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Friday, March 16, 2012

जगाओ न बापू को, नींद आ गई है










जगाओ ना बापू को नींद आ गई है

जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
अभी उठके आये हैं।,बज़्म-ए-दुआ से
वतन के लिये, लौ लगाके ख़ुदा से शमीम करहानी
टपकती है रूहानियत सी फ़ज़ा से
चली जाती है, राम की धुन, हवा से
दुखी आत्मा, शान्ति पा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है

ये घेरे है क्यों, रोने वालों की टोली
ख़ुदारा सुनाओ न मन्हूस बोली
भला कौन मारेग बापू को गोली
कोई बाप के ख़ूं से, खेलेगा होली ?
अबस, मादर-ए-हिन्द, शरमा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
मोहब्बत के झण्डे को गाड़ा है उसने
चमन किसके दिल का, उजाड़ा है उसने ?
गरेबान अपना ही फाड़ा है उसने
किसी का भला क्या, बिगाड़ा है उसने ?
उसे तो अदा, अम्न की भा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
अभी उठके खुद वो, बिठायेगा सबको
लतीफ़े सुनाकर, हंसायेगा सबको
सियासत के नुक़्ते बतायेगा सबको
नई रोशनी दिखायेगा सबको
दिलों पर सियाही सी क्यों छा गई है ?
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
वो सोयेगा क्यों, जो है सबको जगाता
कभी मीठा सपना, नहीं उसको भाता
वो आज़ाद भारत का है, जन्म दाता
उठेगा, न आंसू बहां, देस-माता
उदासी ये क्यों, बाल बिखरा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
वो हक़ के लिए, तन के अड़ जाने वाला
निशां की तरह, रन में गड़ जाने वाला
निहत्था, हुकूमत से लड़ जाने वाला
बसाने की धुन में, उजड़ जाने वाला
बिना, ज़ुल्म की जिस्से,थर्रा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
वो उपवास वाला, वो उपकार वाला
वो आदर्श वाला , वो आधार वाला
वो अख़लाक़ वाला, वो किरदार वाला
वो मांझी, अहिन्सा की पतवार वाला
लगन जिसकी, साहिल का सुख पा गई है
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है
कोई उसके ख़ू से, न दामन भरेगा
बड़ा बोझ है, सर पर क्योंकर धरेगा
चराग़ उसका दुशमन, जो गुल भी करेगा
अमर है अमर, वो भला क्या मरेगा
हयात उसकी,खुद मौत पर छा गई है ।
जगाओ ना बापू को, नींद आ गई है । - 2

Sunday, January 4, 2009

है जवाब


है जवाब.............?


उस रात की परछाई आज भी याद है मुझे
मैं अपने नीदों के ख्यालों में खोया था...
वो ओस की बूंदे मेरे चेहरे से टकराती...
फिर अपने में ही गुम होकर वो कहीं खो जाती...

रात के जुगनुओं ने भी रची है एक अलग कहानी...
ओस की बूंदों से प्यास मिटाकर बचा रही है अपनी निशानी...
हर पल नए ख्यालों को बुनता जा रहा हूं मैं...
उस राह की मोड़ पर मुड़ना भूल गया हूं मैं....

इन सुनसान मिट्टी भरी गलियों में अकेला चलता जा रहा हूं मैं...
हर कदम पर सवालों से परेशान होता जा रहा हूं मैं..
क्या अपने रास्तों से भटक गया हूं मैं.... ?
क्या एक चेहरे की याद में दूर तलक आ गया हूं मैं ?
-------रजनीश कुमार

Saturday, November 1, 2008

इंसानी जिंदगी…


इंसानी जिंदगी…

खुशियों की तलाश में दर-दर भटकता है इंसान
कहते हैं न जिसकी जिंदगी में ख्वाहिशें औऱ सपने न हो
उसकी जिंदगी बेरंग हो जाती है
लेकिन तेरी जिंदगी में ख्वाहिशें है सपने भी है
फिर भी तेरी जिंदगी न जाने क्यों बेरंग है।
इस अंधेरी-सुनसान गलियों में न जाने तू अकेला क्यों खड़ा है।
लोग पूछते है तुझसे हजारों सवाल
फिर भी तू कहानियों में क्यों जिए जा रहा है,
कभी तो पलट कर देख अपना मुखड़ा उस दरकते आइने में
जिसमें कभी तू अपनी पूरी तस्वीर देखा करता था।
आज भले ही हालात तेरे खिलाफ हो
फिर भी न जाने तू क्यो गुरूर में जिए जा रहा है।
-----रजनीश कुमार