Sunday, February 10, 2019

।।ख़त तेरे लिए।।

poet, writer & Director Rajnish BaBa Mehta 



जमाने बाद लिखा खत, मैंने आज
पुरानी गलियों के दरवाजे से बाहर निकला आज
कुछ रिश्ते पीछे छूटे , छूट गया कुछ पुराने दोस्तों का मेला 
जिसके साथ खेला था, मैंने नंगे पांव ज़िंदगी का खेला।

सब्र के लिए शुक्रिया कहा औऱ आंसू लिए निकल पड़ा
चंद कदम बाद अहसास हुआ, शरीर ही तो है आत्मा थोड़ी ना निकल पड़ा ।
पहली बार लगा, मेरे शब्दों की आवाज थी नहीं आज
काश बिना बोले समझकर, मुझे शुक्रिया ही कह देते आज।।

ना कोई गिला है ना कोई शिकवा है, बस थोड़ी रिश्तों की बेबसी है
लेकिन कहीं पहुंचने के लिए ,कहीं से निकलना ,ना तेरी ना मेरी बेबसी है।
उम्मीदों की आंच पर, वादा है मेरा, दुआओं में नहीं हकीकत में होगा साथ
नए रास्ते, नई सोच, नए सपने, नई ख्वाहिशें लिए ढ़ूंढ लेंगे गोशा फिर तेरे साथ।।

।।गोशा - कोना ।।

साथ देने के लिए शुक्रिया
क़ातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता

Sunday, February 3, 2019

।।अफ़सोस ढ़लती उम्र का ।।

Writer, Poet, Director Rajnish BaBa Mehta 

तारीख़ों की तफ्तीश में अब उमर आग सी लगती है, 
जश्न कभी ज़िंदगी,इश्क की तलाश में, अब फाग सी लगती है ।
ख़्वाहिश खोखली हुई हर गोशे में, क़दमों तले रास्ते लाल सी लगती है,
ख़्यालों की सतरंगी धुन है, मगर वो पाज़ेब की धुन अब भी राग सी लगती है ।।

शिकायत शिकवों से नहीं, शिकायत लम्हों से नहीं, 
हर पन्नों पर बिखरे लफ़्ज़ों जैसी, शिकायत सांस सी लगती है। 
जो मिला है हसरतों से हसरतों में, अब उनसे गुजारिश नहीं होती, 
बीते आइनों की शक्लें धुंधली सी है, आज भी वो मेरे जिस्म में जिस्म सी लगती है।।

वक्त की आड़ में सफ़र सोच सी नहीं, एक उमर सी लगती है, 
किसी का बेहद-बेपनाह अकेलापन, वो आखिरी मोहब्बत सी लगती है ।
जो खो गया वो वक्त की तफ्तीश सी थी, मगर मलाल दिल में ज़हर सी लगती है,
गुजरे वक्त में भी पाने की तमन्ना तो है, लेकिन बालों को देख,जिंदगी एक उमर सी लगती है । 


सफर पीछे का है जनाब , अब बढ़ते कदम अफ़सानों सी क्यों लगती है,
फिर से जवां होने की खातिर, उस आने वाली बुढ़ापों से डर क्यों लगती है ।।
हर वक्त के पहर दर पहर में , अबस मौत की सोच कुछ इस कदर लगती है, 
अफ़सोस इश्क को पाने की नहीं , अब अफ़सोस ढ़लती उमर की ही लगती है।।


कातिब, कहानीबाज 

रजनीश बाबा मेहता 

Thursday, January 17, 2019

।।अब ज़ुबान मजबूर ना होगी।।

POET, WRITER & DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA



अपनी मशरूफ़ियत में मगरूरर थे, मगर जनाज़े से पहले जिंदा जिस्म लिए मजबूर क्यों 
हुनर हौसलों की उड़ान पर गुरूर में थे, मगर शाम वाली रात से पहले मजबूर क्यों ।। 
संवेदनाओँ वाली लहू आंखों में लाल से थे, मगर आंसू से पहले काजल मजबूर क्यों,
रंजिश ज़ेहन में, जागती जिस्म को जगाते थे , मगर ज़ुबान आज खुद से मजबूर क्यों ।। 

गुजरते वक्त को ज़ेहन में झंझोर सा दिया, आज़िम आदत मानो मेरी हंसी पर रो सा दिया 
वक्त के पैमाने में खुद को बंद कर बैठा हूं, वो जवानी मानो मेरी मजबूरी पर रो सा दिया ।।
खुदगर्ज़ी की खोज में ख्वाहिश ख़ाक सा कर दिया, झूठे लिबासों में जिस्म आज रो सा दिया
बांध कर बेड़ियों में चेहरा सियाह ज़र्द सा कर दिया, भरी महफ़िल में हालात हुस्न पर रो सा दिया।। 

गोशे में बैठा हूं गिला गुलशन से नहीं, आक़िबत की फिराक में अर्जमन्द आक़िल से कहता हूं 
लम्हों की है थोड़ी आजमाईश ,अब तुझसे नहीं, बादलों में बसी आफ़ताब की रोशनी से डरता हूं।।  
ये जो वक्त तेरा है, वो वक्त जो मेरा नहीं , सामने खड़े ज़फर से अब गुज़ारिश नहीं तल्ख़ कहता हूं 
मर्यादा मान की होगी, सम्मान मेरे अभिमान की होगी, ज़ुबान अगर जली तो जिस्म राख सी होगी 
आखिरी लफ़्जों की बारिश है, सफर मर्ज़ी का आवारामिज़ाजी है,अब ये बात तुझसे नहीं फरिश्तों से कहता हूं ।।

अबस अपनी मशरूफ़ियत फिर मगरूर होगी, जो ज़िंदा जिस्म जनाज़े से पहले मजबूर ना होगी 
हुनर हौसलों की उड़ान पर गुरूर होगी, जो शाम वाली रात से पहले मजबूर ना होगी।।
रूख हवाओं का होगा जिधर हम होंगे , जो महफिलों में अब हुस्न मजबूर ना होगी
नसीब मुसाफिर का , अब मुझसा होगा, जो ज़ुबान अब कभी खुद से मजबूर ना होगी ।। 
  

कातिब &कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता
आज़िम= दृढ़ ।। गोशा - कोना।।गिला= रोष, शिकायत।।गुलशन= फूलों या गुलाबों का उपवन।।आक़िबत= अन्त,भविष्य।।अर्जमन्द= महान।।आक़िल-बुद्धिमान।।आफ़ताब= सूर्य ।।जफ़र= विजय, जीत, लाभ।।

Sunday, December 23, 2018

।।मकबरे पर रोती है रानियां ।।

POET, WRITER, DIRECTOR RAJNISH BaBa MEHTA


गुजारिश गुलजार की है, बेबसी के सहारे 
मकबरों की मातम में है, रानी बादलों के सहारे ।।
गुजरी सदियां, गौहर की बातें अब यादों के किनारे ।
इश्तियाक़-ए-इश्क़ की फ़िराक में अब फिरदौस भी, 
फ़सानों सी वो नदिया रेत सी बनकर, चांद को रोज पुकारे ।।

रात की रंजिश बनकर शाम वाली मोहब्बत, ख़्वाब से यूं कह दे 
बंद कर आंखें ,अब तेरे क़सीदें में, हम खाक बनकर ही रह लें ।
हर गिरहों को खोल, दरवाजे पर खड़ी होकर रात से ही कह दे।
काफिला बेनसीब बनकर,  तेरे साहिल से प्यासे गुजर जाते हैं 
किसी रोज झूठे लफ्जों की बारिश पर, अपनी बदन की सारी बिसात ही रख दे ।।

खुदमस्ती की ख़ातिर अब राख भी है , आखिरी साख के सहारे 
धड़कती नब्जों में आखिरी इश्क पेवस्त है, लहू वाली आग के किनारे ।।
रोक ना पाया, तेरे जनाजे की जागीर को, फिर भी घूंघट से तूझे ही पुकारे।
कुछ कदमों की बात है, सुलगती गाह वाली बारगाह से अब मुलाकात है
लो अब जला है ज़र्द जिस्म, नंगी रूह लिए, नदियां रावी-चेनाब के किनारे ।।

लौट रहा हूं सूरत-ए-सांस भरकर , जाओ कोई उसकी गलियों के मुहाने से कह दे 
मिलूंगा उस रोज जब शक होगी सांसों पर, जाओ ये बात कोई फरिश्तों से कह दे ।
बीरान मकबरे पर अब रोती है रानियां , ये बात कोई महलों वाले फकीरों से कह दे  
रूकूंगा ना मेलों में अब मातम मनाने, रूकूंगा ना हरे दुपट्टे का शामियाना बनाने  
अब मेरा बसेरा तेरे शहर के किनारे पर होगा, जाओ ये बात कोई उसके कब्र से कह दे। ।

कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता 


इश्तियाक़= चाह, इच्छा, लालसा ।। फ़िरदौस= स्वर्ग, उपवन ।।

Saturday, November 10, 2018

।। सवाल गरीब खुदा से ।।

Writer & Director Rajnish BaBa Mehta 

लफ्जों की, अगर-बेअगर लिबास होती
तो सिल देता तेरे चेहरे की सिलवटों को  
बदन की गोदराई तराशों पर यकीन होता
तो सिल देता, तेरी रूह--वफाई को ।।

अगली भीड़ वाली मोड़ पर मेरा मकसद तू नहीं तेरी ख्वाहिश है ,
अकेली रात में मेरा मिलना तूझसे नहीं, तेरी आजमाईश है ।।
झरोखों से झांकती नजर--नाश,बोलती सन्नाटों की फरमाईश है,
फरेब सी फांस है तनिक फासलों पर, लेकिन बदन की खूब आराईश है ।।

कुछ इस तरह पेश आउंगा अबकी बार 
जहां रूह--मलंगियत का जिक्र होगा हर-बार।।
जोगी जागकर कुछ कहेगा तो सब सुनेंगे 
जहां इबादती इश्क वाली खामोश बात सब सुनेंगे ।।

कभी- कभी बेअसर ख्वाहिशों में खराश ही जाती है 
छोटे सपने हो तो फिर खुद के अक्स में दरार ही जाती है।।
नादारी नादिमी बन अगर शोक है तो फिर काबा क़ल्ब हो जाता है 
ख़ानुम तेरी ख़िदमत--ख्याल से, ख़ालिश ख़लिश खामोश हो जाती है ।।

तेरे शिकवों की अब फिक्र नहीं
लेकिन मेरा जिक्र तो ऐसा ही होगा। 
टूटती बेदम सांसों पर निगाहें तो होगी 
फिर भी मेरा जिक्र पहले जैसा ही होगा ।।

जागते जोगी के ज़ख्म को जाने देना जिस्म के करीब से 
मुलाकात होगी जब पिछली वाली दरवाजों की दहलीज पर।।
 गमज़दा ख्यालों के खेल को खूब लुटने देना इस रकीब से 
लम्हों की होगी बारिश, तब सवाल पूछे जाएंगे खुदा जैसे गरीब से ।।


आराईश- सजावट नादारी= गरीबी। नादिम= लज्जाशील।क़ल्ब= दिल, आत्मा ख़ानुम(ख़ानम)=राजकुमारी ख़ालिस= शुद्ध, निष्कपट(मित्र) ख़लिश= चुभन, पीड़ा  

कातिबकहानीबाज

रजनीश बाबा मेहता 

Friday, August 31, 2018

।।भोर वाली कबाबी मुलाकात।।

Poet Rajnish BaBa Mehta 

शाम--भोर वाली साख पर सिमट गया उसकी लिहाफ़ पर 
जुगनुओं सी जागती गई, अफ़सानों की पहली फ़िराक पर 
बदन की अंगड़ाइयों तले इठलाते रहे, दोनों अपनी काली लिबास पर 
पहली मुलाकात थी बंबईया नुक्कड़ पर, वो भी कबाब की आस पर।।

वक्त का था पहरा, मेरी जुबां ना जाने किस आस में, उस पर ही था ठहरा 
उलझती जुल्फों तले, वो इज़्तिराब-सी थी, या था कोई साजिश गहरा 
मखमली सफ्फ़ाक सा बदन लिए,गुलाबी होठों पर क्या खूब सज रहा था चेहरा 
लफ्ज़ों की जुगलबंदी जिस्म में क्या पेवस्त हुई, बोल पड़ी वक्त का है थोड़ा पहरा।।

गर्दिशे-अफ़लाक की फिक्र में,छोड़ आया उसे उसकी काफ़िलों की जिक्र में
कहती रही, राहें जुदा होती रही,बोल गई लब से मिलूंगी आखिरी सब्र में 
लम्हों को गिनती थी लफ्जों पर, कारवां को कारवां ना बताती वक्त़े-सफ़र में 
अल्हड़ सी अदायगी लिए,अगर आज नहीं मिली तो कहती मिलूंगी आखिरी कब्र में ।।

विदा सी ज़ुदा हुई, नज़्मों की अलाप वो जोगन जैसे ज़ेहन में आ गई 
रागिनी गाती हुई, वो इस अफ़सानानिगार के मल्हारी सांसों में समा गई 
पिछली भोर वाली शाम की सितार, मेरी रगों में कतरा कतरा टूटती चली गई
देख रहा हूं अब भी अंधेरी कासनी स्याह रातों में, कैसे जिस्म में खोती चली गई। 

वो एक पहली औऱ आखिरी मुलाकात,उसके लिए ना जाने, क्या होगी शादमानी 
हयाते-चंद-रोज़ा समझ इस कातिब के लिए,वो बस इतनी सी है अधूरी कहानी।।

कातिब
रजनीश बाबा मेहता 
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।।इज़्तिराब-सी- बैचेन सी।।गर्दिशे-अफ़लाक - काल चक्र।।शादमानी -हर्ष।।हयाते-चंद-रोज़ा- चार दिन की कहानी।
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Thursday, August 30, 2018

।।सफर कुछ ऐसा होता है।।


Poet Rajnish baba mehta 




सफर कुछ ऐसा ही होता है
सामने सीढ़ीनुमा रास्ता होता है 
दूर बंद दरवाजे जैसी मंजिल होती है 
पैरों तले ख्वाहिश जैसा, कुछ कांटा भी होता है  

एहसास जेहन में नहीं जोश में होता है 
ख्वाब सामने मगर कुछ बेहोश सा होता है 
पा लेने की ज़िद ,खुद को जिंदा रखता है 
खो जाने पर हर लम्हा,मौत सा दिखता है  

फिर से उठने पर मन ना जानें, क्यूं घबरा जाता है 
सोच में सिहरन तो देह बात-बात पर, यूं ही कांप जाता है
कामयाब कोशिश का फितूर,फिर भी ना जाने क्यों होता है  
आखिर मौत की बात सुनकर मन एकबारगी क्यूं घबरा जाता है  

फिर से उठा हूं इस बार भी सफर कुछ वैसा ही होगा
सामने सीढ़ीनुमा रास्ता भी होगा,तो दूर बंद दरवाजे जैसी मंजिल भी होगी 
पैरों तले ख्वाहिश भी होगा, जमीन पर बिछा कुछ नुकीला कांटा भी होगा 
लेकिन इस बार जश्न जीत की होगी,रोशनी आएगी तो मौत सिर्फ शरीर की होगी। 

            कातिब 
     रजनीश बाबा मेहता

Monday, August 13, 2018

सफेद-स्याह उदासी वाला ईश्क

POET, DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA


सफेद सी जिस्म का लिबास लिए , मगर सांसों में हल्की सी आस लिए
जिंदा है जान उसकी उदास मन लिए, छोड़ फेरों की बात यूं ही चल दिए ।।
नाक़द्र बन पहलू में यूं ही सिमट जाती, हर बार नाक़ाबिल की हल्की फिक्र किए 
अज़ीम ख्वाहिश है उस ख्वाबशानी की, क्यों लेटी है कब्र पर यू हीं सफेद चादर लिए।।

हर लफ्जों में इश्क वाली शिकन हैं, मगर बातों में ना जाने क्यों उदासी लिए
छोड़ गई डगर पनघट की राहों पर, मगर आंखें चमकती रही ना जाने क्यों अश्क लिए।।
समेट लेती है संसार अपनी शब्दों में, छोड़ जाती है अधूरे अफ़साने हर लफ्जों में  
अर्जमन्द बनने का फैसला है उसका, नातर्स बन सिमटी है गोशे में, बेलिहाफ नौजवानी लिए ।।

छोड़ आया उसे सपनों के सिरहाने तले, फिर भी खोज रही है वो ख़िदमत की तलाश में ख़ुदा लिए 
आखिरात में सफेद -स्याह रक्त होगी, लंबे बिस्तरों पर अधूरी नींद तलाशेगी मौत लिए ।। 
आराईश अपनी बदन की समेट ना पाती है, इफ़्तितखार की तलाश में इनाद क्यों पालती है 
खुद की ख्वाहिश में ज़ियारत ज़ख्म समझ, इस कातिब के किस्से में हरबार क्यों चली आती है ।।
      
     कातिब 
                                                 रजनीश बाबा मेहता 


  • अर्जमन्द= महान ।।नातर्स= कठोर।।गोशा-कोना।।नौजवानी= यौवन।।आराईश= सजावट।।इफ़्तितखार= मान, ख्याति।।इनाद= विरोधता, दुश्मन।।

Saturday, August 4, 2018

।। इश्क वाली मर्सिया ।।


सदियों से दार सी है मोहब्बत, हुस्न--ज़ार के मेले में 
ख़्वाहिश--ऱाख सी है मोहब्बत,भरी जिस्मों के अकेले में ।।
खुदा का खौफ़ है, कि इबादत फंसा है फकीरों के झमेले में 
सोती रूह--राख भी रोती है, इश्क के मज़ारों पर अकेले में ।।

सुना है कैस की कब्र पर रोती है लैला, रूमी की बातों पर 
कफ़न की क़ाबू में सोई है सनम, अल्लाह की झूठी इरादों पर।।
तपती खंजर की तपिश याद है, फिर भी यकीन तेरी फरियादों पर
टूटा है जिस्म का हर कोना, लूटा है तेरे जनाज़े--जुनूं का रोना 
क़यामत क़ौम की होगी, जब परियां रोएगी मोहब्बत की लाशों पर।।

बीत गई बातें, गुजर गई रातें, सो गई हल्की सांसें, जिस्म में बची ना आहें 
फिर भी कहता है रूमी, मोहब्बत तेरा शुक्रिया, कि तूने जीना सीखा दिया 
 मोहब्बत तेरा शुक्रिया, कि तूने हर लम्हों में मुझे मरना सीखा दिया ।।
 इबातन अगर इश्क है, तो तूने मुझे आदतन फनां होना सीखा दिया 
क़फ़स की कैद में क़ातिल होकर भी, तूने दुआओँ में रहना सीखा दिया 
शम्स लिए कब्र में सोया रूमी, कि तूने दुनिया को अकेले जीना सीखा दिया।।

लफ़्जों--लाल होगी सदियों तक, फिर भी मोहब्बत दार पर होगी सदियों तक 
ख़ुदा जब-जब ख़ामोश होगा, तब-तब फ़िदाई राह सी ढ़ूढ़ेगी तूझे सदियों तक ।।
नंगे पांव वाला क़ाफिला तो होगा ,लेकिन नफ़्स तलाशेंगे तूझे,आखिरी रूह की गुलामी तक 
खोज लेना मर्सिया मौत की जिंदा जिस्म लिए, वरना इश्क रोएगी अपनी आखिरी मौत तक ।।

                                                                                                कातिब & कहानीबाज
                                                                                              रजनीश बाबा मेहता
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दार-फांसी।।कैस-मजनूं।।रूमी-महान उपदेशक।।क़फ़स-पिंजरा।।फ़िदाई-प्रेमी।।मर्सिया-शोक-कविता ।।

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Thursday, May 24, 2018

।।बेलिबास रूह-ए- इश्क।।

Writer, Director, Poet Rajnish BaBa Mehta

लहजों में लिपटी, सांसों में सिमटी छोटी सी तस्वीर थी 
गलियों के मुहाने पर खड़ी, ना जाने किसकी तकदीर थी ।।

लफ्ज लाल लिए होठों पर ,किसी के इश्क का इज़हार थी 
घूंघट में बैठी बंद दरवाजों पर, ना जाने किसका इश्तहार थी ।।

दस्ते-हिनाई की तराशों तले, तन्हाई में भी वफाई की मीनार थी 
रोक ली दबती आहों के तले सांसें, ना जाने आज क्यूं बीमार थी ।।

सख्त पत्थर सा लिए बदन,खुद के लिए, खुद ही वो एक विचार थी 
बेलिबास कोनों में सिमटी सिसकती ,ना जाने आज क्यूं लाचार थी ।।

यादों की स्याही तले खोली है आंखें, लेकिन मुझसे अब भी वो तकरार थी 
बिखेर दी अपनी जिस्म की कहानी,ना जाने क्यूं आज वो भरे बाजार की अखबार थी ।।

सच्ची साज पर नंगे पांव चलकर , मुमताज सी ताजमहल बनने को बेकरार थी
अंधेरी कासनी रातों में नंगी रूह लिए,अब ना जाने क्यूं मेरी कब्र में भी समाने को तैयार थी ।। 

कातिब
रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, May 2, 2018

।। बेलिहाज़ रूख़सती।।

POET, DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA


सिलते लफ़्ज़ों की है, अकेली ख़्वाहिश वाली ख़ामोश ख़ुदाई 
बनते ज़ख़्म नासूर है, जो देखा, तेरी अश्कों के शीशों में दस्ते-हिनाई
सजे पैरहन तराशे बदन पर लिए, नंगे पांव जो तू सामने इठलाई 
रूठी होठों औऱ झुकती पलकों पर, ना जाने क्यों ना आई रूसवाई 
ज़ंजीरे-दर में जकड़ा हूं, सन्नाटों की शोर में बैठा हूं, लेकिन शिकन माथे ना आई
महफ़िल-ए-रात की रोती सन्नाटों पर, अब क्यों बेबसी सी है छाई ।।

फ़जर की फिक्र में बैठा हूं, जो तेरी रूख़सती का वक्त आएगा 
ठहर कर सूरज भी तेरे कदमों तले, धूप सी हल्की आह ना भर पाएगा 
बेगानेपन की तस्वीर लिए, वो कहार भी मोम सा यूं हीं पिघल जाएगा 
कल तक साथ चलने वाला हमसफर, पिछली गलियों में ग़ुम जाएगा
रोज की तरह हर-रोज, तेरा वक्त खुद-ब-खुद ख्वाहिश सी निकल आएगा 
उस रोज बेलिहाज़ होकर, ये शख्स तेरी आगोश में फिर से सिमट जाएगा।।

पराए वक्त में जो मैंने तुझको पा लिया, क़ल्ब से मैं खुद ही ख़ुदा हो गया 
खामोंश लम्हा यूं ही बोलता गया,धीरे-धीरे मैं तेरे जिस्म से यू हीं ज़ुदा हो गया
अबस फितरत--फांस में, जो तेरा रंग परिंदा सा फक़ीरियत हो जाएगा 
उंगलियों पर गिनते लम्हों के बाद,अब कयामत के रोज ही मुलाकात हो पाएगा।।
तब ना सूरत--साज का ज़िक्र होगा, ना तेरी ख़ामोश रूख़सती का फ़िक्र होगा 
क्योंकि बेलिबास रूह के दरवाजों पर, सिर्फ ज़िंदा ईश्क--फ़साना सुनाया जाएगा।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

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।।दस्ते-हिनाई-मेंहदी वाले हाथ।। पैरहन- वस्त्र ।। ज़ंजीरे-दर- दरवाज़े कि साँकल।।क़ल्ब= मन,आत्मा।।
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Tuesday, March 27, 2018

।। किस्सा थोड़ी बदनाम सी है ।।

Writer Director Rajnish BaBa Mehta 

बंदिशों की धागों पर शहर की शाम सी है
किस्सा गुलाबी होठों की थोड़ी बदनाम सी है ।।
लो सुनाता हूं नज़्म--नाश वो थोड़ी आम सी है 
वो महरू़म शक्ल क्या देखी ग़िर्द आईनों में
पूरा जिस्म लिए अकेली, वो थोड़ी बदनाम सी है।।

रिश्तों की गिरहों को रास्तों पर खुलते देखा था उस रोज 
पहलुओं में पत्थरों को हर बार फिसलते देखा था उस रोज 
अफसोस के इरादो में, ज़िद जश्न की तरह जाने क्यूं मनाती रही 
ग़म आंखों से नहीं, आंसू सांसों से पीती रही हर रोज ।।

वक्त है नुमाईश की, लेकिन खुद की आजमाईश होगी एक रोज 
नफ़्स है हथेली पर लेकिन जिस्म से बदनाम क्यों होती रोज रोज 
देखना खुले पैमाने पर , पयाम तले बंद आंखे लिए डूबेगी एक रोज 
फिर ना रात रोएगी, ना हुस्न का जश्न होगा, लेकिन मौत होगी किसी रोज।। 

बंद अंधियारे छोटी दीवारों में अबस, आखिरी नसीब भी नासबूर सी है 
निस्बत की खोज में रोती रूह के तले , भीड़ में वो अकेली जिस्म सी है  
रोती सिसकती बंद गलियों में अकेले , लिबास ओढ़े मगर रूह नंगी सी है
ख़त्म हुई ख़्वाहिश,खुद को खोजती ख़ामोश ख़लिश की तरह खुदा के तले 
अब क्या, ठहरता वक्त भी हुआ पराया ,अपनो का बचा ना कोई साया, 
फिर भी ना जाने क्यों, आज भी वो, थोड़ी- थोड़ी बदनाम सी है  

कातिब
रजनीश बाबा मेहता 


।।नज़्म--नाशबर्बादी की सुरीली दास्तान।।गिर्द= गोल।।नफ़्स= आत्मा।।नासबूर= अधीर ।।निस्बत= सम्बन्ध।।


Wednesday, February 21, 2018

।। बता देता है।।


Writer, Director & Poet Rajnish BaBa Mehta 



।। बता देता है।।

 सत्ता में सुख सामर्थ की नींव हिला देता है। 
सच्चा इश्क इंसानों के जज्बातों की नींव हिला देता है।
छोटे दिलासे, रहनुमाओं को राह पल भर में दिखा देता है।
मिला था हिमालय की तराई में उस सारंगी वाले जोगी से 
जो पलभर में बंद कर आंखें, कंकड़ में शंकर दिखा देता है।।

अफसोस के इस अफसानों में, हर कोई स्याही दिखा देता है। 
रात के रास्तों पर मिलो, तो खुद के गमों का मंजर बता देता है। 
नासाफ़ सा दिल लिए चलकर भी वो, ज़ियारत की दहलीज मांगता है 
गैरत की महफिल में गम्माज़ बनकर फिरता रहता है तख्त की फिराक में 
जब पकड़ा जाता है रंगे हाथों , तो वो घुटनों के बल मौत की दुआ मांग लेता है।।

तरान--ज़िंदगी राख बनकर सांसों मे पेवस्त हुई बेवजह बता कर , 
नंगे कदमों की आहटों को अनसुना किया शोर को वजह बता कर ,
फितरत थी उसकी बातों में, जो ज़मीर बेचती थी फ़लक बता कर ,
लो चला है आखिरी रास्तों में राम लिए, जो आखिरी शाम का पता बता देता है 
अबस झूठ ना कहना आखिरी लम्हों में, वरना कब्र भी अंधेरों का पता बता देता है  
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 
नासाफ़= गन्दा, अशुद्ध, अपवित्र।। क़ायदा= रीति, नियम,।।गम्माज़ -चुगलीबाज़।।ज़मीर= मन, हृदय।।फ़लक= आकाश, स्वर्ग।।

Thursday, February 1, 2018

।।मगरूर मोहब्बत।।

Poet, Writer, Director Rajnish BaBa Mehta


सब कुछ कह दिया, दिल--अंजाम से पहले-पहले
मगरूर थे मोहब्बत में हम, नाकाम से पहले-पहले।।
सर्द रातों में चादर का कोना लपेटे लेटे रहे 
धीरे धीरे धड़कने बंद होने लगी, सुबह की शाम से पहले-पहले।।
अब जीने नहीं देती तेरी रूसवाई 
मेरी ख्वाहिश को जगा दे, मेरे मरने से पहले-पहले।।

फिक्र ही फिक्र तो किया था, खुद के जिक्र में इक रोज 
गेसू तले सोती सिसकती रही, पामाल सी थी वो उस रोज ।।
बहते रक्त की रंजिश ना थी, अब बस खामोशियां है हर रोज ,
वादा है ये तूझसे, अल्फाजों में अब ना उलझाउंगा किसी रोज ।।
आखिरी ज़नाजे की ज़ियारत--जिक्र जैसी महफिल तो होगी
लेकिन आंसूओं में डूबी बारात ना होगी, बस तन्हा हमरात होगी हर रोज।।

इश्क अश्कों में छुपाकर, ज़फा-ए-जीत से मिली पहले-पहले
ले जाउंगा तेरी शहर से वो यादें, जो मिली मुझे उम्र से पहले-पहले 
छोड़ ये आखिरी ज़ेहन, खो जा मेरी आगोश में सिमटने से पहले -पहले 
दस्तक बेधड़क होने लगी है अब, सीधी छत के छोटे दरवाजों पर,
लो,
अबस होने लगी बंद ज़ुबां,बंद होने लगी आंखें, तेरी मौत से पहले -पहले ।
आना कभी मेरी कब्र के सिराहने तले, इश्कज़दा होना मगर रोने से पहले-पहले।।

कातिब
रजनीश बाबा मेहता 

शब्दार्थ
।।गेसू= लटाएं, केशों के छल्ले।।पामाल= पैरों के नीचे कुचला हुआ।।जफ़ा= अन्याय।।ज़ियारत= तीर्थयात्रा।।

Sunday, November 26, 2017

शिव - शक्ति या मुक्ति

Writer, Director & Poet Rajnish BaBa Mehta

हाथ में सारंगी, जिस्म पर नारंगी 
सतरंगी दुनिया में साधु ,ज़ेहन से पूरी नंगी 
फैसला था खुद का, फासलों का डर नहीं 
नाचती मौत के सामने, खड़ा सबसे बड़ा भंगी। 

नादान बन राह नापता, बन हिमालय का सतसंगी 
भोर होता जटा समेटता, फिर कहलाता मैं तेरा मलंगी
राह चली जोगन मेरे साथ, कहती वो, तू शिव,मैं तेरी शिवांगी 
पहुंचा कैलाश, रख सारंगी, तूझे सुनने तो आतुर है, ये केसरिया बजरंगी 

बजा है डमरू, लगी है तान, 
गूंज उठा मानसरोवर का अभिमान।

मैं शिव हूं, या शव हूं,  तेरे सोच की मुक्ति हूं 
नीले बदन तले तेरे संसार में, एक ही शक्ति हूं 
राख वाले लिबास ओढ़े सुन, मैं ही तेरी भक्ति हूं 
तू बजा शंख, दे अजान, रह गया आखिर तक तू अनजान 
बंद आंखों से अब देख जरा, शमशान की आखिरी छोड़ पर खड़ा 
मैं ही तेरी भक्ति हूं, मैं ही तेरी शक्ति हूं, मैं हीं तेरी मुक्ति हूं। 
                                कातिब 

                              रजनीश बाबा मेहता