Wednesday, February 26, 2014

लंबे रास्तों का राहगीर।।

हो रास्ते लंबे भरे
पांवो के आहट तले
मिट्टी की खुशबू में सने
धूल की आंधियों से भरे
तू राहगीर हो या रणवीर हो
महान पथ पे तू चल रहा
सोच अपनी दरकिनार कर
मंजिल पानी है तूझे।।
                क़ातिब 
            रजनीश बाबा मेहता     


Tuesday, February 11, 2014

मसक्कली की मौत

मसक्कली की मौत By Rajnish BaBa Mehta
टीन के छत से फड़फड़ाकर गिरी
सांसों को थामने में बिखरी रही
मौत से बचने की फिराक में थी
कई बार पंख से हवाओं का भी सहारा लिया
खेलते बच्चों ने भी जमकर उकसाया
सहसा दातों के बीच लहू में रंग गई
मौत के दामन से भागती मसक्कली
मौत के आगोश में ही समा गई
सोचता हूं, क्यों नहीं हाथों में उठाया
क्यों नहीं जिस्मों से लगाया
क्यों हत्यारा सा महसूस कर रहा हूं
क्यों टीन के छत से फड़फड़ाकर गिरी।।
                                            क़ातिब
                                     रजनीश बाबा मेहता 

Sunday, June 23, 2013

क्यों काजल हैं बिखरे तेरे



क्यों काजल हैं बिखरे तेरे....
  क्यों शहर है सिमटा

हर कोने बिखरी ढ़ेरों गुड़िया 
रिसती है काले आंसू 
रिसते है तेरे सपने 

क्यों काजल हैं बिखरे तेरे....
  क्यों शहर है सिमटा

खोल ले आंखें अपनी 
देख ले बिखरे बिखरे बादल को 
धुंध छटेगी, प्यास मिटेगी 
फिर भी ना होगा सवेरा 
क्योंकि ये अंधेरों की है दुनिया 

क्यों काजल हैं बिखरे तेरे....
  क्यों शहर है सिमटा


कातिब(लेखक) 
रजनीश बाबा मेहता 

Saturday, June 15, 2013

ख्वाबों के खत





दर्द की स्याही से ख्वाबों के खत में
ख्यालों को क्या खूब लिखा था ।।

सोच को सपनों की तरह सहेज कर रखा
लेकिन साज़िश के साथ किसी ने सुना ही नहीं।।

बदलते वक्त की बयार ने मौका ही नहीं दिया
वरना वो भी बेरहम, बेअसर ही साबित होता ।।

लफ्जों में बदलते आंसू , आंसूओँ में थोड़ा सा काजल
मानों रातों ने भी रो रोकर, खुद को गीला कर लिया ।।

अब तो आक़िल भी अपने अक्ल पर रो रहा है
क्या करें अब तो कातिब(लेखक) भी अपने कलम पर रो रहा है।।

     कातिब(लेखक)
रजनीश 'बाबा' मेहता 
15 जून 2013



Monday, May 13, 2013

लो......आ गई मेरी फ़िदाई

Rajnish baba mehta

मेरी फ़िदाई कल मेरे पास थी
ख्वाबों से दूर कहानियों के करीब
कैसे आई मेरे पास पता नहीं
लेकिन बे अन्दाज़ा खुशी फ़सानों सा दिखने लगा
एकाएक मेरी ज़हीर मेरे ज़ार के मर्म को कैसे समझ पाई
सवालों की उलझन में रकीबों का भी खयाल आया
लेकिन वो वक्त मेरा था
क्योंकि मैं महान जो हो चला था।
ठहरो....कहीं ये मेरी इश्तियाक-ए-इश्क का पयाम तो नहीं
कोई परखने की कोशिश तो नहीं
फिर ख्याल आया क्यों डरता हूं मैं
मेरी फ़िदाई मेरे पास आ तो गई।
अब ज़िदगी का क्या आसरा होगा पता नहीं
लेकिन मेरी फ़िदाई अब भी मेरे पास है।।

क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता

Rajnish BaBa Mehta
                                                      रजनीश बाबा मेहता 

1.-फ़िदाई= प्रेमी,
2.-बे अन्दाज़ा= अन्तहीन, अपार,
3.-फ़साना= प्रेमकथा, कहानी, किस्सा,
4.- ज़हीर- दोस्त
5.-ज़ार= लालसा, इच्छा
6.इश्तियाक-ए-इश्क - प्रेम की लालसा
7.- पयाम= संदेश

Sunday, April 7, 2013

अश्फ़ाक की तलाश में ...तू... या मैं ?

तू या मैं ?



मेरी पामाल ज़िंदगी का सहारा हो तुम
कैसे कहूं तुम्हें, कि मौज़ूं सहारा हो तुम
रात की तन्हाई टहनियों तले बीतती है
फिर भी मेरे लबों की अख़्ज हो तुम
अग़लात लिए आक़िल सा
तेरे रूहों की रवानियत सा
छोटे छोटे अश्कों की बूदों सा
अपने अऱज पर अपनी आंचल को समेटे हुए
मुझे अर्जमन्द ना जाने क्यों समझती जा रही हो तुम
अज़नबी रहने की आदत है मेरी
संभलना है तो संभलो अभी
वरना आब-ए-तल्ख़ में खो जाओगी तुम
सोच मेरी,  समंदर है,  या है दायरा
ना जाने ज़िदगी क्यों बन गई मुशायरा
अब एहतियाज-ए-इख्लास की ख्वाहिश ना है मेरी
क्योंकि अब ना तो तू है.. ना ही सौगंध तेरी।

रजनीश बाबा मेहता 


अगल़ात= अशुद्धियां, अख्ज़= पकड़नेवाला, लेनेवाला, छीनने वाला, लोभी, आक़िल= बुद्धिमान, अऱ्ज= धरती, क्षेत्र, पृथ्वी, अर्जमन्द= महान, आफ़ताब= सूर्य,
आब-ए-तल्ख़= कड़वा पानी, शराब, आंसू, एहतियाज= आवश्यकता, इख्लास= प्रेम, सच्चाई, शुद्धता, निष्ठ
अश्फ़ाक= सहारा,

Wednesday, October 3, 2012

काश....काश


Rajnish 'Baba' Mehta  'काश'

काश...काश इतना भारी ना होता 


काश कहना भारी सा लगता है ना
उस रोज भी वजन का बोझ लिए 
उनके काश कहने पर रूका था 
सुकून के समंदर से निकलकर 
यूं ही उनके बाहों में समाने का मन था
फिर क्या हुआ...वो काश की कहानी ?
रोज-रोज कोसता हूं उस काश को
सोचता हूं काश...उसके काश कहने पर रूका ना होता
काश मेरे थिरकते कदम बोझिल ना होते
अब क्या फायदा.
क्यों कोस रहा हूं अपनी जिंदगी को
अब तो बस काश ही बचा है जीने का आखिरी रास्ता 

Friday, April 27, 2012

उस रात की मेरी कहानी



वो कहानी सुनी थी तुमने
कैसे पहली बार तरंगो की झलक
साथ साथ चलने को राजी हुई।
लगता है भूल गए हो तुम
सुनाऊ...ठीक है तो सुनो...
सिर्फ अपनी और उसके लफ्जों को बताउंगा

बातें अभी पुरी नहीं हुई
ऐ रात थोड़ा थम थम के गुजर
क्यों आशियाने में आंधी हुई
क्यों बेसब्री सी हालत हुई 
ऐ रात थोड़ा थम थम के गुजर
उसके जाने का वक्त हो गया
धड़कनें टूटने लगी कुछ कुछ
मन्हूसियत में डूबने लगा सबकुछ
मासूमियत ओढ़े उठने लगी
मानों जिस्म कांपने लगा कुछ कुछ
उंगलियों की सिहरन लिए
उदासी में खोने लगा सबकुछ
लालिमा छाने का वक्त आ गया
झुटपुटे अंधेरों को भी मालूम हो गया
रूह भी बेगानी फिजां में समाने को बेताब हो गया
चादर की सिलवटें भी टूटने लगी कुछ कुछ
कांपती होठों के शब्दों में समाने लगा सबकुछ
पाजेब उठाके हाथों में लिए मुड़ेगी कभी
किस गली खो गई .......पता भी नहीं दे गई
नाराज थी शायद वो मुझसे
अब क्या करूं .जब खो गया सबकुछ मुझसे
जिस्म का हर अंग टूटने लगा कुछ कुछ 
पौ फटी दिन के उजाले में खो गया सबकुछ

                           ऱजनीश कुमार 
                           'BaBa Mehta'
                          The Director's Cut

Friday, March 16, 2012

जगाओ न बापू को, नींद आ गई है










जगाओ ना बापू को नींद आ गई है

जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
अभी उठके आये हैं।,बज़्म-ए-दुआ से
वतन के लिये, लौ लगाके ख़ुदा से शमीम करहानी
टपकती है रूहानियत सी फ़ज़ा से
चली जाती है, राम की धुन, हवा से
दुखी आत्मा, शान्ति पा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है

ये घेरे है क्यों, रोने वालों की टोली
ख़ुदारा सुनाओ न मन्हूस बोली
भला कौन मारेग बापू को गोली
कोई बाप के ख़ूं से, खेलेगा होली ?
अबस, मादर-ए-हिन्द, शरमा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
मोहब्बत के झण्डे को गाड़ा है उसने
चमन किसके दिल का, उजाड़ा है उसने ?
गरेबान अपना ही फाड़ा है उसने
किसी का भला क्या, बिगाड़ा है उसने ?
उसे तो अदा, अम्न की भा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
अभी उठके खुद वो, बिठायेगा सबको
लतीफ़े सुनाकर, हंसायेगा सबको
सियासत के नुक़्ते बतायेगा सबको
नई रोशनी दिखायेगा सबको
दिलों पर सियाही सी क्यों छा गई है ?
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
वो सोयेगा क्यों, जो है सबको जगाता
कभी मीठा सपना, नहीं उसको भाता
वो आज़ाद भारत का है, जन्म दाता
उठेगा, न आंसू बहां, देस-माता
उदासी ये क्यों, बाल बिखरा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
वो हक़ के लिए, तन के अड़ जाने वाला
निशां की तरह, रन में गड़ जाने वाला
निहत्था, हुकूमत से लड़ जाने वाला
बसाने की धुन में, उजड़ जाने वाला
बिना, ज़ुल्म की जिस्से,थर्रा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
वो उपवास वाला, वो उपकार वाला
वो आदर्श वाला , वो आधार वाला
वो अख़लाक़ वाला, वो किरदार वाला
वो मांझी, अहिन्सा की पतवार वाला
लगन जिसकी, साहिल का सुख पा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
कोई उसके ख़ू से, न दामन भरेगा
बड़ा बोझ है, सर पर क्योंकर धरेगा
चराग़ उसका दुशमन, जो गुल भी करेगा
अमर है अमर, वो भला क्या मरेगा
हयात उसकी,खुद मौत पर छा गई है ।
जगाओ ना बापू को, नींद आ गई है । - 2

Wednesday, October 12, 2011

मंडी हाउस का हीरो



एक राह का ऱाहगीर तू
एक ख्वाब का ख्वाबगीर  तू ।
चलता जा सपनों की राहों पर
सन्नाटा लिए मंडी की गलियों में
भटकता है सदियों तक तू ।
ख्वाहिशों का सेहरा सर बांधे
जख्म छुए पैरों को...
धूप जलाए चेहरों को
फिर भी ना दर्द पहुंचे
ना चोट खाए..
ना दाग दिया सीने पर तू ।
अब चलना छांव छांव
कतरा कतरा आंसू लिए तू।
अजीब दर्द की दांस्ता यहां
कहीं मिलेगी छांव ...
तो कही धूप पाएगा तू ।
नाटक की कायनात में ...
आशिकों की तरह भटकता तू...
धुएं में उलझी धूल की तरह
उड़ना चाहता  तू ।
वक्त से टपका जो लम्हा... उसकी तरह
मंडी की गलियों में खुद की निशां तलाशता  तू ।
आई मंजिल पाने की बारी
आई  जीने की बारी
जी लेने दो मुझको .....
खो जाने दो मुझको ।
अब आई मेरी बारी ।


रजनीश "बाबा मेहता"

Wednesday, September 7, 2011

सोच

सपनों की सड़कों पे नंगे पांव चलता हूं
ख्वाबों को हकीकत से कुछ यूं ही नापता हूं
जिंदगी की खोज में... जिंदगी मानो तमाशा बन गई
जहां बच्चों का खेल तो है
लेकिन भीड़ से शोर लापता हो गई
हाशमी मार्ग के हश्र पर अब तो रोना आता है
जहां हीरो समोसे के साथ चाय... तो ब्रेड पकौड़े पर ही जीता है
सपनों की उड़ान तो है ...लेकिन फर्श का पता भी... खूब पता है
जहां ना तो इमेल है...ना जीमेल....ख्वाबों में है.. तो सिर्फ फीमेल
फिर भी भागती जिंदगी को थामने की तमन्ना में जीता जा रहा हूं
हर ख्वाहिश को पाने की तमन्ना में....जहर का घूंट भी पीता जा रहा हूं
धीऱे-धीरे वक्त गुजरता जा रहा है...मंजर बदलता जा रहा है....
राहों से गुजरकर...मंजिल के फासले तो तय कर लिए
लेकिन भागती भीड़ के शोर ने...आज चुप्पी साध लिए...
वक्त के तकाजे तो हमने भी खूब देखे...
क्या करें आंसू भी हमने आंखों से खूब पिए
अब ना तो इंतजार है....न इंतजार की ख्वाहिश
क्योंकि सपनों के टूटने की आवाज नहीं होती
वक्त के मार की जख्म नहीं होती
आज तुम हो...तो हम हैं...
नहीं तो हमें जीने की आदत नहीं होती ।

रजनीश कुमार

Sunday, June 26, 2011

यादों का बसेरा






तू ही तू









याद है तू



ख्वाब है तू



राहों की ताकीद है तू



मेरी परछाई



क्यों चले तेरे संग-संग



हर बार साए के साथ है तू ।






ज़िंदगी लम्हों में गुजरती जा रही है



फिर भी इनकार है तू



मानो हर लम्हों में हर वक्त साथ है तू ।






वों आंचल वो बाहें



तेरी छुअन मानो एक नया एहसास है तू



नजरों के सामने होकर



क्यों ओझल सी रहती है तू ।






अब तो बता क्यों खफ़ा है तू



मेरी आगोश में आकर



क्यों सिमटती जा रही है तू।






रजनीश कुमार



8 अप्रैल 2011

मेरी तलाश

अजनबी की तलाश में चलता रहा




एक अजनबी की तलाश में चलता रहा


खामोश गलियों में तेरा इंतजार करता रहा



जहां टूटे हैं सपने...


वहां हाथों की लकीरों को देखे हैं अपने


कदमों तले रास्तों के फासलों का क्या पता


रकीबों के शहरों में अनजान बनकर चलता रहा



चांद की चांदनी तले रात रात भर


ख्वाबों की सूनी सड़कें नापता रहा


अब तो मंजिल का पता नहीं



फिर भी...


तेरी आगोश में सिमटने की ख्वाहिश से जीता रहा


ये मेरी भूल थी या तेरी आंखो की सरगोशियां


जो तेरे आंसूओं से भीगी काजल को पीता रहा



अब तो इंतजार की भी इंतहा हो गई


फिर भी


तेरी नशीली पलकों का इंतजार


बंद गलियों में किए जा रहा हूं।







ऱजनीश कुमार

Sunday, June 12, 2011

जिस्म की आह...रोको ना तुम ।






जिस्म की आह


जिस्म आगोश में सिमट रहा
हल्की सी प्यास ये बदन की
उठ रही अंगड़ाईयों में
खो जाने दो उन लम्हों में ज़रा ।
अपने ललक की भूख को
हाथों से रोको न तुम
खोजता तू खुद को अपने भीतर
ना जाने कहां गुम हो गया ।
मिलन की आस में लंबी है ना दूरी
लेकिन प्यास अभी भी तेरी अधूरी ।
हर वक्त नहीं, आज नहीं, कल भी करेंगे तेरा इंतजार
बंद आंखों से तूम्हें टूटकर करेंगे प्यार ।
लबों की सूर्ख अदाओं को
लबों से छूने दो जरा ।
जिस्म की आह को
जिस्मों में समाने दो ज़रा ।



----रजनीश कुमार

Thursday, June 2, 2011

हो रास्ते लंबे भरे


हो रास्ते लंबे भरे




हो रास्ते लंबे भरे

पांवो के आहट तले

मिट्टी की खुशबू में सने

धूल की आंधियों से भरे

तू राहगीर हो या रणवीर हो

महान पथ पे तू चल रहा

सोच अपनी दरकिनार कर

मंजिल पानी है तूझे ।



रजनीश बाबा मेहता

Wednesday, January 27, 2010

खबरों की बेबसी या खबरों का रण


खबरों की बेबसी या खबरों का रण


ये खबर है या खेल है
यहां हर बात पे मेल ही मेल है

खबरों की वार तलवारों की धार
यहां है हर ख्वाहिशों की हार ।
यहां न कोई अंत है न शुरूआत है
हर खबरों पर सिर्फ अघात ही अघात है।

टीआरपी की होड़ में क्या मुंबई क्या गुजरात है
हर शहर में बस खबरों की बरसात है।

न जंग की बात है न साथियों का साथ है
यहां तो हर वक्त “आंसू” ही हाथ है।

यहां वक्त भी बड़ा बेवक्त है
हर खबरों का वार बड़ा ही सख्त है।

महंगाई की मार हो या मंदी का वार हो
यहां तो सिर्फ खबरों की भरमार है ।

हर रास्तों से गुजरा हूं मैं खबरों की तरह
अब तो हमें भी टीआरपी की आदत सी हो गई।

रजनीश कुमार

Friday, July 24, 2009

मेरी यादें मेरा बसेरा





कॉलेज में मेरी यादें

वो फूलों की डाली वो पत्तों में कांटे
हर मोड़ पर बिछी है मेरी निगाहें
वो ख्वाबों की हकीकत वो यादों का बसेरा
हर गम में है बस तेरा ही तेरा सहारा
वो कॉलेज की गलियों में गुमनाम अंधेरा
हर कदम पर नहीं मिला मुझे साथ तेरा
वो बसों की पायदान पर बना रिश्ता मेरा औऱ तुम्हारा
फिर भी वो सांसों में नहीं दिखा अपनापन तुम्हारा
वो खाली सीढ़ीयों पर बैठ मैने किया लंबा इंतजार
वो तेरी परछाई की आहट ने मुझे किया था बेकरार

वो आखिरी दिनों में एक उम्मीद के सहारे जिया था मैने
न जानें क्यों हरपल तुम्हें ही सोचा था मैंने ।


रजनीश कुमार

Wednesday, July 22, 2009

Palash is a great singer




पलाश सेन के साथ कुछ यादगार पल

इस बेहतरीन सिंगर के साथ कुछ हसीन पल....

Maaeri Lyrics

Teriyaan, meriyaan pul gaya ,Pul gaya haar te jeet
Hey maaye ki karna main jeet nu ,Howey na je meet, howey na je meet
Bindiya lagati thi to kaampti thi palkain meri ,chunniyan sajaa ke woh deti waadein kal ke maaeri Mere haathon main tha uska haath ,Thi chaashni si har uski baat
Maaeri aap hi hansdi, maaeri aap hi rondi ,Maaeri yaad vo yaad vo aaeri
Gallan o kardi, maaeri aakhan naal larhdi ,Maaeri yaad vo yaad vo aaeri

He maaeri
Baarishon main lipatke maa aati thi vo chalke maaeri Deriyaan ho jaye to roti halke halke maaeri Phir se main roun, phir se vo gaye ,Thandi hawaaen ban ke chhaye
Maaeri heeri o gaandi, maaeri gidde o paundi ,Maaeri yaad vo yaad vo aaeri
Jannataa o longdi, maaeri mannatta o mangdi ,Maaeri yaad vo yaad vo aaeri
Ab ka karoon, kaa se kahoon e maaeri ,Ab ka karoon, kaa se kahoon e maaeri
Ho....
Duniya paraaee chhod ke aajaa ,Jhoote saare naate tod ke aajaa
Saun rab di tujhe ik baari aajaa ,Ab ke milein to honge na judaa
Na judaa... Na judaa... ho...
Hoonte to aaye, koi te le aaye ,Maaeri yaad vo yaad vo aaeri
Gallaan o kardi, maaeri akhiyan nal larhdi ,Maaeri yaad vo yaad vo aaeri
Pull gayi mera pyaar maae, bas lage maheene char ,Maaeri yaad vo yaad vo aaeri
Yaad vo aaeri, maaeri yaad vo aaeri ,Maaeri yaad vo yaad vo aaeri
Ab ka karoon, ka se kahoon e maaeri ,Ab ka karoon, ka se kahoon e maaeri.