Thursday, March 19, 2020

।।मरा नहीं, परियों की कहानी सुनता नजर आया।।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta

अरसा गुज़र गया, मगर ज़िंदगी का कोई फलसफ़ा नजर ही नहीं आया,
बरसों बाद वक्त ने ली ऐसी करवट, जहां जुगनू भी मुर्दा ही नजर आया।।
सुनसान सड़कों पर बेपरवाह वीरानियां कुछ खुसफुसा कर बतिया रही है
ये क्या,घऱों में बंद ज़िंदा जिस्म,मगर राहों पर हवाओं की साजिश ही नजर आया।। 

सन्नाटाओं की इबादत आसान नहीं,फिर भी हर कोई सजदा ही करता नजर आया, 
बंद जुबां लिए दस्तरखान में बैठा है, फिर भी सूनी आंखों से चीखता ही नजर आया।।
बेबसी की बारात जो निकली , उस रात हर जेब से पुरानी दरख्वास्त जो निकली ,
ना धर्म पूछा ना जात पूछी ,बस हिज़ाबों तले दुआओं की चौखट पर रेंगता ही नजर आया।। 

चार कंधों पर चलने वाली जिंदगी आराम जो करने लगी, ना जाने क्यों वो जागता नजर आया,
मिट्टी में, पानी में, धूप में, ध्यान में, मौत गर्द सी जमी है फिर भी जिंदगी ही क्यूं नजर आया।। 
भागती भीड़ में गुम सा गया था, उड़ती ख्वाहिशों में खो गया था,मगर जिंदा रहने का डर दे गया, 
लौट रहा हूं बरसों बाद सांझ-संकारे,देर हुई,मगर खुली आंखें तो घर का सांकल ही नजर आया।।

अंधेरी गलियों के अहाते तले सूने सब्र को समेट कर, आज हर कोई भीड़ से अकेला ही लौटता नजर आया,
ज़माने को शौक से सुनते-सुनते उमर गुजर गई,लेकिन पहली बार आज अपनी आवाज सुनता नजर आया।।
कैद--हयात मुकम्मल हुआ तो रोशनी गई, मगर उमर के दरवाजे तले वो अकेला ही लड़ता नजर आया,
कौन कहता है कि मौत आएगी तो मर जाएगा, वो तो बस सोते-सोते परियों की कहानी सुनता ही नजर आया।।

कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता

Monday, March 9, 2020

।।धूप के बिना भी परछाई को चलते देखा था।





बेबसी की उस गुमनाम कासनी रातों को ख्यालों के धागों से पहली बार बांधा था,
गुम होती होश बदनाम बिस्तरों के किनारे,उन गिरहों को हर बार खुलते देखा था।।
टूटती सांसों के दरम्यां बंजर रास्तों पर चलने वाला, आखिरी सवाल थोड़ा इश्काना था,
बंद दरबाजों के तले खुलती आंखों ने , धूप के बिना भी परछाई को चलते देखा था।।

भरी दोपहरी में यादों के बिन-बयारों तले,अक्सर अफ़सानों को बिन आंसू रोते देखा था,
आसमानी आरज़ू की फ़िराक में, कई गुमनाम बस्तियों को बिन आग जलते देखा था।।
सरे-शाम जो किया अहद-ए-वफ़ा, लालिमा तले अब वो गुनाह-ए-राख सा हो गया, 
क्योंकि मस्ती-ए-पैमाने तले, खुशबू-ए-कबाओं में लम्स-ए-जनाना को पिघलते देखा था।।

मेरे शीशे में आहिस्ता-आहिस्ता ढ़लने की फिराक में, हर पल उसे बिखरते देखा था,
टूटते आइनों के कोरों से झांकती रिश्तों की गिरहों तले, हर पल उसे संवरते देखा था।।
राहों से कई रहगुज़र ज़त्थों में गुज़र क्या गए, हर झरोखों पर उसे यूं ही इतराते देखा था, 
हासिल हसरतों को लब पर लिए, ख्वाबों-ओ-नक्श की चाह में उसे आखिरी बार मरते देखा था।।

बेशमीकमती था गमहा-ए-मोहब्बत मगर फ़ुरकत-ए-यार का सब्र लिए,अब गेसू जो हवा में यूं ही लहराए,
बिन आवाज कोई तो पुकार लो इक उम्र में थोड़ी ज़िद की ज़द लिए,अब नफ़्स बादलों में यूं हीं ना ठहराए।।
शुक्र है ठिठुरन भरी सर्द रातों की, बिन तेरे साथ हाथों में लिए हाथ,अब होगी ना कोई हिज़्र की क़ासनी रात,
गर बाजी इश्क की हारी तो डर कैसा अब कब्र करीब है,जाओ मोहब्बत मातम से कह दो, यूं ही ना घबराए।। 


कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता

सरे-शाम = शाम के समय।।अहद--वफ़ा= वफ़ा की प्रतिज्ञा।।मस्ती--पैमाने= शराब के प्याले की मस्ती।।ख़ुशबू--क़बा= वस्त्र की सुगंध।।लम्से-जनाना=  प्रेमिका का स्पर्श।।फ़ुरक़ते-यार-= प्रेमिका से विरह।। गेसू -बालों की लट।। 








Friday, February 7, 2020

।।हसरतें।।



रत-जगों वाली जुगनू की हसरतें किसकी है, 
क्या अर्ज़-ए-हुनर की जमानत सिर्फ उसकी है।।
सलीकों वाली शर्त, उमर का लिहाज लिए किसकी है, 
हर ऐब को हुनर बताना, क्या ये आदत सिर्फ उसकी है ।।

लिया फैसला फासलों तले, कि उसकी जफ़ां पर खीचूंगा लकीरें, 
उसकी-किसकी भंवर से निकलकर, बनाउंगा हंसती हुई नई तकदीरें।।
फरिश्ताओं के फ़सानों पर फक्र नहीं, हर बातें उसकी झूठी जैसी थी,
अंधेरों तले सफेद ईश्क दिखती थी, जैसे मेरी लहू पर गिरती उसकी शमशीरें थी।

आज़ाद हो रहा हूं गुल-ए-शाख से, उसकी अजमाईश-ए-फरमाईश की तरह
खुद की शक्ल देखने की फिराक में, टूटने लगा दीवार पर लगे जर्ब आइनों की तरह।।
मरता है अब हर कोई कहानी-ए-गुल में, कोरे कागज तले अहवाल-ए-दिल की तरह, 
उम्मीद है फिक्र होगी उसे एक रोज, जब मोहब्बत टूटेगी कयामत-ए-गुल की तरह।। 

उस अंधेरी कासनी रातों में बारिश का बोझ लिए बुझता सूरज यूं हीं जलता रहा 
अंगीठी वाली ईश्क की फिराक में बादलों के बाहर चांद यूं ही सुलगता रहा ।।
फंसी मदीने के मुहाने पर नंगे पांव, जैसे तपती धूप में बर्फ ना जाने क्यूं पिघलता रहा, 
लो छोड़ दिया मर्सिया-ए-ईश्क की इबादत, फिर भी ना जाने कब्र में क्यूं जलता रहा।। 

जफ़ा- अत्याचार  ।। 

कातिब &  कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, January 8, 2020

।।हौसला-ए-गुरूर।।

Writer, Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta

सिसकते समंदरों की सांस, साज़िश ही नज़र आती है,
बंद लिफाफों में ख्वाहिश, गुज़ारिश ही नज़र आती है।।
रोते पन्नों पर बिखरते लफ़्जों की आजमाईश ही नज़र आती है,
उम्र को बंद कर दिया कल्पनाओं की दीवारों वाली दरवाजों में 
फिर भी ना जाने क्यों हर पल खुद की फरमाईश ही नज़र आती है।। 

ज़माने बाद हौसलाई हिम्मत कुछ पल के लिए डगमगा सा गया 
अश्फ़ाक की उम्मीद में अपना ही कंधा ना जाने कहीं खो सा गया।।
सुकून इस बीते सफ़र की है, जो जज़्बातों की कहानी सुना सा गया
बंद मुट्ठी जो खोली है, सारी लकीरों ने आने वाली लम्हों का आइना दिखा सा गया।।

अब तो स्याही वाली शब्दों तले, काली लकीरों का इरादा जरूर निकलेगा, 
इस सियाह समुंदर तले कहानियों की बानगी लिए ख़याल--नूर निकलेगा।।
उम्मीद कीजिए अगर उम्मीद नहीं होगी, फिर भी ख़्वाहिश--सुरूर निकलेगा,
ऩए दशक में नई रिश्तों की गिरहें तले भऱी महफिल में हौसला--गुरूर निकलेगा।।

तो बस इंतजार है, उम्मीद है, ख्वाहिश है, बदले मौसम में बदला तराना है,
नज़र में शोखियां, लब पर मोहब्बत, हाथों में हुनर, सामने सारा जमाना है।।
बीतें लम्हों के साथ मुद्दतें बीत गई, अब तो सामने बचा सिर्फ अफ़साना है, 

पुराने दरवाजे को बंद कर नई उम्मीद जो जागी है, बस वही गुनगुनाना है।।

    #कातिब &  #कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 


अश्फ़ाक= सहारा

Tuesday, December 31, 2019

।।जो गुज़र गया वो मेरा था ही नहीं, जो आने वाला है उसे मेरे सिवा कोई पाएगा नहीं।।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta


गुजरे हुए लम्हें अदम--राख़ का अफ़साना छोड़ गया, 
अमानत की ख्याल में वो लम्हें हक़ीकत का फ़साना छोड़ गया।।
हर रोज सुबह औऱ शाम होती, मानो उम्र अब धीमी आंच पर होती, 
जो गुजर गया उस साख की तलाश में, सारा जमाना छोड़ गया ।। 

अब तो दस्तक नहीं, मस्तक की टेक है, आने वाली हौसलाई सवेरों की, 
ढ़ल गई सियाह रात, निकला है सूरज, अब बात होगी बौराई बयारों की।। 
आक़िबत की फ़िक्र छोड़ अब तो वक्त आया, आज़िम वाली किस्सों की 
ख़ता ख़त्म कर ख़फा छो़ड़ दिया, अब तो बात होगी नई वाली मज़ार--ख़ुदा की।।

जो गुज़र गया वो मेरा था ही नहीं, जो आने वाला है उसे मेरे सिवा कोई पाएगा नहीं,
अंधी गलियों में अब कोई रोएगा नहीं, जो भोर वाली बात मेरे सिवा कोई सुनाएगा नहीं।। 
नफ़रतों की धूप भले बदन को झुलसा गई, लेकिन दरिया--राख में जलने से मेरे सिवा कोई बचाएगा नहीं, 
नई महफिल में नए चेहरों का लगा मेला है, फिर भी लगा ले शर्त, मेरे सिवा कोई गले लगाएगा नहीं ।।

नई रोशनी में अफ़सानों की फिराक तले, अब तो शब्दों सा ढ़लता जा रहा हूं, 
वक्त के पुराने दिये को बुझाकर, कहानीबाजी की मोम तले पिघलता जा रहा हूं।।
पूरा सफ़र आईनों की ज़द में है, फिर भी नई सोच तले अपनी शक्ल बदलता जा रहा हूं। 
अज़ीम ज़माने की खुशबू खुद की रूह में लिए, अब तो धीरे-धीरे संभलता जा रहा हूं।।

#कातिब  amp; #कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता  

अदम = शून्य, अमानत = धरोहर आक़िबत = अन्त, अज़ीम = महान

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta


Saturday, December 28, 2019

।।लफ्ज़ कभी बेज़ुबान नहीं होती।।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta



मुलाक़ात करना है तो मातम का इंतज़ार क्यों,
जाओ कभी गैरत--गाह में फिर सोचना क्यों।। 
कभी राह--तमन्ना पर होगी तेरी-मेरी रवानगी 
फैसला आखिरी, जब केसरिया का लिया 
तो फिर गोशे वाली कब्र के धुएं की फ़िक्र क्यों ।।

अब तो आंधी ने ख्वाबों की आखिरी आशियां भी उड़ा दिए 
मोहब्बत वाली मर्सिया सुनकर जलते चरागों ने खुद को बुझा लिए।। 
बेमान बेबस बनकर नाउम्मीदी का कफ़न अब तो सरेआम यूं ही बिछा दिए
चले जो तुम दीवारों की कगारों पर,नजरें क्या मिली तुम यूं ही मुस्कुरा दिए।।

विरह की वार तले जूलियट समझ सारे शहर में तुम्हारे बुत यूं ही बना दिए
उस रात परवाने से मिलने आई, तो सारे शहर ने अपने-अपने ज़ख्म दिखा दिए।।
लफ़्फाजी की ऐसी जालसाजी थी, मानों फिर नई बेवफाई की कोई साज़िश थी 
ईश्क में ज़िदा होने का डर लिए,मैंने तो अपनी कब्र अपने हाथों से जला दिए।।

अब तक मौत के बाद भी ख़ुद को आज़ाद करने की फ़िराक़ में हूं
उस अंधेरी राह--सफ़र पर ख़ुद को तराशने की फ़िराक़ में हूं।
अब भी ना जाने क्यों आख़िरी सच की तलाश में थोड़ा उलझा हूं
थोड़ी दूर जो मिलेगी शमां उसे अभी से जलाने की फ़िराक़ में हूं।

तेरी इश्क्यारी वाली बातें याद है, कि इबादत की आवाज़ नहीं होती,
वो करवटों तले तुमने ही सिखाया था, कि खुदा की कोई साज नहीं होती।
समेट कर अल्फ़ाज खुद को खुद की ज़ुबान में सोचूंगा,
क्योंकि सब कहते हैं लफ्ज़ कभी बेज़ुबान नहीं होती।। 

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 

Monday, December 16, 2019

।।ये सर क्यों झुक सा गया है ?।।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta

ये सर ना जाने क्यों झुक-सा गया है,
चलती राहों पर क्यों रूक-सा गया है ?
गुरूर गर्व था मगर बेबसी बातों में क्यों थी,
सवाल दूसरों से नहीं बस खुद औऱ खुदा से पूछता हूं,
तेज दौड़ तो रहा हूं ,फिर भी ना जाने ये सर क्यों झुक-सा गया है ?

लहू का रंग एक, जिस्म की बनावट एक, 
मातृभूमि की शीष पर जन्म औऱ मरण एक, 
भूख एक, निवाला एक, ज़ुबान एक, आवाज एक,
धरती एक, आसमान एक, इबादत एक, आदत एक, 
फिर भी चलती राहों पर मेरी निगाहें क्यों झुक सा गया है ? 

सवालों की फेहरिस्त लिए चल तो रहा हूं 
लेकिन हौसला क्यों रूक-सा गया है ?

अरसे बाद वक्त ने बेवक्त आवाज दी 
चारों दिशाओं ने अपनी-अपनी परवाह दी 
गगन गूंज कर भरी भीड़ में हिदायत भी दी 
अल्लाह ने बिन मांगे कौम को कयामत भी दी
फिर भी लाल लफ्ज़ के आगे क्यों झुक-सा गया हूं ? 

बिन मांगे मिली मौत, अब हर पल का तोहफा क्यों नज़र आने लगी है,
एक ही धागों से बुनते कपड़े, लेकिन मेरी पहचान क्यों लिबासी होने लगी है ?
मुझको लूटते देख पौरूष, तेरे अंदर वही पुराना शैतान क्यों पलने लगा है, 
ये कैसी मोहब्बत-भरी-दुश्मनी है, जो सारे ज़माने को अंधी आंखों से नज़र आने लगी है। 

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता

Thursday, November 28, 2019

।।कारीगर हूं साहब।।

Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta








Writer & Director कहानीबाज Rajnish BaBa Mehta




कारीगरों की खामोश बात किसी ने सुनी है अबतक 
हुनर को तराशने का हौसला किसी ने देखा है अबतक !!
हर रोज घिसती किस्मत पर सवार होकर दौड़ा है कोई 
सिलते लफ़्जों की तलहटी तले अब हर रोज चीखता है कोई 
कहता हैकारीगर हूं साहबमेरी हुनर की आवाज सुनता है कहां कोई।।
जो कभी जान ना पाओ तो तोल लेना तराजू के पलड़ों पर 
हंस कर अपना दर्द छुपाना जानता हूं बस इसी कारीगरी पर।।
नसीब ऐसा कि कुछ को कलाकार, तो कुछ को बेकार नजर आता हूं
उंगलियों से गढ़ी तकदीर मगर अब जमाने के लिए बस बाज़ार ही नजर आता हूं। 
किसी की आस पर गुजार रहा हूं जिंदगी, अब तो हर शख़्स को बेईमान नज़र आता हूं,   
उम्मीदों की महफिल में हुनर का तमाशा रोज दिखाकर, अक्सर यूहीं खाली हाथ घर लौट आता हूं।।

कातिब & कहानीबाज 
रजनीश बाबा मेहता 

नार्थ इस्ट में हजारों कारीगर आज कम पैसों की वजह से अपनी हुनर से समझौता करने पर मजबूर हैं। लकड़ी से बने सामान हमारी घर की शोभा होती है, लेकिन वही सामान नार्थ इस्ट के गांवों में उसे बनाने वालों के यहां कौड़ियों के भाव मिलता है। आसान नहीं होता अपनी हुनर की सही कीमत को हासिल करना। मुश्किल है, बहुत ही मुश्किल, इतना मुश्किल कि ये समस्या कभी हल ना होगी। बात वहां की हो या यहां ही हालात एक जैसे हैं।