट था । कितनी अजीब है मौत की परिकल्पना, औऱ कितने अजीब हैं उसके रिवाज। सोचने पर कभी कभी दम घुटने लगता है क्योंकि कुछ इंसान अपनी मौत में भी जिंदगी देखता है। मरघट में भी राजसी अंदाज में जीने की परिकल्पना करता है, लेकिन शायद उसे पता नहीं कि लिबास कोई भी हो, शरीर का आखिरी अंजाम मिट्टी ही है।
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| JAISALMER YATRA ।।कब्र वाला मंदिर।। |
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कहानीबाज,
जैसलमेर,
रजनीश बाबा मेहता,
रजनीश बाबा मेहता की कविता
Location:
Jaisalmer, Rajasthan 345001, India
Sunday, February 10, 2019
।।ख़त तेरे लिए।।
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| poet, writer & Director Rajnish BaBa Mehta |
जमाने बाद लिखा खत, मैंने आज
पुरानी गलियों के दरवाजे से बाहर निकला आज
कुछ रिश्ते पीछे छूटे , छूट गया कुछ पुराने दोस्तों का मेला
जिसके साथ खेला था, मैंने नंगे पांव ज़िंदगी का खेला।
सब्र के लिए शुक्रिया कहा औऱ आंसू लिए निकल पड़ा
चंद कदम बाद अहसास हुआ, शरीर ही तो है आत्मा थोड़ी ना निकल पड़ा ।
पहली बार लगा, मेरे शब्दों की आवाज थी नहीं आज
काश बिना बोले समझकर, मुझे शुक्रिया ही कह देते आज।।
ना कोई गिला है ना कोई शिकवा है, बस थोड़ी रिश्तों की बेबसी है
लेकिन कहीं पहुंचने के लिए ,कहीं से निकलना ,ना तेरी ना मेरी बेबसी है।
उम्मीदों की आंच पर, वादा है मेरा, दुआओं में नहीं हकीकत में होगा साथ
नए रास्ते, नई सोच, नए सपने, नई ख्वाहिशें लिए ढ़ूंढ लेंगे गोशा फिर तेरे साथ।।
।।गोशा - कोना ।।
साथ देने के लिए शुक्रिया
क़ातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Sunday, February 3, 2019
।।अफ़सोस ढ़लती उम्र का ।।
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| Writer, Poet, Director Rajnish BaBa Mehta |
तारीख़ों की तफ्तीश में अब उमर आग सी लगती है,
जश्न कभी ज़िंदगी,इश्क की तलाश में, अब फाग सी लगती है ।
ख़्वाहिश खोखली हुई हर गोशे में, क़दमों तले रास्ते लाल सी लगती है,
ख़्यालों की सतरंगी धुन है, मगर वो पाज़ेब की धुन अब भी राग सी लगती है ।।
शिकायत शिकवों से नहीं, शिकायत लम्हों से नहीं,
हर पन्नों पर बिखरे लफ़्ज़ों जैसी, शिकायत सांस सी लगती है।
जो मिला है हसरतों से हसरतों में, अब उनसे गुजारिश नहीं होती,
बीते आइनों की शक्लें धुंधली सी है, आज भी वो मेरे जिस्म में जिस्म सी लगती है।।
वक्त की आड़ में सफ़र सोच सी नहीं, एक उमर सी लगती है,
किसी का बेहद-बेपनाह अकेलापन, वो आखिरी मोहब्बत सी लगती है ।
जो खो गया वो वक्त की तफ्तीश सी थी, मगर मलाल दिल में ज़हर सी लगती है,
गुजरे वक्त में भी पाने की तमन्ना तो है, लेकिन बालों को देख,जिंदगी एक उमर सी लगती है ।
सफर पीछे का है जनाब , अब बढ़ते कदम अफ़सानों सी क्यों लगती है,
फिर से जवां होने की खातिर, उस आने वाली बुढ़ापों से डर क्यों लगती है ।।
हर वक्त के पहर दर पहर में , अबस मौत की सोच कुछ इस कदर लगती है,
अफ़सोस इश्क को पाने की नहीं , अब अफ़सोस ढ़लती उमर की ही लगती है।।
कातिब, कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
Location:
Daman, Daman and Diu, India
Thursday, January 17, 2019
।।अब ज़ुबान मजबूर ना होगी।।
| POET, WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA |
अपनी मशरूफ़ियत में मगरूरर थे, मगर जनाज़े से पहले जिंदा जिस्म लिए मजबूर क्यों
हुनर हौसलों की उड़ान पर गुरूर में थे, मगर शाम वाली रात से पहले मजबूर क्यों ।।
संवेदनाओँ वाली लहू आंखों में लाल से थे, मगर आंसू से पहले काजल मजबूर क्यों,
रंजिश ज़ेहन में, जागती जिस्म को जगाते थे , मगर ज़ुबान आज खुद से मजबूर क्यों ।।
गुजरते वक्त को ज़ेहन में झंझोर सा दिया, आज़िम आदत मानो मेरी हंसी पर रो सा दिया
वक्त के पैमाने में खुद को बंद कर बैठा हूं, वो जवानी मानो मेरी मजबूरी पर रो सा दिया ।।
खुदगर्ज़ी की खोज में ख्वाहिश ख़ाक सा कर दिया, झूठे लिबासों में जिस्म आज रो सा दिया
बांध कर बेड़ियों में चेहरा सियाह ज़र्द सा कर दिया, भरी महफ़िल में हालात हुस्न पर रो सा दिया।।
गोशे में बैठा हूं गिला गुलशन से नहीं, आक़िबत की फिराक में अर्जमन्द आक़िल से कहता हूं
लम्हों की है थोड़ी आजमाईश ,अब तुझसे नहीं, बादलों में बसी आफ़ताब की रोशनी से डरता हूं।।
ये जो वक्त तेरा है, वो वक्त जो मेरा नहीं , सामने खड़े ज़फर से अब गुज़ारिश नहीं तल्ख़ कहता हूं
मर्यादा मान की होगी, सम्मान मेरे अभिमान की होगी, ज़ुबान अगर जली तो जिस्म राख सी होगी
आखिरी लफ़्जों की बारिश है, सफर मर्ज़ी का आवारामिज़ाजी है,अब ये बात तुझसे नहीं फरिश्तों से कहता हूं ।।
अबस अपनी मशरूफ़ियत फिर मगरूर होगी, जो ज़िंदा जिस्म जनाज़े से पहले मजबूर ना होगी
हुनर हौसलों की उड़ान पर गुरूर होगी, जो शाम वाली रात से पहले मजबूर ना होगी।।
रूख हवाओं का होगा जिधर हम होंगे , जो महफिलों में अब हुस्न मजबूर ना होगी
नसीब मुसाफिर का , अब मुझसा होगा, जो ज़ुबान अब कभी खुद से मजबूर ना होगी ।।
कातिब &कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
आज़िम= दृढ़ ।। गोशा - कोना।।गिला= रोष, शिकायत।।गुलशन= फूलों या गुलाबों का उपवन।।आक़िबत= अन्त,भविष्य।।अर्जमन्द= महान।।आक़िल-बुद्धिमान।।आफ़ताब= सूर्य ।।जफ़र= विजय, जीत, लाभ।।
Sunday, December 23, 2018
।।मकबरे पर रोती है रानियां ।।
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| POET, WRITER, DIRECTOR RAJNISH BaBa MEHTA |
गुजारिश गुलजार की है, बेबसी के सहारे
मकबरों की मातम में है, रानी बादलों के सहारे ।।
गुजरी सदियां, गौहर की बातें अब यादों के किनारे ।
इश्तियाक़-ए-इश्क़ की फ़िराक में अब फिरदौस भी,
फ़सानों सी वो नदिया रेत सी बनकर, चांद को रोज पुकारे ।।
रात की रंजिश बनकर शाम वाली मोहब्बत, ख़्वाब से यूं कह दे
बंद कर आंखें ,अब तेरे क़सीदें में, हम खाक बनकर ही रह लें ।
हर गिरहों को खोल, दरवाजे पर खड़ी होकर रात से ही कह दे।
काफिला बेनसीब बनकर, तेरे साहिल से प्यासे गुजर जाते हैं
किसी रोज झूठे लफ्जों की बारिश पर, अपनी बदन की सारी बिसात ही रख दे ।।
खुदमस्ती की ख़ातिर अब राख भी है , आखिरी साख के सहारे
धड़कती नब्जों में आखिरी इश्क पेवस्त है, लहू वाली आग के किनारे ।।
रोक ना पाया, तेरे जनाजे की जागीर को, फिर भी घूंघट से तूझे ही पुकारे।
कुछ कदमों की बात है, सुलगती गाह वाली बारगाह से अब मुलाकात है
लो अब जला है ज़र्द जिस्म, नंगी रूह लिए, नदियां रावी-चेनाब के किनारे ।।
लौट रहा हूं सूरत-ए-सांस भरकर , जाओ कोई उसकी गलियों के मुहाने से कह दे
मिलूंगा उस रोज जब शक होगी सांसों पर, जाओ ये बात कोई फरिश्तों से कह दे ।
बीरान मकबरे पर अब रोती है रानियां , ये बात कोई महलों वाले फकीरों से कह दे
रूकूंगा ना मेलों में अब मातम मनाने, रूकूंगा ना हरे दुपट्टे का शामियाना बनाने
अब मेरा बसेरा तेरे शहर के किनारे पर होगा, जाओ ये बात कोई उसके कब्र से कह दे। ।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता
इश्तियाक़= चाह, इच्छा, लालसा ।। फ़िरदौस= स्वर्ग, उपवन ।।
Location:
Daman, Daman and Diu, India
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