Wednesday, November 9, 2016
Wednesday, November 2, 2016
इंतजार (विधा- चौरंगा)
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| Rajnish BaBa Mehta Peom Chauranga style |
सोखती शाख़ों पर सूखे पत्ते
संदूकों में बंद रिश्तों के प्याले
जड़ ढ़ूढ़ती जोश में काले मुर्दे
स्याह सी लगती है जीवन के ये सारे परदे ।।
संदूकों में बंद रिश्तों के प्याले
जड़ ढ़ूढ़ती जोश में काले मुर्दे
स्याह सी लगती है जीवन के ये सारे परदे ।।
ढ़ोल सी बजती तो ढम से आती आवाज़ें
रेल की सीटी सी गूँजती वो सन्नाटें
बिस्तरों पर टूटती उनकी वो कराहें
प्यास लगती तो गूँजती मयखानों में वो आहें ।।
रेल की सीटी सी गूँजती वो सन्नाटें
बिस्तरों पर टूटती उनकी वो कराहें
प्यास लगती तो गूँजती मयखानों में वो आहें ।।
सुबह ढ़ूढ़ती शामों में आसरों के रास्ते
दूर खड़ी पगडंडी पर चलती वो मेरे वास्ते
पहरों की क़ब्र में कैद होकर ख़ूब बरसते
सोच की संसार में खुद से लड़ती वो मिलने को तरसते ।।
दूर खड़ी पगडंडी पर चलती वो मेरे वास्ते
पहरों की क़ब्र में कैद होकर ख़ूब बरसते
सोच की संसार में खुद से लड़ती वो मिलने को तरसते ।।
अब काग़ज़ के छोटे नावों से बचा है आसरा
गलियों में ना जाने किस बात का सन्नाटा है पसरा
लंबे वक़्त के बाद लगता है पुरी होगी लंबी ख़्वाहिश
लो आ गई झरोखों से आख़िरी वक़्त की ख़्वाहिश
गलियों में ना जाने किस बात का सन्नाटा है पसरा
लंबे वक़्त के बाद लगता है पुरी होगी लंबी ख़्वाहिश
लो आ गई झरोखों से आख़िरी वक़्त की ख़्वाहिश
चाह कर भी कोई चाह ही पाया
हिम्मत करते भी कोई हिम्मत नहीं कर पाया
क्योंकि जड़ में जड़ गई वो काले मुर्दे
अब भी स्याह सी लगती है जीवन के ये सारे परदे ।।
कातिब
हिम्मत करते भी कोई हिम्मत नहीं कर पाया
क्योंकि जड़ में जड़ गई वो काले मुर्दे
अब भी स्याह सी लगती है जीवन के ये सारे परदे ।।
कातिब
रजनीश बाबा मेहता
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बाबा का चौरंगा
Sunday, September 18, 2016
वेद में लिपटा बाबा
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| वेद में लिपटा बाबा - रजनीश बाबा मेहता |
लिखना बगावत है
मैं वाह, प्रवाह, वेग, व्यास, वेद में लिपटा हूं,
तू बन बेड़ी , मैं जंजीर बन के लिपटा हूं ।
सुबह की सूरज सी धूप सा सहमा हूं,
चंदा की रोशनी सी रात में सिमटा हूं ।।
जख्म दिया जो तूने पीठ पे
मरहम की आस में खुद से लिपटा हूं ।।
आज पलकों भर आंसू से रोया हूं
तू क्या जाने आज ख्वाब को किस कदर खोया हूं ।।
यादें संभाल कर रखूंगा इस दिल में
मरहूम सा दुबक कर ना सोउंगा मैं बिल में ।।
ख्वाब-ए-इश्क को फना भी मैं ही करूंगा
खुदा का मैं नेक बंदा फैसला भी मैं ही करूंगा।
जुबान बंद कर जो दर्द पिया वो तर्जुबा हुआ
ख्वाहिश की मंजिल तक जो मैं पहुंचा वो भी तर्जुबा हुआ ।।
मेरी किस्मत भी नाज करती है मुझपे
हर नजर को निगाह-ए-हक है मुझपे ।।
अब पहुंचा हूं जो तारीख पर
हैरान रह जाओगे मेरा मुकाम देखकर ।।
अच्छा हुआ बिखरे जमाने कब के गुजर गए
लगी जोर की ठोकर जो हम बच गए ,
बंधे थे खुद की ख्वाहिश-ए-ख्वाबगीर में
बरना कबके हम भी बिखर गए होते ।।
शुक्रिया तेरा है जो तूने खुद ही खुद का सोचा
वरना आज भी हम हीरा नहीं
तपती रेत में पत्थर की तरह बिखर गए होते ।
कातिब
रजनीश बाबा मेहता
आज दिल में कुछ रोष है और व्यक्त करने का माध्यम इससे बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता ।
Monday, September 5, 2016
अनकही कहानी रीत सी
एक रीत सी है, एक प्रीत सी है ।
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| अनकही कहानी रीत सी _ रजनीश बाबा मेहता |
अँगड़ाईयों में अश्कों सी है
वो अज़ीम अफ़साना अब्त़र है ।।
शाख़ ए जिस्म में पेवस्त सी है
वो सुर्ख़ ज़ख़्म में नस्तर सी है ।।
रेंग रेंग चलती पर्वतों पर पत्थर सी है ,
टूटे आहटों के सायों का चलना बदस्तर है ।।
फ़िरदौस की फ़ांका में बाबा, फ़रिश्तों से मिल आया
किताब के कोरे पन्नों पर, तेरे लिए पूरा नज़्म लिख आय़ा ।
अब तक हर राह रूमानी थी, हर ख़्वाब बेमानी थी,
अब तो तेरा रिश्ता , बिस्तर के कोनों के जैसी ज़िस्मानी थी।।
वो रात की पूरी बारिश रूह सी रूहानी थी
खुली आँखों से लगती वो एक अनकही कहानी थी ।।
कातिब
रजनीश बाबा मेहता
अज़ीम- महान, अफ़साना- कहानी अब्त़र - नष्ट, बिखरा हुआ, फ़िरदौस- स्वर्ग, फ़ांका- भूखा,
Thursday, August 11, 2016
महाश्वेता देवी
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| Mahasweta devi ko Rajnish baba mehta ka naman |
महाश्वेता देवी
तू नहीं तेरी सौगात मेरे ज़ेहन में जिंदा रहेगी
तू है अब अग्निगर्भ में, मनीष-धारित्रि पुत्री रहेगी ।।
मौत के उम्रकैद में, कृष्ण द्वादशी के देश में
मातृछवि की छांव में, अमृत संचय लिए तू जिंदा रहेगी ।।
क्लांत कौरव के काल में, अग्निशिखा की गाल में
बनिया बहू की बाल में, मास्टर साब के शाल में ,
तू जिंदा रहेगी स्याही सी कलम की हर खाल में ।।
उपदेश सी तू, बनके क्यूं चली गई
अनंत काल तक राह सी क्यूं चली गई ।।
हर शब्द सी लोरी सुनता रहूंगा
हजार चौरासी की मां तुझे याद करता रहूंगा ।।
कातिब
रजनीश बाबा मेहता
Monday, April 25, 2016
संघर्ष के दिन
रिश्तों की परवाह नहीं की उसने ।
मांगा था एक पल दुआओं में,
इबादत की परवाह नहीं की उसने ।।
खुद की सोच को समेटकर दे दिया लम्हों में,
इंसान होकर भी इंसानियत की परवाह नहीं की उसने ।
वक्त को बंद डब्बे में रखकर भूल आया ,
फिर भी मेरी सोच को शीशे सा पिघला दिया उसने ।
हार नहीं हिम्मत है ये मेरी,
क्योंकि मेरे जैसा, जर्रे से मोती बनना,
सीखा नहीं उसने ।।
कातिब
रजनीश बाबा मेहता
Wednesday, April 6, 2016
मस्तानों सा रेत सा अकेला ।
| Rajnish BaBa Mehta |
रिश्तों में आई दरार ने ,
हमें रास्तों पर ला दिया ।
ख्वाहिश थी एक जुम्बिश की,
हवाओं ने बयार ला दिया ।।
सांसों की उलझनों से,
जो सुलझाया था सिलवटों को ।
नंगे कदमों की आहट ने,
जिस्म में गुबार ला दिया ।।
पहचान बनाने में ज़िद में ,
ज़िंदगी उलझती चली गई ।
सुलझा हुआ इश्काना ,
नम आंखों में उलझती चली गई।।
मस्तानों की दुनिया में,
रह गया रेत सा अकेला ।।
झुरझुरी लिए जिस्म में,
जीना होगा अकेला ।।
कातिब
रजनीश बाबा मेहता
फिiLLuM
rajnish-e-rajnish.blogspot.com
Monday, November 30, 2015
Thursday, June 11, 2015
Tuesday, May 12, 2015
हर रोज सीखाती है बंबई
बंद कमरे, बंद दरवाजों में
फिर से खुद को रखूंगा ।।
बंबई का रास्ता तो दिखा दिया
लेकिन जिंदगी का सच तुरंत बतला दिया ।।
सही कहता था मंटो
सही कहता था मंटो ।।
आज खुद से सीखा हूं
आज खुद से खुद को बुना हूं,
ना चल खुद के साथ
ना चल खुदा के साथ।।
चलना है तो फिर
चल जमाने के साथ।
अब ना हैरान होउंगा
अब ना परेशान होउंगा ।।
बस खुद से खुद को सींच के
जिंदगी में हर मकाम पाउंगा।।
क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता
Wednesday, February 26, 2014
Tuesday, February 11, 2014
मसक्कली की मौत
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| मसक्कली की मौत By Rajnish BaBa Mehta |
सांसों को थामने में बिखरी रही
मौत से बचने की फिराक में थी
कई बार पंख से हवाओं का भी सहारा लिया
खेलते बच्चों ने भी जमकर उकसाया
सहसा दातों के बीच लहू में रंग गई
मौत के दामन से भागती मसक्कली
मौत के आगोश में ही समा गई
सोचता हूं, क्यों नहीं हाथों में उठाया
क्यों नहीं जिस्मों से लगाया
क्यों हत्यारा सा महसूस कर रहा हूं
क्यों टीन के छत से फड़फड़ाकर गिरी।।
क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता
Sunday, June 23, 2013
क्यों काजल हैं बिखरे तेरे
क्यों काजल हैं बिखरे तेरे....
क्यों शहर है सिमटा
हर कोने बिखरी ढ़ेरों गुड़िया
रिसती है काले आंसू
रिसते है तेरे सपने
क्यों काजल हैं बिखरे तेरे....
क्यों शहर है सिमटा
खोल ले आंखें अपनी
देख ले बिखरे बिखरे बादल को
धुंध छटेगी, प्यास मिटेगी
फिर भी ना होगा सवेरा
क्योंकि ये अंधेरों की है दुनिया
क्यों काजल हैं बिखरे तेरे....
क्यों शहर है सिमटा
कातिब(लेखक)
रजनीश बाबा मेहता
Saturday, June 15, 2013
ख्वाबों के खत
दर्द की स्याही से
ख्वाबों के खत में
ख्यालों को क्या खूब
लिखा था ।।
सोच को सपनों की तरह
सहेज कर रखा
लेकिन साज़िश के साथ
किसी ने सुना ही नहीं।।
बदलते वक्त की बयार
ने मौका ही नहीं दिया
वरना वो भी बेरहम, बेअसर
ही साबित होता ।।
लफ्जों में बदलते
आंसू , आंसूओँ में थोड़ा सा काजल
मानों रातों ने भी
रो रोकर, खुद को गीला कर लिया ।।
अब तो आक़िल भी अपने
अक्ल पर रो रहा है
क्या करें अब तो
कातिब(लेखक) भी अपने कलम पर रो रहा है।।
कातिब(लेखक)
रजनीश 'बाबा' मेहता
15 जून 2013
Monday, May 13, 2013
लो......आ गई मेरी फ़िदाई
| Rajnish baba mehta |
मेरी फ़िदाई कल मेरे पास थी
ख्वाबों से दूर कहानियों के करीब
कैसे आई मेरे पास पता नहीं
लेकिन बे अन्दाज़ा खुशी फ़सानों सा दिखने लगा
एकाएक मेरी ज़हीर मेरे ज़ार के मर्म को कैसे समझ पाई
सवालों की उलझन में रकीबों का भी खयाल आया
लेकिन वो वक्त मेरा था
क्योंकि मैं महान जो हो चला था।
ठहरो....कहीं ये मेरी इश्तियाक-ए-इश्क का पयाम तो नहीं
कोई परखने की कोशिश तो नहीं
फिर ख्याल आया क्यों डरता हूं मैं
मेरी फ़िदाई मेरे पास आ तो गई।
अब ज़िदगी का क्या आसरा होगा पता नहीं
लेकिन मेरी फ़िदाई अब भी मेरे पास है।।
क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता
| Rajnish BaBa Mehta |
2.-बे अन्दाज़ा= अन्तहीन, अपार,
3.-फ़साना= प्रेमकथा, कहानी, किस्सा,
4.- ज़हीर- दोस्त
5.-ज़ार= लालसा, इच्छा
6.इश्तियाक-ए-इश्क - प्रेम की लालसा
7.- पयाम= संदेश
Sunday, April 7, 2013
अश्फ़ाक की तलाश में ...तू... या मैं ?
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| तू या मैं ? |
मेरी पामाल ज़िंदगी का सहारा हो तुम
कैसे कहूं तुम्हें, कि मौज़ूं सहारा हो तुम
रात की तन्हाई टहनियों तले बीतती है
फिर भी मेरे लबों की अख़्ज हो तुम
अग़लात लिए आक़िल सा
तेरे रूहों की रवानियत सा
छोटे छोटे अश्कों की बूदों सा
अपने अऱज पर अपनी आंचल को समेटे हुए
मुझे अर्जमन्द ना जाने क्यों समझती जा रही हो तुम
अज़नबी रहने की आदत है मेरी
संभलना है तो संभलो अभी
वरना आब-ए-तल्ख़ में खो जाओगी तुम
सोच मेरी, समंदर है, या है दायरा
ना जाने ज़िदगी क्यों बन गई मुशायरा
अब एहतियाज-ए-इख्लास की ख्वाहिश ना है मेरी
क्योंकि अब ना तो तू है.. ना ही सौगंध तेरी।
रजनीश बाबा मेहता
अगल़ात= अशुद्धियां, अख्ज़= पकड़नेवाला, लेनेवाला, छीनने वाला, लोभी, आक़िल= बुद्धिमान, अऱ्ज= धरती, क्षेत्र, पृथ्वी, अर्जमन्द= महान, आफ़ताब= सूर्य,
आब-ए-तल्ख़= कड़वा पानी, शराब, आंसू, एहतियाज= आवश्यकता, इख्लास= प्रेम, सच्चाई, शुद्धता, निष्ठ
अश्फ़ाक= सहारा,
Wednesday, October 3, 2012
काश....काश
![]() |
| Rajnish 'Baba' Mehta 'काश' |
काश...काश इतना भारी ना होता
काश कहना भारी सा लगता है ना
उस रोज भी वजन का बोझ लिए
उनके काश कहने पर रूका था
सुकून के समंदर से निकलकर
यूं ही उनके बाहों में समाने का मन था
फिर क्या हुआ...वो काश की कहानी ?
रोज-रोज कोसता हूं उस काश को
सोचता हूं काश...उसके काश कहने पर रूका ना होता
काश मेरे थिरकते कदम बोझिल ना होते
अब क्या फायदा.
क्यों कोस रहा हूं अपनी जिंदगी को
अब तो बस काश ही बचा है जीने का आखिरी रास्ता
उस रोज भी वजन का बोझ लिए
उनके काश कहने पर रूका था
सुकून के समंदर से निकलकर
यूं ही उनके बाहों में समाने का मन था
फिर क्या हुआ...वो काश की कहानी ?
रोज-रोज कोसता हूं उस काश को
सोचता हूं काश...उसके काश कहने पर रूका ना होता
काश मेरे थिरकते कदम बोझिल ना होते
अब क्या फायदा.
क्यों कोस रहा हूं अपनी जिंदगी को
अब तो बस काश ही बचा है जीने का आखिरी रास्ता
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