Thursday, June 11, 2015
Tuesday, May 12, 2015
हर रोज सीखाती है बंबई
बंद कमरे, बंद दरवाजों में
फिर से खुद को रखूंगा ।।
बंबई का रास्ता तो दिखा दिया
लेकिन जिंदगी का सच तुरंत बतला दिया ।।
सही कहता था मंटो
सही कहता था मंटो ।।
आज खुद से सीखा हूं
आज खुद से खुद को बुना हूं,
ना चल खुद के साथ
ना चल खुदा के साथ।।
चलना है तो फिर
चल जमाने के साथ।
अब ना हैरान होउंगा
अब ना परेशान होउंगा ।।
बस खुद से खुद को सींच के
जिंदगी में हर मकाम पाउंगा।।
क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता
Wednesday, February 26, 2014
Tuesday, February 11, 2014
मसक्कली की मौत
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| मसक्कली की मौत By Rajnish BaBa Mehta |
सांसों को थामने में बिखरी रही
मौत से बचने की फिराक में थी
कई बार पंख से हवाओं का भी सहारा लिया
खेलते बच्चों ने भी जमकर उकसाया
सहसा दातों के बीच लहू में रंग गई
मौत के दामन से भागती मसक्कली
मौत के आगोश में ही समा गई
सोचता हूं, क्यों नहीं हाथों में उठाया
क्यों नहीं जिस्मों से लगाया
क्यों हत्यारा सा महसूस कर रहा हूं
क्यों टीन के छत से फड़फड़ाकर गिरी।।
क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता
Sunday, June 23, 2013
क्यों काजल हैं बिखरे तेरे
Saturday, June 15, 2013
ख्वाबों के खत
Monday, May 13, 2013
लो......आ गई मेरी फ़िदाई
| Rajnish baba mehta |
मेरी फ़िदाई कल मेरे पास थी
ख्वाबों से दूर कहानियों के करीब
कैसे आई मेरे पास पता नहीं
लेकिन बे अन्दाज़ा खुशी फ़सानों सा दिखने लगा
एकाएक मेरी ज़हीर मेरे ज़ार के मर्म को कैसे समझ पाई
सवालों की उलझन में रकीबों का भी खयाल आया
लेकिन वो वक्त मेरा था
क्योंकि मैं महान जो हो चला था।
ठहरो....कहीं ये मेरी इश्तियाक-ए-इश्क का पयाम तो नहीं
कोई परखने की कोशिश तो नहीं
फिर ख्याल आया क्यों डरता हूं मैं
मेरी फ़िदाई मेरे पास आ तो गई।
अब ज़िदगी का क्या आसरा होगा पता नहीं
लेकिन मेरी फ़िदाई अब भी मेरे पास है।।
क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता
| Rajnish BaBa Mehta |
2.-बे अन्दाज़ा= अन्तहीन, अपार,
3.-फ़साना= प्रेमकथा, कहानी, किस्सा,
4.- ज़हीर- दोस्त
5.-ज़ार= लालसा, इच्छा
6.इश्तियाक-ए-इश्क - प्रेम की लालसा
7.- पयाम= संदेश
Sunday, April 7, 2013
अश्फ़ाक की तलाश में ...तू... या मैं ?
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| तू या मैं ? |
मेरी पामाल ज़िंदगी का सहारा हो तुम
कैसे कहूं तुम्हें, कि मौज़ूं सहारा हो तुम
रात की तन्हाई टहनियों तले बीतती है
फिर भी मेरे लबों की अख़्ज हो तुम
अग़लात लिए आक़िल सा
तेरे रूहों की रवानियत सा
छोटे छोटे अश्कों की बूदों सा
अपने अऱज पर अपनी आंचल को समेटे हुए
मुझे अर्जमन्द ना जाने क्यों समझती जा रही हो तुम
अज़नबी रहने की आदत है मेरी
संभलना है तो संभलो अभी
वरना आब-ए-तल्ख़ में खो जाओगी तुम
सोच मेरी, समंदर है, या है दायरा
ना जाने ज़िदगी क्यों बन गई मुशायरा
अब एहतियाज-ए-इख्लास की ख्वाहिश ना है मेरी
क्योंकि अब ना तो तू है.. ना ही सौगंध तेरी।
रजनीश बाबा मेहता
अगल़ात= अशुद्धियां, अख्ज़= पकड़नेवाला, लेनेवाला, छीनने वाला, लोभी, आक़िल= बुद्धिमान, अऱ्ज= धरती, क्षेत्र, पृथ्वी, अर्जमन्द= महान, आफ़ताब= सूर्य,
आब-ए-तल्ख़= कड़वा पानी, शराब, आंसू, एहतियाज= आवश्यकता, इख्लास= प्रेम, सच्चाई, शुद्धता, निष्ठ
अश्फ़ाक= सहारा,
Wednesday, October 3, 2012
काश....काश
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| Rajnish 'Baba' Mehta 'काश' |
काश...काश इतना भारी ना होता
उस रोज भी वजन का बोझ लिए
उनके काश कहने पर रूका था
सुकून के समंदर से निकलकर
यूं ही उनके बाहों में समाने का मन था
फिर क्या हुआ...वो काश की कहानी ?
रोज-रोज कोसता हूं उस काश को
सोचता हूं काश...उसके काश कहने पर रूका ना होता
काश मेरे थिरकते कदम बोझिल ना होते
अब क्या फायदा.
क्यों कोस रहा हूं अपनी जिंदगी को
अब तो बस काश ही बचा है जीने का आखिरी रास्ता
Friday, April 27, 2012
उस रात की मेरी कहानी
ऱजनीश कुमार
'BaBa Mehta'
The Director's Cut
Friday, March 16, 2012
जगाओ न बापू को, नींद आ गई है


वतन के लिये, लौ लगाके ख़ुदा से शमीम करहानी
टपकती है रूहानियत सी फ़ज़ा से
चली जाती है, राम की धुन, हवा से
ख़ुदारा सुनाओ न मन्हूस बोली
भला कौन मारेग बापू को गोली
कोई बाप के ख़ूं से, खेलेगा होली ?
चमन किसके दिल का, उजाड़ा है उसने ?
गरेबान अपना ही फाड़ा है उसने
किसी का भला क्या, बिगाड़ा है उसने ?
लतीफ़े सुनाकर, हंसायेगा सबको
सियासत के नुक़्ते बतायेगा सबको
नई रोशनी दिखायेगा सबको
कभी मीठा सपना, नहीं उसको भाता
वो आज़ाद भारत का है, जन्म दाता
उठेगा, न आंसू बहां, देस-माता
निशां की तरह, रन में गड़ जाने वाला
निहत्था, हुकूमत से लड़ जाने वाला
बसाने की धुन में, उजड़ जाने वाला
वो आदर्श वाला , वो आधार वाला
वो अख़लाक़ वाला, वो किरदार वाला
वो मांझी, अहिन्सा की पतवार वाला
बड़ा बोझ है, सर पर क्योंकर धरेगा
चराग़ उसका दुशमन, जो गुल भी करेगा
अमर है अमर, वो भला क्या मरेगा
Wednesday, October 12, 2011
मंडी हाउस का हीरो

एक ख्वाब का ख्वाबगीर तू ।
चलता जा सपनों की राहों पर
सन्नाटा लिए मंडी की गलियों में
भटकता है सदियों तक तू ।
ख्वाहिशों का सेहरा सर बांधे
जख्म छुए पैरों को...
धूप जलाए चेहरों को
फिर भी ना दर्द पहुंचे
ना चोट खाए..
ना दाग दिया सीने पर तू ।
अब चलना छांव छांव
कतरा कतरा आंसू लिए तू।
अजीब दर्द की दांस्ता यहां
कहीं मिलेगी छांव ...
तो कही धूप पाएगा तू ।
नाटक की कायनात में ...
आशिकों की तरह भटकता तू...
धुएं में उलझी धूल की तरह
उड़ना चाहता तू ।
वक्त से टपका जो लम्हा... उसकी तरह
मंडी की गलियों में खुद की निशां तलाशता तू ।
आई मंजिल पाने की बारी
आई जीने की बारी
जी लेने दो मुझको .....
खो जाने दो मुझको ।
अब आई मेरी बारी ।
Wednesday, September 7, 2011
सोच
सपनों की सड़कों पे नंगे पांव चलता हूंख्वाबों को हकीकत से कुछ यूं ही नापता हूं
जिंदगी की खोज में... जिंदगी मानो तमाशा बन गई
जहां बच्चों का खेल तो है
लेकिन भीड़ से शोर लापता हो गई
हाशमी मार्ग के हश्र पर अब तो रोना आता है
जहां हीरो समोसे के साथ चाय... तो ब्रेड पकौड़े पर ही जीता है
सपनों की उड़ान तो है ...लेकिन फर्श का पता भी... खूब पता है
जहां ना तो इमेल है...ना जीमेल....ख्वाबों में है.. तो सिर्फ फीमेल
फिर भी भागती जिंदगी को थामने की तमन्ना में जीता जा रहा हूं
हर ख्वाहिश को पाने की तमन्ना में....जहर का घूंट भी पीता जा रहा हूं
धीऱे-धीरे वक्त गुजरता जा रहा है...मंजर बदलता जा रहा है....
राहों से गुजरकर...मंजिल के फासले तो तय कर लिए
लेकिन भागती भीड़ के शोर ने...आज चुप्पी साध लिए...
वक्त के तकाजे तो हमने भी खूब देखे...
क्या करें आंसू भी हमने आंखों से खूब पिए
अब ना तो इंतजार है....न इंतजार की ख्वाहिश
क्योंकि सपनों के टूटने की आवाज नहीं होती
वक्त के मार की जख्म नहीं होती
आज तुम हो...तो हम हैं...
नहीं तो हमें जीने की आदत नहीं होती ।
रजनीश कुमार
Sunday, June 26, 2011
यादों का बसेरा

तू ही तू
याद है तू
ख्वाब है तू
राहों की ताकीद है तू
मेरी परछाई
क्यों चले तेरे संग-संग
हर बार साए के साथ है तू ।
ज़िंदगी लम्हों में गुजरती जा रही है
फिर भी इनकार है तू
मानो हर लम्हों में हर वक्त साथ है तू ।
वों आंचल वो बाहें
तेरी छुअन मानो एक नया एहसास है तू
नजरों के सामने होकर
क्यों ओझल सी रहती है तू ।
अब तो बता क्यों खफ़ा है तू
मेरी आगोश में आकर
क्यों सिमटती जा रही है तू।
रजनीश कुमार
8 अप्रैल 2011
मेरी तलाश
अजनबी की तलाश में चलता रहाएक अजनबी की तलाश में चलता रहा
खामोश गलियों में तेरा इंतजार करता रहा
जहां टूटे हैं सपने...
वहां हाथों की लकीरों को देखे हैं अपने
कदमों तले रास्तों के फासलों का क्या पता
रकीबों के शहरों में अनजान बनकर चलता रहा
चांद की चांदनी तले रात रात भर
ख्वाबों की सूनी सड़कें नापता रहा
अब तो मंजिल का पता नहीं
फिर भी...
तेरी आगोश में सिमटने की ख्वाहिश से जीता रहा
ये मेरी भूल थी या तेरी आंखो की सरगोशियां
जो तेरे आंसूओं से भीगी काजल को पीता रहा
अब तो इंतजार की भी इंतहा हो गई
फिर भी
तेरी नशीली पलकों का इंतजार
बंद गलियों में किए जा रहा हूं।
Sunday, June 12, 2011
जिस्म की आह...रोको ना तुम ।

जिस्म की आह
जिस्म आगोश में सिमट रहा
हल्की सी प्यास ये बदन की
उठ रही अंगड़ाईयों में
खो जाने दो उन लम्हों में ज़रा ।
अपने ललक की भूख को
हाथों से रोको न तुम
खोजता तू खुद को अपने भीतर
ना जाने कहां गुम हो गया ।
मिलन की आस में लंबी है ना दूरी
लेकिन प्यास अभी भी तेरी अधूरी ।
हर वक्त नहीं, आज नहीं, कल भी करेंगे तेरा इंतजार
बंद आंखों से तूम्हें टूटकर करेंगे प्यार ।
लबों की सूर्ख अदाओं को
लबों से छूने दो जरा ।
जिस्म की आह को
जिस्मों में समाने दो ज़रा ।
----रजनीश कुमार








