Tuesday, July 18, 2017

।।रहगुज़र।।

Rajnish BaBa Mehta
Writer,Director


रिश्तों पर रोशनी रख रहगुज़र
वरना वफा परिंदा सा हो जाएगा 
रास्तों पर रिश्तों को ना आने दे रहगुज़र 
वरना वक्त की रेत में तू राख सा हो जाएगा।

अंधेरी कासनी रातों में तू डर, खुद के ख्यालों से 
वरना मांग ना पाएगा तू अपना जिस्म रहमवालों से 
जब असफ़ार--ज़नाजा निकलेगी रोती गलियों से एक बार 
जलता जिस्म बचा ना पाएगा, कब्रिस्तानों के रखवालों से। 

ऐहतमाम रख तू, जो अगर चला कभी बेवफाई के कबीलों में 
उक़ूबत सहने की औकात रख, अगर ज़िक्र हुआ तेरा फकीरों के मेलों में 
ना दुहाई देना फिर अपने फ़िदाई के फासलों की ,अमीरों की महफिल में 
जब हिसाब होगा गुनाह--इश्क का,जब रश्क होगा तेरी आंखों में इश्क का 
ज़िक्र--आम तो होगा तेरा, लेकिन जगह होगा वो कयामत की जेलों में ।। 

अब सोच को सच्ची साज़ दे, अपनी जिस्म को रूह वाली हल्की आवाज दे 
फिक्र की गलियों का जिक्र छोड़, अपनी ज़िंदा जिस्म में थोड़ी जान तो फूंक दे।।
बस ख्याल रखना रिश्तों का रहगुज़र, वरना वफा परिंदा सा हो जाएगा 
अगर रास्ते पर आए रिश्ते, तो तू फिर वक्त की रेत में राख सा हो जाएगा।।

कातिब  
रजनीश बाबा मेहता 

असफ़ार= सफर।।ऐहतमाम= व्यवस्था।।उक़ूबत= यातना।।फ़िदाई-प्रेमिका।।

Friday, July 7, 2017

।।पुस्तक में, मस्तक की दस्तक।।

Writer,Director Rajnish Baba Mehta
मैं जहां होता हूं, वहां रहता नहीं 
जहां रहता हूं,  वहां होता नहीं 
ये मस्तक की कैसी है दस्तक 
ढूंढ़ रहा हूं समझने की कोई पुस्तक।।

सोचता हूं , तो खुद में समेट नहीं पाता 
समेटता हूं , तो उसे खुद में सोच नहीं पाता 
क्या, ये ख़लिश भी, खिलाफ है जलाल-- ख्वाहिश की
या ग़ुजीदा गुनाह है, या फिर, इम्तिहान है मेरी आजमाईश की।।

ज़मीर गिरवी रख तेरी मिट्टी पर, ज़ामिन बनकर जो आया 
ज़ियारत कर रहा कलम के दम पर, मगर ये ज़र्ब कैसे निकल आया
एहसास--ज़लाल का फ़िक्र--ज़िक्र हुआ जब, तो दुनिया ज़ार-ज़ार हो गई 
नादीदा नाफ़हम जो अब तक था, वो नाफ़र्मान की नब़्ज भी अब गुलज़ार हो गई।।

अब तक जो हुआ, लगता था, ज़ज्बा बेलगाम हुआ शायद 
मैं जहां रहता था, जहां होता था, लगता है वहां इश्क का इंतजाम था शायद
मेरे होश में आने की खबर नहीं उसे, लगता है मयखानों में पैगाम नहीं मिला शायद
सांसों की गिरह बांध,समेट लिया खुद मैंने,लगता है उसे मेरी उड़ान अंदाजा नहीं शायद।। 

अब मैं, जहां भी होउंगा,गम़्माज़ों के शहर से, मुझ-तक कोई रास्ता ना होगा 
समेट कर सोच को, बिखेर दिया शब्दों में, लेकिन तेरा-मेरा कोई वास्ता ना होगा
सारंगी लिए साधुओं की महफ़िल में मिलेंगे कभी,उस वक्त मेरा साज सस्ता ना होगा 
बंद कर लेना आंखें अपनी फ़िरदौस के मेले में,क्योंकि क़ातिब जैसा कोई फरिश्ता ना होगा।।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 


खलिश-पीड़ा ।।गुज़ीदा= चुना हुआ।जलाल= विशाल।।ज़मीर= मन, हृदय, विचार।।ज़ामिन= विश्वास दिलाने वाला,  जमानतदार।।ज़ियारत= तीर्थयात्रा, धर्मस्थल पर जाना।। ज़र्ब= घाव।।ज़लाल= गलती।।नाफ़हम= मूर्ख।। नाफ़र्मान= आज्ञा मानने वाला।।नब्ज़= नाड़ी की गति, नाड़ी की धड़कन।। गुलज़ार= उपवन, फूलों की क्यारी।।गम़्माज़= भेदिया, चुगलीबाज।।फ़िरदौस= स्वर्ग, उपवन।।क़ातिब - लेखक।।

Wednesday, July 5, 2017

।।तू पीर की मजार, मैं साधुओं की समाधि का संसार।।

लेखक,निर्देशक रजनीश बाबा मेहता 


जिस इश्क में आह ना हो ,वो इश्क बेपरवाह सा है 
जिस इश्क में ख्वाब ना हो ,वो इश्क राख सा है ।।
जिस इश्क में ज़ुबान हो ,वो इश्क नाफ़रमान सा है 
अगर हर इश्क की इबादत हो  ,
तो फिर कयामत में भी इश्क होगा ।।
सात पैबंद से बनी दुनिया हठ सा होगा 
जब बात इश्क की होगी,तो हर दरवाजा मठ सा होगा।।

खोल देना दरारों में डाल उंगलियां इश्क की 
पूंछूंगा सवाल जिस्म की, थोड़ी बारिश कर देना अश्क की
दिखेगी दरारों से शक्ल शायर की, फिर भी ईश्क होगी रश्क सी।।
खुलेंगे कुछ पुराने खत ख्यालों के, धूल भरी किताबों की गांठों में    
कुछ रूह सी शब्दों में एहसासों के, बंद पड़े तालों औऱ बक्सों की साठ-गांठों में।।

रोकना ना कदम जब होगी उम्र पूरी क़फ़स तले इम्तिहान--इश्क की 
तोड़ बंदिशो को नाप लेना जमाने के लिए बन सफेद सा नमाज़ी--गुज़र सी 
रमजा़न सा आउंगा अब्द सा लिबास बदन पर लिए अब्सार--ईश्क सुनाउंगा 
वीराने ईदगाह में कब्र के कोनों तले एक दूसरे के लिए फातिहा जो गाउंगा 
तू पीर की मजार बन, मैं साधुओं की समाधि का संसार बन जिंदा जो रहूंगा 
वो इश्कगाह की कब्रगाह में उम्र आंसूओं तले मोतियों सी चमकती ही बुनूंगा ।।

लो मौत की दस्तक ख़जां भी क्या खूब लाई है इश्क के तकिये तले 
जिस्म में बांध जंजीर चार जणा माथे उठाए,तेरे थोड़े अश्क यूं ही मिले  
फ़कीरियत का पैमाना अब ईश्क का इश्काना हठ पर भारी है   
कब्र के कोठों पर खड़े वो इश्कबाज के आगे जो पूरी दुनिया हारी है 
अब सोच और सपनों की सांसों से स्याही की तकदीर शब्दों में जारी है 
फिक्र ना करना अज़ीम बनने की क्योंकि हर बार बेचारी इश्क ही हारी है  


कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 


क़फ़स= पिंजरा।।अब्द-परमात्मा का दास।।अब्सार= आंखें।।ख़ज़ां (ख़िज़ां)=  वृद्धावस्था।।अज़ीम= महान।।

Monday, June 26, 2017

।।ईश्क की ज़िद या ज़द।।


Rajnish BaBa Mehta Poem
ज़िद थी उसके जश्न में 
जान थी उसकी सांसों में 
धड़कती रही बिस्तरों के किनारे 
सिसकती रही बंद सासों के सहारे।
सोचा मकसद पूछ लूं वक्त तो है 
लेकिन झट से मसलन बढ़ा दिया 
मैं भी गोल तकिए की भांति 
ज़िंदगी के मसले को दबा दिया। 

बंद कमरे में दफन राज जो हुआ 
आज अर्से बाद उससे मुलाकात जो हुआ 
पूछ बैठा अपना सवाल , क्यों नहीं आई थी उस रोज 
इश्क तो था हर रोज, लेकिन भरोसा नहीं किया उसने किसी रोज। 

क़ातिब हूं, मेरी तासीर को स्याही से नापा नहीं तूने 
पन्नों पर लिखे शब्दों को पढ़, फिर भी कभी जाना नहीं तूने 
बंद आंखें लिए गुजर तो गई, लेकिन कब्र को पहचाना नहीं तूने 
खुदा का शुक्र है जो लेटा हूं उसके दस्तरखान में बे नज़ीर बनके 
वरना फकीर तो था मैं तेरे इश्क का,जहां इस अमीर का कभी कद्र नहीं किया तूने।।

अब सोच लिया सांसों की सिलवटों के तले, पूरी रात को भी गले से यूं ही लगाउंगा 
खुद में खुदा को खोजकर उसके तलवे तले, मौत को तेरे इश्क से हसीन बनाउंगा।।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

।।तासीर -प्रभाव।।क़ातिब-लेखक।।बे नज़ीर= जिसके कोई बराबर का हो।।


Wednesday, June 14, 2017

।।खुद ही खुद सोचो।।



खुद को मरते देखा कभी ? आज देखा
खुद को मरते भी देखा, औऱ जिस्म को गिरते भी देखा 
वो शोर भरी सन्नाटों में रातों को रात-रात भर रोते देखा
मरघट की बल्लियों को चिताओं पर सुस्ताते हुए भी देखा 
बस जिंदगी की भीड़ में जिंदगी को जीते, आज-तक ना देखा ।।

सोच को पालने में कभी पलते तो कभी गिरते-प़डते देखा , भूल गए तुम 
खुद के बचपन को इस यौवन में बिखरते देखा, और बुढ़ापे को संवरते देखा
गम्माज़ों को गले लगकर तुम, अपनों से दूर होते, खुद को कई बार क्यों देखा 
क्या फिक्र नहीं थी आंचल की, या फक्र था उस दो पल के सुहाने लम्हों पर 
हश्र तेरा भी वैसा ही होगा,जैसे तपती दोपहरी में सूरज को धूप के लिए तरसते देखा।।

ये वक्त कैसा है ? ख़लिश की बाहों में लड़ते-लड़ते तुम्हारी मौत को खुदा भी ना देखा 
वो जश्न कैसा था?जिसे जीते-जीते,तुमने खुद के साथ-साथ,जिंदगी को भी ना देखा।
काश लौट आते तुम, उस मरघट तले से, जहां जिस्म खुद को मरते देखा करते हैं  
काश उठाकर देख लेते आंचल तुम, जहां तुम्हारी फिक्र में कोई रात-रात भऱ रोया करते हैं ।। 

गम्माज़- चुगलीबाज।।ख़लिश-पीड़ा।।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 


Tuesday, May 30, 2017

बाज़ार-ए-ईश्क

RAJNISH BABA MEHTA WRITER DIRECTOR POET



सितारे समझ नहीं आया, कि सांसो के सहारे 
सपने उलझ नहीं पाया, कि दुनिया गम के किनारे 
रात चादर लिए अंधेरे में,अकेले, जुगनुओं के सहारे।।
लो नंगी कदमों की आहट लिए चल पड़ी वो शायरा 
थी चादर में वो लिपटी, सामने था कौन बनकर वो बेचारे ।।

अगर भोर हुई होती वक्त की, कर लेता उसकी परवाह, छोड़ अपने रक्त की ,
लिपट जाता सांसों में उसकी, मिटा देता सिंदूर सी स्याही, उसके मस्तक की।। 
सौदा इस बार महफिलों की थी, जो तू चिलचिलाती धूप की तरह नाची 
गुजर रहा था जो पास ही वो शाम थी,नजरें मिली ,ना इंतजार किया दस्तक की।।

तेरी गली में लगेगी इश्क औऱ बेवफाई की जो इस बार बाज़ार 
खुश्क गले को साथ आउंगा, रात टहनियों तले उस भीड में गुजारूंगा 
हर हाथ उठेंगे, हर आंखों में पलेंगे,बस दरवाजों के बाहर होगा एक ही इंतजार 
हरे लिबास में निकलेगी गलियों तले, लोग बस यही पूछेंगे, कहां बनेगी तेरी मज़ार।। 

इबादत होगी हर रोज ,ढलती शाम--उम्र के आगे, जहां होगी तेरी मज़ार 
फिर ईश्क की बात तो होगी, लेकिन लगेगी नहीं तेरी बेवफाई की बाज़ार ।।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 


Tuesday, May 23, 2017

।।सर्दी की एक बात सुनो।।

Rajnish Baba Mehta writer Director Poet


सर्दी की एक बात सुनाऊं 
थोड़ी अजीब लगेगी
लेकिन सुनाता हूं
नहीं तो मेरे जिस्म में पेवस्त
कुछ ज़ेहन में भी शब्द शोर मचाते हैं।
लगी थी आग दोनों तरफ
बीच में बैठी थी पसीने में लथपथ
साड़ी घुटने तक समेटे हुए
हाथ तेज़ी से रफ़्तार पर थी
मैं कोने में दुबका ताके जा रहा था।
दोनों तरफ जल रही थी चूल्हें
रोटियां जमकर बेले जा रही थी
एक पर तवा तो दूसरे पर तशला
हाथों में मानों बिजली सा करंट था उसके
भोली-भाली देहाती सर्दी में भी पसीने से तर-बतर
सामने चूल्हे से आग की लपटें उठ रही थी
गर्मी भी तेज लग रही थी ,मज़ा भी ख़ूब आ रहा था।
धुआं उसे लग रहा था , लेकिन जलन मेरी आंखों में हो रहा था।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

।।इंतजार तेरी ढ़लती उम्र का ।।

Writer, Director, Poet Rajnish BaBa Mehta


तुझको छुपाउंगा एक रोज चांद के तलवे तले 
तुझको रुलाउंगा एक रोज चांद के तलवे तले 
जो वेदा है मेरी संवेदनाओं को लाल लहू के तले 
उठ कर जाउंगा मैं हर रोज तेरी ढ़लती उम्र के तले ।।

अय्यार बनकर तेरी साए से टकराया था कई बार
ढ़हता गया मिट्टी का जिस्म ,लेकिन बिन आंसू नफ़्स रोया हर बार।
नामालूम बनकर बिस्तरों से लिपट पड़ा, तकिये तले तेरा रपट अभी भी पड़ा ,
छोड़ ज़िद जाने दे मेरी ज़द से, उलटे पांव आएगी बस आवाज आखिरी बार ।।

कहता रहा काश, जुगनुओं की जगमगाहट में लौट आओ फिर सांसों में 
क्यूं सिमट पड़ी है बंद मुट्ठियों की गरमाहट में, जाओ खो जाओ फिर आहों में  
मेरी नुसर्त मस्तक पर चमकेगी, तेरी घबराहट में, जाओ लौट जाओ दीवारों में 
पैमान है मेरा तुझसे, पयाम की सरसराहट में, जाओ पढ़ लेना मुझे अंधेरी रातों में ।।

ताखे पर बुलाउंगा चांद को गवाही देने, उस रोज की तरह 
मर-मर कर जिस्म को जिंदा करूंगा तेरे लिए ,हर रोज की तरह 
रखना याद, फ़ाख़िर नहीं फ़िदाई था उस चांदनी रात की तरह  
लेकिन नासूर लिए तूझे ज़िदा रखूंगा जुंगनुओं की तरह 
क्योंकि 
तुझको छुपाउंगा एक रोज चांद के तलवे तले 
तुझको रुलाउंगा एक रोज चांद के तलवे तले 
जो वेदा है मेरी संवेदनाओं को लाल लहू के तले 
उठ कर जाउंगा मैं हर रोज तेरी ढ़लती उम्र के तले।।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

नफ़्स= आत्मा।।नामालूम-अनजाना।।नुसर्त= विजय।।पैमान= वचन।।पयाम-संदेश।।फ़ाख़िर= अभिमानी।।फ़िदाई= प्रेमी

Saturday, May 13, 2017

।।मिल के भी मुलाकात ना हो पाएगी ।।

Rajnish BaBa Mehta Director Fillum


मिल के भी मुलाकात ना हो पाएगी 
दिल मे जो बात थी वो जज्बात ना हो पाएगी। 
गम़्माज़ों के शहर में तेरी-मेरी हमरात ना हो पाएगी 
तू चल उल्टे पांव कभी सीधी गलियों में बुरक़े तले 
आखिरी छोड़ पर तूझे शम्मा के अलावा आंखे ना देख पाएगी।।

उंगलियों पर आरजू गिनते-गिनते, मिलूंगा इब्तिसाम भोर से पहले- पहले
आराईश तेरे बदन की देखकर सोच लिया, ख्वाहिश होगी शाम से पहले- पहले।।
खुश हुआ गुमशुदा मेरा दिल, कि तूने अश्क को पलकों पर छोड़ वफा किया तूने 
सोचज़दा की ज़द में बैठा हूं, लोग कब्र तक पहुंच जाते हैं अंजाम से पहले-पहले।

सामने ख्वाब पड़ी है,मलंगियत इश्काना का, छोड़ ना पाउंगा तूझे मौत से पहले-पहले
हौसला दिया ज़हीर बनकर रकीबों के सामने, कि मोहब्बत निभा दिया तूने
वरना लोग लहू से लाल हो जाते है, अंजाम--इश्क के इन्क़िलाब से पहले- पहले
दुहाई देंगे तेरी-मेरी मजनूयत की,जिक्र होगी हर चौराहे पर इतिहास से पहले-पहले।। 

लो चला मैं अब, मिल के भी मिल ना पाएंगे हम, मुलाकात से पहले-पहले
चांद लहराया गगन में, बात करके भी बात ना हो पाएगी, हमरात से पहले-पहले।।

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 


।।गम़्माज़= चुगलीबाज।।इब्तिसाम= मुस्कुराहट।।आराईश= सजावट।।ज़हीर- दोस्त।। रकीब- दुश्मन।।इन्क़िलाब= क्रान्ति।।

Friday, April 21, 2017

वक्त के कदम

Poet Rajnish BaBa Mehta


 वक्त यूं ही बेवक्त पर सवार बिना लगाम दौड़ा है 

जो खींचा उम्र का तागा उसे सब्र पर यूं ही छोड़ा है 
रहगुजर बन मंजिल पर जाने का जूनून जो अंध सा था 
वो अब करीब सी रोशनी में आकर फिर सरपट दौड़ा है।।

आहिस्ता-आहिस्ता अक्ल की बातें अखबारों की दरारों में नजर आने लगी 
बूढ़ी आंखों में नहीं दरवाजों पर यूं दस्तक भी सांकल सी नजर आने लगी 
कांपते कदमों और होठों पर नाचते शब्द अब संकोच के भंवर में डूबने लगी 
आवाज आई ख्वाबों के दरवाजों से, मानो अब जिस्म भी बूढ़ी होने लगी ।।

गज़ल की शक्ल में कब्र के कोनों से कुछ किस्से लहू के सुनाता हूं 
छोड़कर बंसी बीन की तलाश में सपेरों सा कुछ धुन गुनगुनाता हूं 
कुछ बातें घर कर जाए सच्ची साज की तरह तो आवाज देकर बताना 
जब वो दरिया छोड़, मेरे समंदर में समा जाए तो एक बारगी फिर बताना ।।

पूरी लफ्ज तेरे लफ्जों में समा जाए तो परदे के पीछे छिप ना जाना
जो जोग बनकर खड़ा है, जिस्म की आह में उसके जिस्मों में समा ना जाना 
उलझे वक्त में कोई ज़हीर, तेरे जज़्बात के करीब हो तो ईशारों से खबर करना 
क्योंकि भीड़ के कोनों में खड़ा होकर,आदतन या इबातन बेवजह शोर मत करना।। 

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Monday, April 17, 2017

।।ख़्वाब ऱख आया।।

Poet Rajnish baba mehta 



तेरे गुलिस्तें में, मैं अपना ख़्वाब रख आया 
वो तकिये के नीचे तेरा पुराना खत रख आया 
खोलकर पाजे़ब कभी दीवारों की दरारों में मत रखना 
कारे कारे कजरारे नैनों में, काजलों का घर मत रखना 
छोड़कर गुनाहों को तू, मुझ फकीर का ख्याल मत रखना 
अपनी जमाल की हरारतों के तले, चांद का भी फिक्र मत करना ।।


सुना है तुझे अश्कों से पीकर, ख्वाबों-खयाल भी खूब टूटते हैं 
सुना है तेरी आहटों की दीवार पर चढ़कर, बर्बादी भी खूब लुटते हैं
खबर थी खतों में, चिपके दीवारों पर, तेरे बदन की गोदनाई तराशों पर 
तेरी घूंघट की दीदार को, मेले में खलिश लिए ख्वाहिश भी खूब जुटते हैं।।


खुर्शीद की रोशनी में, ख़ुर्रम आदत थी या ख़ुर्रम फितरत थी, सोचा नहीं कभी 
खुद की जिस्म को भूलकर, अश्कों से खूब टकराया,लेकिन तूझे पाया नहीं कभी  
ख़ाक बनकर ख़त्म की कगार पर खड़ा था, फिर भी विरह की गीत सुनाया नहीं कभी 
खुश्क चेहरे की आखिरी धड़कन को सुना खूब तुमने, फिर पनाह मिली नहीं कभी ।।

मिलूंगा आखिरी पन्नें की आखिरी लाईन पर, धुंधली स्याही के साथ 
बदलकर भेष ,बनकर जोगी ,मिलाएगी सांसों से सांसें, तू ज़हीर के साथ।। 

कातिब 
रजनीश बाबा मेहता  


।।जमाल= सुन्दरता ।।हरारत -गरमी।।ख़लिश= पीड़ा,शंका।।ख़ुर्रम= प्रसन्न,खुश।।ख़ूर्शीद (ख़ुर्शीद)=सूर्य।।ख़ला- खाली, जगह।।ज़हीर= साथी।।

Sunday, April 16, 2017

।।मेरा जिस्म साधू ना होगा।।


इश्क भी एक रोग है, जिस्म का नहीं, जे़हन में बैठा
तेरा मेरा एक जोग है, तुझसा ही सही मुझमें सिमटा
गलियों के किस्से बन गए, मेरी कहानी तुझमें लिपटा 
भला हम मानते कब थे, जो तुम सब कुछ जानते थे
तुम छोटी सी गजल में, लेकिन वो सितारों की पनघट पर थे
तुम धीमी आहटों में , लेकिन वो चाहतों की सन्नाटों में थे।।


उसे मालूम ही कहां था, तेरी सांसों की सिवलट पर हमआयल की
मैंने ज़िक्र ही कहां किया ,तेरे होठों की गुलाबी मुस्कुराहट की
तेरे आंखों की इशारों से जो हुआ जिस्म बेपर्दा घायल की
वो सफ्फाक सा संगमरमरी बदन लिए, तू मुझमें कैसे पेवस्त की ।।


तेरी जुल्फों की अंगड़ाई, तेरी पाजेब की रंग मेरे माथों पर घर कर गई
फिर भी ना मेरा दिल बेकाबू होगा, ना ही मेरा जिस्म साधू होगा
तेरी-मेरी गलियों की आखिरी छोड़ पर, ना तेरा निशां होगा ना मेरा शमां होगा
बस यादों के पन्नों पर, बिखरे लफ्जों की तरह, दो शब्द तेरा होगा, दो शब्द मेरा होगा।।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

Monday, April 3, 2017

।।जोगी बन रूह बना।।

Rajnish BaBa Mehta Writer

थिरकते होठों और कांपते शब्दों की जुंबिश में, जान होगा किसी का
रेतीली गरम हवाओं और तपते तलवों के बीच, पहचान होगा किसी का !
रात ऐसी रोती होगी, खुली खिड़कियों के बाहर, बेज़ुबान होगा किसी का
दस्तक दी थी बार बार, यही सोच दरवाजा ना खोला, मेहमान होगा किसी का !

जोगी बन लूटने चला था भरी दोपहरी में, खुली आंखें शाम होने को आया
संगमरमरी जिस्म ओढ़े लेटी रही चारपाई पर, बिना खोले पूरी ख़त पढ़ आया !
दस्तक की आहट से चौंक उठे दरवाजे, कहने लगी, आधी नींद में था शरमाया
छोड़ा आधी बातों को बीच रातों में, अफसोस तेरा भ्रम हकीकत में पूरा ना कर पाया !
मेरी तिश्नगी तसव्वुर से निकलकर तेरी तस्वीर की दास्तां बन गई
नातर्स थी तू खिड़कियों पर खड़ी, सामने वो नादीदा निहारती रोती चली गई
नब़्ज नाबूद हो गया , फिर भी सिराहने तले से वो ताकती चली गई
हर सोच को जो सहेज कर रखा, आखिरी लम्हों में वो पेवस्त होती चली गई।।
अब राख सा ज़िस्म रूह बनकर ,चांद तले रात-रात रोया जो करेगा
सामने हकीकत देख, बस अब फ़सानों की बात कर वो अफसोस जताया करेगा।।
ढ़ूढना कभी जो चांदनी रात आएगी, मिलूंगा सामने ,फिर भी तू जी भरकर रोया करेगी
मिलके भी ना मिल पाएंगे, सामने अक्श तो होगा, लेकिन अफ़सोस भी तू खूब जताया करेगी।।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता 
।।तिश्नगी - प्यास ।।तसव्वुर-कल्पना।।नातर्स-कठोर हृदय ।।नादीदा -लालची ।।नाब़ूद -लुप्त ।।

।।प्रेम या पहेली।।

Rajnish Baba Mehta Director

ज़िंदगी की हकीकत को आज पहेली बनते देखा
हंसते आंखों के कोनों में काजलों के साथ आंसूंओं को देखा
कठोर सी लगने वाली सांसों को मोम सा पिघलते देखा 
लाजवंती सी लाल उसको, कृष्ण की राधा बनते देखा ।।
परदों में आई पहली बार, बोला साज को साज ही रहने दो
सिलते लफ्ज होते तो कहता राज को राज ही रहने दो
आंसूओं में आए अल्फ़ाज, चीख चीख कहते रहे, मेरा दर्द तो मुझे कहने दो
गमनीयत के माहौल में ,मेरे कान भी बोल पड़े, कुछ अल्फाज मुझे भी तो कहने दो।।
हुई बेपर्दा वो आईने की तक्सीद में नहीं ,मेरे पहलूओं में बार बार
लकी थी वो, जो चांद के सामने, दर्द को लेकर रोई हर-बार
जिस्म था पराया, डर का था साया , फिर भी अत्फ़ पहुंचाया कई-बार
लगी अदालत सोच की सड़क पर, टूट कर बिखर जाती सरेआम वो हर-बार।।
झूठ का पूलिंदा लिए जो चली थी, सच के चौराहे पर वो पहली बार
आंसूओं में बह गया वो रकीब, जो दर्द दिया था उसे आखिरी बार
प्रेम बनकर जो आई ,थी वो ज़हीर किसी की, पहेली बनकर चली गई ,
कुछ अल्फाज मेरी झोली में छोड़, इस क़ातिब के किस्सों में समा गई।।
शब्दों की लकीरों से तूझे तराश लूंगा पीले पन्नों पर एक रोज़
बस एक बार और मिलना काजलों में सने आंसूंओं के साथ किसी रोज
ख़जालत छोड़ ख़त लिखना तूम ,आउंगा उसी चौराहे पर जहां मिली थी हर रोज
तेरी-मेरी कहानी की आखिरी पन्ने को पढ़, स्याही सी अश्क से लिखूंगा एक रोज।।
पता है कभी ढूंढ ना पाउंगा तेरी छुअन, प्रेम थी या पहेली उस रोज।।
कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता 
।।तक्सीद -खोज।।अत्फ़ -प्रेम।।ज़हीर -मित्र,साथी।।क़ातिब -लेखक।।ख़जालत- लज्जा।।

।। मैं कृष्ण रण में खड़ा ।।

Rajnish BaBa Mehta 

लफ़्ज लाल कर दे तू
मैं जिस्म लाल कर दूंगा।।
एक पल में सोच समेट ले तू 
मैं समंदर खाक कर दूंगा।।
रूह बनकर सवेरा जो उठा है
रात बनकर आजमा ले मुझे तू
चांदनी सा मैं खड़ा, अडिग अपने पथ पर पड़ा
कर रहा वार प्रहार, घने बादल के साजिश तले तू।।
छोड़ षड़यंत्रों का खेला,
खड़ा मैं रण में तेरे लिए अकेला
उठा विष, चला बाण, कर प्रहार जोर का तू
फिर भी जिस्मों के झुंड में , मुझे खड़ा अकेला पाएगा तू।
उस वक्त माफी की गुंजाईश ना होगी
क्रोध की अग्नि में अगर मैं जला ,तो तेरे सर धड़ ना होगी।
ना कोई गीतासार सुनाएगा, ना कोई विनाश का व्यवहार समझाएगा
क्योंकि बना कृष्ण मैं, तुम्हें सिर्फ सर्वनाश का मंजर दिखाएगा।।
रोक ले लफ़्ज को लाल होने से तू
रोक ले विष बाण का प्रहार तू
तो फिर ना समंदर खाक होगा
तो फिर ना रूह किसी का राख होगा।।
कातिब 
रजनीश बाबा मेहता