Wednesday, November 20, 2019

।।कभी ना कभी हमारी बात जरूर होगी।।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta 


रूह में रहता हूं , हर बात सांसों से कहता हूं ।
फ़िराक़ अश्क की नहीं, आइनों में यू हीं बसता हूं।।
सफर सांझ की हो, तो ही आखिरी बार डरता हूं
सुकून पाने की तमन्ना में, हरपल एक ही लफ़्ज कहता हूं।।
तुम मेरी ख़्वाहिशों को यूं हीं खाक ना बनने देना
जो राख वाली बातें तुम्हें सपनों में साख जैसा सिखाता हूं ।।
ढ़लती शाम वाली पंखों से बिना जुगनुओं वाली रोशनी जो जलाता हूं।
सितारों की ख्वाहिश में, अब अकेली उस चांद की बातें ही बताता हूं,
कि कभी-कभी बादलों से भी अक्स नजर आता है ।
उस धुंधली गुमनाम गलियों से जब भी झांकता हूं
टूटे हुए झरोखों पर हमेशा वही शख़्स नजर आता है ।
फेर लो रोशनी में बुझती चरागों का मुख
जो अब काली रातों में सिर्फ जज़्बात ही नज़र आता है।
अब बस
उम्मीद होगी….
इतंजार होगा…
पुकार होगी….
सफर सांझ की होगी…
हम मिले ना मिलें कभी ना कभी हमारी बात जरूर होगी।




Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta 

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, November 14, 2019

बमहम: बरसों की मेहनत से बनी एक आवाज

Rajnish BaBa Mehta With Unique Instrument BAMHAM

Rajnish BaBa Mehta With Unique Instrument BAMHAM





























खुद से खुद की मुलाकात, अक्सर यूं होती नहीं, 
अपनी हसरतों की तले, कभी खामोश बात होती नहीं।।
उलझे धागों की तरह जिंदगी सुलझाने की तमन्ना तो है 
बिखरे पन्नों पर ख्वाहिशों के, जज़्बात अब समेटी जाती नहीं।।
बेवक्त बेरूखी लिए किसी की धुन पर, अपनी राग छेड़ने की फिराक में हूं
परिंदों की जागती ज़िदगी को देख, अब अपनी उड़ान भरने की इंतजार में हूं।  
लो लिख दिया तुम्हारी बातें, अब तो गुनाहगार होकर भी ठहरने की फिराक में हूं। 
बरसों बीत जाते हैं, कभी कभी एक बात कहने में,
हर बार जमाने गुज़र जाते हैं, कभी-कभी अपनी ख्वाहिश संजोने में।।
उम्र गुजर गई एक सपने को पूरे करने में। 
आज सोचता हूं कई रातों की मेहनत के बाद,
एक साज बनाया, एक श्रृंगार बनाया 

बरसों की मेहनत से, एक आवाज बनाया ।।


नार्थ इस्ट की यात्रा के दौरान नागालैंड के दीमापुर में हमारी मुलाकात मोआ सुबॉंग से हुई। मोआ ने बमहम नाम का एक म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट बनाया। जिसके लिए उसे राष्ट्रपति के हाथों नेशनल अवॉर्ड भी मिल चुका है। 

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 

Tuesday, November 5, 2019

।। रूह फिर भी ।।

writer & Director Rajnish BaBa Mehta कहानीबाज
writer & Director Rajnish BaBa Mehta कहानीबाज





।। रूह फिर भी ।।

एक रोज नाप लूंगा ज़िदगी 
सफर सांझ होगी फिर भी ।। 
ढूंढ लूंगा ख़्वाहिशें अब 
रास्ते मुड़ती होगी फिर भी ।।
झांक लो तस्वीरों में मेरी 
तिरछी लकीरें होगी फिर भी।।
आना कभी खिड़कियों की सिराहने तले 
घनी अंधेरी रात होगी फिर भी ।। 
ख़्वाबों की तलाश में ख़ातिर खूब हुई 
टूटी है उंगलियां थाम लेना हाथ फिर भी ।। 
पुस्तक लिए बैठा हूं मस्तक की तलाश में 
मिल भी जाऊं गैरों की जमीन पर मुलाकात कर लेना फिर भी ।। 
काली लकीरों ने सूर्ख़ रास्ता दिखा तो दिया 
ना जाने फ़िक्र की तलाश में मन क्यों भटक रहा है फिर भी ।।
उस रोज के आने का डर है जहां मौत मयस्सर है 
बंद होगी जब आंखें ढ़ूंढ़ लेना खुद की रूह को फिर भी।।



कातिब & कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 


writer & Director Rajnish BaBa Mehta कहानीबाज

writer & Director Rajnish BaBa Mehta कहानीबाज

Tuesday, October 22, 2019

।। तो ही ज़िंदा हो तुम।।

WRITER & DIRECTOR Rajnish BaBa Mehta 
WRITER & DIRECTOR Rajnish BaBa Mehta
दो दिलों के बीच दीवार हो, तो ही ज़िंदा हो तुम,

खामोश ख़्वाहिशों के बीच जज़्बात हो, तो ही ज़िंदा हो तुम।
अकेली रातों में सीढ़ीयों तले साथ बैठे हो, तो ही ज़िंदा हो तुम,
अंधेरे ख्वाब में दो मुर्दा जिस्म के लब लाल हो, तो ही ज़िंदा हो तुम।

बेबसी बात की नहीं हमरात वाली बेपरवाह सी हो, तो ही ज़िंदा हो तुम,
पहली मुलाकात में जीने लगी आखिरी जिंदगी , तो ही ज़िंदा हो तुम ।
उंगलियों की सिहरन तले हाथों को थामे हाथ, काफिलाओं की सजी जो बारात, 
वो शरमों हया तले झुकती आंखें लिए गुम हो, तो ही ज़िंदा हो तुम ।

रिश्तों की सारी गिरहें खोल, ख़्वाबों को खुद की लबों से बोल,
फिर भी तेरी-मेरी राहों में डर का है साया, तो ही ज़िंदा हो तुम।
गुजरे वक्त को पाने की तमन्ना में, अफसोस की स्याही हुई गहरी, 
कोरे कागजों पर अगर खींची तूने तिरछी लकीरें, तो ही ज़िंदा हो तुम।। 

वो अनजानी राहों पर अनजाना सफर,जानी-पहचानी तारीख छोड़ गया, 
कई रास्तों पर बेनाम रिश्तों की निशानी छोड़ गया, तो ही ज़िंदा हो तुम ।
बंद दरवाजों के पीछे आखिरी रात वाली कई सवालों का जवाब, एक ही छोड़ आया, 
कि तूम रूह बनकर आ जाओ औऱ मैं सुकून हो जाऊं , तो ही ज़िंदा हो तुम।

दो दिलों के बीच दीवार हो, तो ही ज़िंदा हो तुम,
खामोश ख़्वाहिशों के बीच जज़्बात हो, तो ही ज़िंदा हो तुम।
अकेली रातों में सीढ़ीयों तले साथ बैठे हो, तो ही ज़िंदा हो तुम,
अंधेरे ख्वाब में दो मुर्दा जिस्म के लब लाल हो, तो ही ज़िंदा हो तुम।

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता

Monday, October 21, 2019

आखिरी सफर मौत !


Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 

जिंदगी एक सफर है 
औऱ हम उसके मुसाफिर 
कारवां भी है 
औऱ हम उसके हमसफर । 
आज यही सोचा है 
रास्ता हमेशा चलता रहता है 
लेकिन कभी वो थकता नहीं । 
पथ भले ही पथरीले हो,
 लेकिन घाव गहरे नहीं। 
चाल भले ही धीमी है 
लेकिन हौसला रफ्तार पर है।
बढ़ने से गुरेज नहीं 
क्योंकि पहुंचने की जल्दी जो नहीं। 
इन सारी खुशियों को समेट कर 
सारी संजीदगियों को सोच लिया 
अब कभी खत्म ना होगी सफर 
क्योंकि बढ़ने से गुरेज जो नही हैं। 
सोच लो आजमा लो 
क्योंकि एक रोज मौत होगी आखिरी सफर।

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 


Friday, September 13, 2019

।। मसर्रत-ए-महफ़िल ।।



WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA



ख्वाबों के करीब से कुछ रास्ते यूं ही गुज़र गए 
फासलों के बीच कुछ मुसाफिर यूं ही रह गए। 
बरसों बाद सामना हो ही गया मसर्रत-ए-महफ़िल में
सलमाती ज़बान लिए इस बार भी यूं ही खामोश रह गए। 

अरसों पहले जिसकी जिक्र में फिक्र हुआ करती थी, 
उम्र की रेल पर चढ़कर सफर की गीत गाया करती थी, 
खो जाने के ख़्याल से जिसकी शामें लम्बी हुआ करती थी, 
आज वही परदानशीं होकर बेफिक्री का आलमी गीत सुना रही थी। 

उस रोज वक्त की दरख़्त तले हर हौसला यूं ही कमजोर था,
लेकिन सियाह समंदर पर रेंगती लहरों की धार पुरजोर था। 
खो रही हसरतें हृदय की, फिर भी जीवन प्रवाह का अकेला शोर था,
जिस्म पर कस्बाई लिबास लिए,उजालों में भी घटाएं घनघोर था।। 

संघर्ष उस मुक्त वाले मार्ग का है, जहां का दरवाजा हमेशा से खुला था,
शंख फूंकता अस्त सहस्त्र नंगे बदन, जिस पर चला वो आखिरी मार्ग था। 
विकल मिट्टी का मानव जो रो रहा, सदियों पुरानी अकेली रीत निभा रहा,  
राख बनकर धुएं में जो खो गया, वो इस मिट्टी का ही इकलौता रिवाज था।

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता
कहानीबाज रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, September 4, 2019

।।कोई ख़्वाब सा, तो कोई रूह सा है।।

Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 
कोई ख़्वाब सा, तो कोई रूह सा है  
आज इस भोर में क्यों कोई मग़रूर सा है ।।
क्या कहूं लफ्ज़ ख़ुद में लाल है
तेरा वो छोटा वाला इश्क़ यूं ही बेमिसाल है।। 
लौट आना कभी तंग गलियों में
जहां हर किसी को सिर्फ तेरा ही ख़्‍याल है ।।
बरसों बीती ख़ुश्क रातों में,
जमाने बाद जली रोशनी बंद दरवाजों तले, फिर भी मन में सवाल है।।
ख़्वाहिशें राख कर दी अलाव में
नंगे पांव नापता रहा राहों को,फिर भी ना जाने क्यूं तुझसे ही लगाव है।।
सारी उमर गुजर गई इम्तिहान में
क्यों तेरी अक्साई ज़िद की ईश्क कभी ना मिली मुझे दान में।। 
देखता हूं तेरी अक्स को ख़तों में
रंक था लेकिन राजा बनकर कभी झांक ना पाया खुद की गिरेबान में।।
तेरी याद में रातें रोती है दिन में
उसी अंधेरी गलियों से गुजर रहा हूं,क्या अब भी तू बसती है इसी आसमान में।।
लो तेरी पाज़ेब को रख दिया दरख़्त में
अब तो लौट आओ काजलों से सने आंखे लिए, मेरे इस अधकच्चे मकान में।।
गुज़ारिश गुनाह है ईश्क--फ़रमान में,
सालती रही तेरी सांसे, सो गई हर ज़ख्में, अब भी ना जाने कौन है तेरे ध्यान में।।
मर्सिया मर्म है सिर्फ़ मयस्सर मौत में,
ईश्क की कगार पर खड़ा, खुद ही हूं ख़ुदा, सारी जिंदगी गुजर गई इसी गुमान में।।

उन धुंधले अफ़सानों की बात पर अब कोई रोया ना करेगा
मौत के पार उमर की लिहाज पर अब कोई सोया ना करेगा ।।
फैसला फ़ासलों की फ़िराक पर अब कोई फिक्र ना करेगा
बात जज़्बात की ज़ेहन में होगी तो तेरा कोई ज़िक्र ना करेगा।।

कातिब & कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 

Friday, August 23, 2019

।। ना जाने क्या पीछे छोड़ आएं हैं ।।

Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 


लफ्जों की तलाश थी, लेकिन हर्फ़ ढ़ूंढ़ लाए हैं
काली लकीरों की चाह में, अधूरी जिंदगी पीछे छोड़ आए हैं। 
ज़ेहन अफ़सुर्दा लेकिन अकबरी अफ़साने किस डगर ले जाए मालूम नहीं
मगर जो संकरे रास्ते घर तक जाती थी, उन पर पैरों के निशान कबके मिटा आए हैं।  

उस दूर दुनिया की चाह में , यादों की आलिम उमर को भऱे बाज़ार बेच आए हैं,
चेहरे पर परदे बदलते-बदलते, खुद की पहचान अपनों से ही जुदा कर आए हैं।।
फ़रिश्ताई फिराक की फ़िक्र में, उजालों औऱ अंधरों का फर्क ही भूल आए हैं
रोज काली लकीरों से अफ़सानों की मद में, अनसुने कई अधूरे किस्से कब्र में छोड़ आए हैं।।

उसी पुरानी सड़क पर खड़ा हूं फिर से, जो जानी-पहचानी अनजान सी लगती है आज 
भटकती भीड़ से परे रास्तों की तलाश में, अपनों के शहर में अजनबियों जैसे खड़े हुए ।।
कहानियों की ख़्वाहिश वाली बोझ तले, अंधेरी कासनी रातों वाली ख्वाबों की आवाज दबा आए
ज़मीर की ज़द में खुद से खुद की लड़ाई के दरम्यां, मालूम चला अपना असल अस्तित्व ही पीछे छोड़ आए। 

अपनी हौसलों वाली दुनिया बसाने के चक्कर में, उस कमजोर चाहत से सरेआम सौदा कर आए
बंद करता हूं आंखें दिखती है धुंधली रोशनी में ,जो अपनी पुरानी घर की दहलीजों को सूना छोड़ आए हैं। 
बेबसी का सौदा सौदा करते , एक रोज घर जलाने वाले चरागों से बिना शर्त ही समझौता कर आए हैं 
उमर की दस्तक तले पहली बार पता चला, बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े-खड़े सारी जवानी यूं ही गंवा आए हैं।।


कातिब &  कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 

Monday, August 12, 2019

।।वो कबीर है, या आखिरी फकीर है।।
































चिंतन चीर है, शरीर उसका प्राचीर है
शब्द तीर है, कविता उसका रघुवीर है।
रास्तों पर रोज चलता, खुद का वो राहगीर है,
लाल कफन में लिपटा, दुनिया का वो धर्मवीर है।।

सोच धीर है, मस्तक भुजाओं जैसी प्रबीर है
छन्न छंद नीर है, आकार चांद जैसा रूधीर है। 
मानुष वीर है, लेकिन सकल संसार में अधीर है
ख्वाब क्षीर है, लेकिन खुद में वो ख्वाबगीर है।। 

जिस्म पीर है, फिर भी ना जाने कैसी उसकी तासीर है
ज़ेहन से मीर है, फिर भी भरी महफिल में वो बधिर है
आंखे उसकी हीर है,ये बात कोई औऱ नहीं, कहता कबीर है
लाल रंग लिए शऱीर है,पहचान लो अब तो अपना ही फकीर है।।

तलाशता हूं खुद को लकीरों में, ये मैं नहीं, मेरी ही तकदीर है
टूटी उंगलियों पर लिखी है जो आयत, वो मेरी ही शरीर का प्राचीर है।
धुंधली किरणों की धुन में छेड़ा है जो राग रोशनी का, वो अपना ही कबीर है
लिए हाथ सारंगी ,मिला खड़ा हिमालय पर, वो अब तो आखिरी फकीर है। 

धुनी रमाए रास्तों पर रोज चलता, खुद का वो राहगीर है,
सूर्ख लाल कफन में लिपटा, दुनिया का वो अकेला धर्मवीर है।।
धुंधली किरणों की धुन में छेड़ा है जो राग रोशनी का, वो अपना ही कबीर है
लिए हाथ सारंगी ,मिला खड़ा हिमालय पर, वो अब तो आखिरी फकीर है।। 



कातिब &  कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 



Wednesday, July 31, 2019

।।किस्सों के बीज बो रहा हूं, बड़ा होकर किसान बनूंगा।।

WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA 

बरसों से हर रोज किस्से बो रहा हूं 
फिर भी लोग बड़ी अजीब बात पूछते हैं ।
सवाल ये कि बड़े होकर क्या बनोगे ?
हर बार की तरह इस बार भी वही जवाब दे रहा हूं , 
बड़ा होकर एक कामयाब किसान बनूंगा 
बीतते वक्त के साथ खुद की आजमाईश कर 
औऱ भी बेहतर बीज वाले किस्से बोउंगा  

किस्सों की नस्ल कभी बिहार से तो कभी पंजाब से लाउंगा 
कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर गांव की गलियों में जाउंगा 
जरूरत पड़ी तो फिर सरहदें पार भी किस्सों की बीज बोउंगा

फिर भी किस्सों की फसल अगर एकबारगी वक्त के पैमाने तले कम पड़ी 
तो फिर भगत-गांधी -आजाद-बोस को उसकी चिता से जगाउंगा
फ़ैज़-फ़िराक-फ़राज-फाजली को उसके कब्र के सिराहनों से आवाज लगाउंगा
गौहर-जेद्दन-ज़ोहरा की घुंघरूंओ तले हजरत महल के साथ पूरी रात गुजारूंगा। 
औऱ जब फसल लग जाएगी तो फिर उसकी उपज सिनेमा की दमाही हर रोज करूंगा। 

कातिबा & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 




WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA

Sunday, July 28, 2019

।।यथार्थ के पटल पर वो नंगा साधु ।।

Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 

शिखर से बूटियां बटोरता हिमालय की तराई में सोता, आज वो नंगा साधु शिथिल था
मानव श्रृंगार से बेखबर यथार्थ के पटल पर बंद आंखें किए, आज वो थोड़ा जटिल था।। 

एकांत की भीड़ से निकलकर , शोर में सन्नाटे लिए छोड़ अपनी तप वो, क्यूं बेसुध पड़ा 
लालिमा वाली भोर तले, सारी आसक्तियों को छोड़ पांवो तले, वो जीवन पर क्यूं अड़ा।।

किशोर भरी उम्र लिए सारे भोग से भागकर ,हसीन लम्हों को नापकर जो भेष जोग का पहन लिए
सामने वाली परवाह ना थी,उम्मीदों वाली गवाह ना थी, बस तपते तलवे लिए,जो नंगे पांव चल दिए ।।

सन्यास के सफर पर त्याग भरे वैराग्य की साधना में ,अब हर सफर सोच की, एकांत में होगी 
मन के भंवर के पार खड़ा, हर सौभाग्य की भावना में, अब तृष्णा वस्तु की, अंत में भी ना होगी।

मोह की माया से परे ,जन्मजननी को छोड़ खड़े, अब वैराग्य के सफऱ पर एक नया जीवन-सुर बनाना है 
जन्म -मृत्यु का चक्र छोड़ ,हठ योगी बन सुर सारंगी लिए ,अब वो गेरूआ वाला अंगवस्त्र ही अपनाना है ।।

गुजर गई सारी बातें, बीत गई बरसों रातें , सो गई कईयों की सांसे, लौट रहा हूं कुछ अंत का अनंत लिए
माघ वाली महादिशा की ओर, बदल रहा है उर्जा का प्रवाह हर ओर, चल रहा हूं सोच में अब भी वही संत लिए।।

फिक्र का जिक्र है थक सा गया सफर सोच का, थक सी गई है वो हिमालय वाली कांपती बूढ़ी टांगे 
लौट रहा बेफिक्र ख्याल मन का, वैराग्य हुआ पराया, मोह का बचा ना माया, फिर भी ये मन क्यूं तन ही मांगे ।।

सवालों की उलझनों में सिमटा हूं, बंद आंखें लिए अब ना जाने क्यूं सामाजिक सोच में लिपटा हूं 
तोड़ पाउंगा उन जंजीरों को उंगलियों से, हर जवाब की ताक में अब तो अंधेरों से ही सिमटा हूं।। 

 दुनिया देख रही अंत के अनंत को ,फिर भी
शिखर से बूटियां बटोरता हिमालय की तराई में सोता, आज वो नंगा साधु शिथिल था
मानव श्रृंगार से बेखबर यथार्थ के पटल पर बंद आंखें किए, आज वो थोड़ा जटिल था।।

कातिब & कहानीबाज

रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, July 11, 2019

।।सारी दुनिया उसकी लिखी हुई एक आखिरी साजिश है।।

Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 


सारी दुनिया उसकी लिखी हुई एक आखिरी साजिश है 
रेंगती राहों पर ये जिस्म मानो उसकी बरसों की ख्व़ाहिश है ।।
अब तो टूटते हैं बदन लगता है मौत से पहले की आजमाईश है,
ख्व़ाबों के खाक तले, माथे पर चांद लिए, ये खुदा की कैसी आराईश है।।

मन सोचता संयोग से वियोग में तराफ कर हर हर्फ़ मिट जाएगी 
खुले दरवाजों की सांकल तले बैठा है, जैसे रूह पल में सिमट जाएगी।।
सारी दीवारें सियाह हो गई,अब वो लाल लफ्ज तक का रास्ता यूं ही कट जाएगी 
गुजर गया ज़माना गले लगाए हुए,अब तो उसकी साजिशों के तले अंजाम भी भटक जाएगी।।

मन सोचता है, कि फ़ैज अपनी कब्र पर कौन सी मर्सिंया किसे पैगाम कर रहा होगा 
भरी जुगनुओँ की भीड़ में फ़िराक़ सुपुर्द-ए-ख़ाक होने पर भी किसकी फिराक में होगा।।
वो इलाहाबाद का अकबर ना जाने किससे कल्त की बात कर आह भी ना भर रहा होगा 
साजिशों की साज तले वो बादल ना जाने कल किसकी गुनाह पर आंसू बहा रहा होगा ।।

कब्र की कैद में जकड़े हजारों शायर, हुजूर की लिहाज में ना जाने किसका लिफाफा लिख रहा होगा 
धुआं बनकर उड़ते दिनकर ना जाने कुटुंब कृष्ण से महाभारत का कौन सा गूढ़ रहस्य समझ रहा होगा ।।
संगम में सोए सूर्यकांत निराला,इलाहाबाद के पथ पर टूटते पत्थर की आवाज में मर्म ही ढ़ूंढ़ रहा होगा 
इमरोज की पीठ पर सोई अमृता को, साहिर ना जाने कौन सी सूनी दुनिया में अकेले तलाश रहा होगा ।।

अरसों से बरसों तक बेबसी का ये अजीब सा आलम है , 
खुदा से रिश्ता-ए-हस्ती की फिराक में मौत ही मयस्सर मातम है ।।
खुद को आजमाउंगा मैं भी उसी रोज,जब इल्म होगा कि यही आखिरी ख्व़ाहिश है 
देखूंगा नज़र से, कि कैसे सारी दुनिया उसकी लिखी हुई एक आखिरी साजिश है ।।

कातिब & कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 

Friday, June 7, 2019

।। तू कभी ख़फ़ा ना होगी।।

Writer, Director Rajnish BaBa Mehta 

बंद आंखों वाली अकेली अल्हड़ इश्क़ है जो कभी ख़फ़ा ना होगी 
खुली आंखों से जो देखूंगा ख़्वाहिश को वो कभी बेवफा ना होगी ।।
शाख--गुल को जला दी उसने, जो हर हर्फ़ तले कभी दफा ना होगी
शहरे--राख से आबाद हुआ जिस्म, कि कोई कब्र अब ख़फ़ा ना होगी।।

स्याह धुंधली धुंध के तले ख्वाहिशों के मोड़ पर अब उमर-उमर की ही बात है 
लाल जिस्मों तले तुझे देखकर ऐसा लगा मानो बचपन से फिर मुलाकात है ।।
रब का वास्ता है तुझे छोड़ आना फिर मुझे उसी अधजली गलियों के मुहाने तले ,
जब आखिरी रात बीतेगी तब एहसास होगा उस रोज भी कि मौत की ही तो बात है ।।

फकीरों सा नाउम्मीदी का दिल लिए अब एहसास वाला सफ़र नाकाम ही तो है 
सदियों से लंबी मगर सोई है शाम वाली हसरतों के तले वो बेज़ुबान शाम ही तो है।।
इक फुर्सत--गुनाह के पैमाने पर चलते-चलते थक सा गया वो पांव वाली पयाम ही तो है
देखा है झरोखों से मर्सिया गाते उसे, पहचानने की फिराक़ में उमर गुजर गई मगर वो राम ही तो है ।।

सोच आउंगा तेरी समंदर सी सिराहनों को जो तू अब कभी ख़फ़ा ना होगी 
राह--मंजिल के दरम्यां समेट लूंगा तूझे आगोश में जो तू अब कभी बेवफा ना होगी।।
जलाउंगा तेरी ज़िद में जिस्म को, जो तू अब कभी खुद की मौत के बाद भी दफा ना होगी 
मेरा शहर रूह--राख तो होगा, लेकिन नफ़्स(आत्मा) की आंसू तले तू अब कभी ख़फा ना होगी ।।

कातिब & कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, May 9, 2019

।।गुजारिश बीती बात की, गुजारिश जज़्बात की।।

Poet, Writer, Director Rajnish BaBa Mehta


गुज़ारिश बीती बात की नहीं, गुज़ारिश इस बार जज़्बात की है 
ख़्वाब तले जो लफ़्ज़ समेटे हैं, बात उन लफ्जों के बरसात की है ।।
सीधी उँगलियों से खिचीं है टेढ़ी लकीरें, उन लकीरों पर अब थोड़ी घात सी है 
संकरी गलियों में खड़ी है सामने, ना जाने क्यूं लगता अब वो आखिरी मुलाकात सी है ।।

रूख़सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ के शामों में बुझती शमाओं की फ़ितरत भी अजीब है
मेरे फिगार-ए-बदन तले बुझते दीयों में दिखता आज मेरा सूर्ख लहू कुछ-कुछ ग़रीब है।। 
जुमलों की नुमाईश है,आखिरी शौक़ की आजमाईश है, फिर भी गले में क्यूं सूखा सलीब है
मुर्ग़-ए-बिस्मल की मानिंद जनाज़े के क़रीब लेटा है, खुदा की ख़ैर तले फिर भी तू मेरा आखिरी रक़ीब है।।

तंगदस्ती के मौसम में सोच लेता सच्चे फ़क़ीर-ए-साज तले, 
खुद को ढ़ूंढ़ लेता दर्द की बारगाह में कभी मेरी आवाज तले।।
खानक़ाह की ज़द में खड़ा था,परियों जैसी हुस्नों-ओ-फ़क़ीर के मेले में
अल्लाह से आखिरी इबादत की है, क़यामत वाले रोज ना फसूंगा तेरे झमेले में। 

काग़ज़ों के किनारे काली स्याही की शक में ज़िंदा रहूंगा तेरी संवेदनाओं के सहारे
मोल सिर्फ जिस्मों का होगा, चर्चा सिर्फ जम्हूरियत में होगी, जब बहेगी राख गंगा किनारे।।
तेरी आखिरी पैगाम पर क्यूं आया, कोसता हूं यतीम लहू को, अब जो सफेद चादर लिए ज़र्द रात पुकारे
उम्र-ए-रफ्ता की फिक्र में गुजर गई गलियों के गोशे में जिंदगी, अब ना बैठूंगा कभी ख़ुदगर्ज ख़ुदा के सहारे ।।

लो चला मैं अफ़सुर्दा अफ़सानों की फ़िराक में , बातें ना अब कभी होगी सुराख में,  
इस बार फिर गुजारिश बीती बात की नहीं, होगी आखिरी गुजारिश तेरी-मेरी जज़्बात में ।।
सीधी उंगलियों से जो खिचीं होगी टेढ़ी लकीरें, उन लकीरों पर चर्चा ना होगा कभी घात में , 

फरिश्तें तो सदियों से बैठें हैं इस फिराक में, कि कुछ तो बात होगी तेरी-मेरी आखिरी मुलाकात में।। 

रूख़सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ - प्रेम के कारवां की विदाई।। फ़िगार-ए-बदन - ज़ख़्मी शरीर ।।सलीब - सूली का चिह्न।।मुर्ग़-ए-बिस्मल- घायल परिंदे की तरह ।। रक़ीब - दुश्मन ।। तंगदस्ती-दरिद्रता ।।खानक़ाह-सूफ़ियों का आश्रम ।।उम्र-ए-रफ्ता -बीती हुई उम्र ।।गोशे- कोना।।

कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता 

Saturday, April 13, 2019

।। हिम्मत ना हारेगी तरल हार ।।

poet, Writer, Director Rajnish BaBa Mehta

शिखर सोच की है, सफर सांसों की बेतरबीब सी बिखरी हुई, 
तमन्नाएं होश की है, जो राहों में हौसलें अब यूं ही गिरवी हुई ।।
हर पल हार का ज़िक्र है, मगर ज़ेहन में जीत अब भी सिमटी हुई, 
वक्त की है थोड़ी आजमाईश, जो आराईश कहानियों पर टिकी हुई ।।

सांझ की कोलाहल तले बिखरती ज्योति ना जाने अब क्यूं घनी हुई, 
काले घुमड़ते बादलों के बीच छोटे तारों जैसी ना जाने सोच अब भी क्यूं फंसी हुई।।
मांझी के पतवारों के बीच निर्जन सागर की कोलाहल तले क्यूं खड़ी हुई 
चित्र-पट की माया पर सोचता हूं, ना जाने क्यूं मेरा सत्य सफर में उलझी हुई।।

भोर वाली सवेरा हुई जागो जीवन के प्रभात हिमनद पर खड़ा हूं मैं 
खो गया था विश्वास, लौट आया जीवन का श्वास जो दीवारों पर टिका हूं मैं ।।
अब हर पल्लव पुलकित होंगे, आशा मेरे अंकुरित होकर जो झूमेंगे 
देख लेना माली, हर उपवन की क्षितिज पर अब कोई ख्वाब ना टूटेंगे।।

कसक कूक सी उठेगी, जो काली आंखों वाली अंधकार पर होगा वार -प्रहार
मद चेतना जागेगी , मधुर व्यथा लिए शून्य चीर पर बनाएगी अपना आकार।।
सपनों के बादल फिर बुनेंगे जो मिलेगी रात के अंधियारों तले कहानीबाजी का दुलार

हर हौसलों तले अबस जीत का जश्न होगा, हारेगी ना हिम्मत अब कभी तरल हार।।

कातिब कहानीबाज & सिनेमाई साधू
रजनीश बाबा मेहता