
Monday, March 30, 2009
सारी बंदिशों को तू तोड़ दे

Friday, March 20, 2009
वो फिर मुझसे बातें की

हर रात की तन्हाईयों में जीने वाली
आज वो मुझसे हंस कर बातें की।
फैशन में लिपटी वो छरहरी काया
तिरछी नज़रों से निगाहें भी मिलाई।
वर्षों बाद प्यार भरी बातें सुनकर ऐसा लगा
मानो सारे जहां की खुशियां बिखेर दी उसने।
हाथों की लकीरों में देखा था कभी मैने उसे
एक समय वो रूठ कर गई थी मुझसे।
लेकिन आज मै मना लाया उसे।
कब तक चलेगा ये सिलसिला
य़े देखना है मुझे और उसे।
Wednesday, March 18, 2009
अपना एहसास

अपने प्यार का पहला पन्ना सुनाना चाहता हूं आपसे।
दिल की बेरूखी तुम मुझे यूं न दिखाओ
अपने पहलू में बिठाकर अश्कों में देखना चाहता हूं आपको।
मिलनसागर की गीतों के सहारें जो पल गुजारा है मैंने
वो गीतों की मालाएं भेंट करना चाहता हूं आपको।
अपने दामन को बेदाग रखा जमाने से बचा के
उसी दामन की छांव में आसरा चाहता हूं मैं आपसे।
अपने निग़ाहों से तुम मुझे दूर न करना
वरना वो नज़्म भूल जाऊंगा
जो सुनाना चाहता था मैं आपसे।
Tuesday, March 17, 2009
नेता से रिश्ता

हर रास्तों से बड़ा है रिश्ता।
हर किसी का नहीं है इससे वास्ता।
राजनीति में नहीं होता कोई रिश्ता
मां बीजेपी में तो बेटा का होता कांग्रेस से नाता
हर घड़ी हर क्षण पलटवार के फिराक में रहता है
तभी तो लोग कहते है तू है सबसे बड़ा नेता।
चुनाव आते ही अभिनेता भी बन जाता है नेता
मंच पर चढ़कर पार्टी के सुर में सुर मिलाता है
मौका आने पर गिरगिट की तरह रंग भी बदल लेता है नेता।
हर पार्टी से जिसका है नाता
वो है हमारी देश की बेचारी जनता।
--------रजनीश कुमार
Wednesday, February 11, 2009
अंधेरी रात.....?

दिल ने मेरा... आज चांद चुरा के लाया है.....
जुगनूओं की जगमग ने आज मुझे रास्ता दिखाया है...
चमकती पेड़ की टहनियों पर दिख रही है ओस की बूदें..
जैसे रात की मालाएं लिए है...ओस की बूंदें...
सूने आसमान की ओर तकती है...मेरी आंखे..
काली घनघोर रातें घूम रही है ...फैलाएं अपनी बाहें
रात में जगमग तारों की कहानी लिए
हवाओं ने नई दिशाओं में उड़ान भरी है...
इन अंधेरी रातों में रास्ता भी मुड़ना भूल गई..
चमकती बिजलियों की गड़गड़ाहट में
बारिश भी बरसना भूल गई....
खेतों की रखवाली करता वो किसना...
इन अंधेरी रातों में सोना भूल गया...
खेतों की पगडंडियों के बीच सन्नाटे में...
कोई चलना भूल गया.....
Wednesday, January 21, 2009
इंतजार औऱ मैं....!

इंतजार औऱ मैं....!
तेरे यादों में जीने के लिए बैठा हूं मैं...
सूनी राह को तकती है हरपल मेरी आंखें..
वो धूप की छांवों में तेरा इंतजार लिए बैठा हूं..
अपने आप की तलाश में भटकता हुआ
तेरे करीब आने की फिराक में बैठा हूं मैं....
लोंगो की नसीहतों को नकारता जा रहा हूं ..
तुझे बेपर्दा होकर जाते देख रहा हूं मैं...
काश तू एक नजर भर देख लेती मेरी निगाहों को...
तो यूं न तेरे इंतजार में बैठा होता मैं...
Tuesday, January 20, 2009
भूखा बालक

लिए हाथ में काला पेपर औऱ पैरों में सफेद जूते
जून की चिलचिलाती गर्मी को महसूस कर रहा था वो
भरी भीड़ में बैचैन सा कभी चलता
तो कभी रूक कर सामने वाले को निहारता था वो।
उसके चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था
मानों वर्षों से भूखा है वो.....
हाथ की छोटी छोटी उंगलियों को घुमाते हुए...
खुद को परेशान कर रहा था वो....
जब भी भूख लगती एक आवाज लगाता खुद को..
फिर थोड़ी देर बाद अपने आप को शांत करता नज़र आता वो...
रात घिरने को आई स्ट्रीट लाइट भी जल उठी...
फिर अपने घर की ओऱ जा रहा था वो...
रास्ते में इधर उधर देखता.....
शायद खाने को कुछ पा लेता वो.....
घर पहुंचने को आया फिर भी भूखा था….
चेहरे की परेशानी से भागने की फिराक में था वो...
घर पहुंच कर लालटेन की रोशनी में सोचने लगा था वो....
मां की आवाज आयी बेटा सोने का वक्त हो गया...
नन्ही उंगलियों से रोशनी को धीमा करके....
बिस्तर की तलाश में चल पड़ा था वो।
Sunday, January 4, 2009
है जवाब

मैं अपने नीदों के ख्यालों में खोया था...
वो ओस की बूंदे मेरे चेहरे से टकराती...
फिर अपने में ही गुम होकर वो कहीं खो जाती...
रात के जुगनुओं ने भी रची है एक अलग कहानी...
ओस की बूंदों से प्यास मिटाकर बचा रही है अपनी निशानी...
हर पल नए ख्यालों को बुनता जा रहा हूं मैं...
उस राह की मोड़ पर मुड़ना भूल गया हूं मैं....
इन सुनसान मिट्टी भरी गलियों में अकेला चलता जा रहा हूं मैं...
हर कदम पर सवालों से परेशान होता जा रहा हूं मैं..
क्या अपने रास्तों से भटक गया हूं मैं.... ?
क्या एक चेहरे की याद में दूर तलक आ गया हूं मैं ?
Thursday, January 1, 2009
मेरी जिंदगी, तुम्हारी जिंदगी

हर मोड़ पर खड़ी है एक नई जिंदगी..
खुशियों को हर पल तलाशती है जिंदगी
गमों से पार पाना चाहती है जिंदगी...
अंधेरी सुनसान बंद गलियों में खड़ी है हमारी जिंदगी..
वक्त ने दिखाया है आज एक नया आईना...
अंधेरों से निकलकर आज आजाद हुई है हमारी जिंदगी.....
आंखे उठाकर आसमां की ओर देख रहा हूं मैं...
हर एक तारें में दिख रही है हमारी जिंदगी....
पत्थरों की प्यास में झलकती है हमारी जिंदगी....
हर दीवार के जर्रे में है एक जिंदगी....
एक राह पर दौड़ रही है दो जिंदगी.....
फिर भी सोचने को मजबूर है हमारी जिंदगी...
फिर भी रटते रहते हैं हम...
जिंदगी जिंदगी जिंदगी....
हमारी जिंदगी, तुम्हारी जिंदगी...
Tuesday, December 2, 2008
आतंकी हमलों की दास्तान
आतंकी हमलों की दास्तान धमाकों की गूंज किसने सुनी ?
सबने सुनी हमने सुनी आपने भी सुनी।
अगर किसी ने नहीं सुनी तो नेताओं ने नहीं सुनी।
गोली किसे लगी मातम किसके घर मना ?
आपके घर और बेगुनाहों के घर मना।
क्या कोई नेता इस हमले का शिकार हुआ ?
क्या किसी नेताओं के घर मातम मनाया गया ?
ये सवाल आज आक्रोश बनकर जनतंत्र से निकल रहा है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है गलती किसकी ?
मैं न तो नेताओं की गलती मानता हूं
ना किसी और की
गलती है हमारी और आपकी।
इन नेताओं को गद्धी पर बैठने का मौका किसने दिया ?
इन नेताओं के बेतुकी बयानबाजी करने का मौका किसने दिया ?
हमने और आपने
जो हो गया उस बात पर रोने की आदत किसकी है ?
आपकी और हमारी, न कि इन नेताओं की ।
मुंबई हमले में हताहत हुए लोगों की नींद किसने उड़ा दी
सीधा जवाब आतंकियों ने
सबने माना हमने माना और आपने भी माना।
आज मुंबई आजाद तो है लेकिन आंसू किसके बह रहे है ?
उस बेचारे ताज के जो कभी सीना ताने देश के गौरव के समान था।
भले ही ताज आजाद है लेकिन हम अभी भी गुलाम है
किसके ?
उन नेता रूपी आतंकियों के जो सफेद कपड़ों में हर जगह पाए जाते है।
जिसके लिए 5000 जानों का मतलब 5000 ही होता है
200 जानें गई तो क्या गई ?
लगता है पूरे 5000 का वादा किया था आतंकियो ने इनसे।
इनकी बयानबाजी में ऐसा ही लगता है।
आज रोते हुए ताज और नरीमन हाउस की तस्वीर आंसू बहाती ओवेरॉय होटल
क्या कभी भूल पाएगी इन घटनाओं को ?
------Rajnish Kumar
Saturday, November 29, 2008
गलियारा यादों का

लेकिन एक चेहरा अभी भी याद है
काश वो चिट्ठी न आती तो वो याद भी न आती।
डाकिये की आवाज अभी भीं गूंज रही है मेरे कानों में
‘साहब जी किसी मैडम ने आपके नाम से ख़त भेजा है’
मैडम से मेरे जेहन में एक नाम ही गूंजा
क्या मां ने भी खत भेजना शुरू कर दिया।
लेकिन हाथ में लिफाफा लिए मैं ठगा सा रह गया
कि डाकिये ने तो मेरी जिंदगी में नया पैगाम दे गया।
खुशबू से भरा वो ख़त देख मुझे वो दिन याद आया
जब वो मेरे हाथों में हाथ लिए कॉलेज की गलियों में घूमा करती थी।
हर दोस्त की निगाहों से बचने की कोशिश में रहता था मैं
हर घड़ी उसके बिछुड़ने के डर से रोया करता था मैं।
लेकिन आज न तो मेरी आंखों में आंसू है
न ही मेरे मन में उसकी य़ादों का बसेरा।
हर पल खिलती कलियों सा उसका चेहरा
हंसी में खनकती एक अजीब सी मिठास
जिसे मैं आज भी महसूस कर सकता हूं।
लेकिन ये ख़त मेरे दिलोजान पर छाया हुआ है
तेरी हर एक अदा ऐसा लगता है मेरे जाम में डुबोया हुआ है।
तेरे आने की आहट आज भी सुनने को बेकरार हूं
क्या करूं तेरी य़े खत दीवार बनकर जो खड़ी है।
तू जन्नत में रहकर भी मुझे याद कर रही है
एक मैं हूं जो रोज तूझे मयखानें में य़ाद करता हूं।
तू उस डल झील के किनारे जाकर मुझे याद करती होगी
मैं यहां तूझे अपनी जामों में छलकता देख याद कर रहा हूं।
अपने शिकवे शिकन को तुम दूर कभी न करना
वरना वो कॉलेज की यादें अधूरी रह जाएगी।
वो कॉलेज की गलियां सूनी रह जाएगी।
Saturday, November 22, 2008
शब्दों के बीच जिंदगी....!

एक पल के इंतजार में चलता जा रहा हूं मैं
अपनी आवाज को सुनने की चाहत में जिए जा रहा हूं मैं।
वो रहगुजर भी मेरे इंतजार में पलकें बिछाए बैठी है
जिसके आखिरी छोड़ पर मेरी मंजिल मेरे इंतजार में बैठी है।
अपने आप को ढूंढने की फिराक में हर पल गुम होता जा रहा हूं,
अब तो तुम्हारें आने का आसरा भी नही दिखता
फिर न जाने क्यों मैं शब्दों में गुम होता जा रहा हूं।
धीरे धीरे धुंधली पड़ती जा रही है तेरी यादें
अब तो शब्द ही जीने का सहारा बनता जा रहा है।
----रजनीश कुमार
मंजिल तो मिल ही जाएगी......!

जिंदगी में बहाने ढ़ूढ़ते हैं वो लोग
जिन्हें जिंदगी खोने का डर हो।
इस भीड़ भरी दुनिया में भागते है वो लोग
जिन्हें अपनी पहचान खोने का डर हो।
अपनी खुशी की तलाश में हर पल रहते है वो लोग
जिसकी जिंदगी में हर पल गमों से वास्ता रहा है।
हर पल दूसरों के बारें में सोचते है वो लोग
जिन्हें खुद के अस्तित्व का पता नहीं होता।
फिर भी निराश नहीं होना तुम अपनी जिंदगी में
क्योंकि जब सफर है तो मंजिल मिल ही जाएगी।
----रजनीश कुमार
Friday, November 7, 2008
खुशियों की तलाश में....इंसान

खुशियों की तलाश में....इंसान
खुशियों की तलाश में दर-दर भटकता है इंसान
कहते हैं न जिसकी जिंदगी में ख्वाहिशें औऱ सपने न हो
उसकी जिंदगी बेरंग हो जाती है
लेकिन तेरी जिंदगी में ख्वाहिशें है सपने भी है
फिर भी तेरी जिंदगी न जाने क्यों बेरंग है।
इस अंधेरी-सुनसान गलियों में न जाने तू अकेला क्यों खड़ा है।
लोग पूछते है तुझसे हजारों सवाल
फिर भी तू कहानियों में क्यों जिए जा रहा है,
कभी तो पलट कर देख अपना मुखड़ा उस दरकते आइने में
जिसमें कभी तू अपनी पूरी तस्वीर देखा करता था।
आज भले ही हालात तेरे खिलाफ हो
फिर भी न जाने तू क्यो गुरूर में जिए जा रहा है।
-----रजनीश कुमार
Wednesday, November 5, 2008
तेरे इश्क में

तेरे आने की इंतजार में सूनी गलियों को तकती है मेरी आंखे
हर पल हर घड़ी तेरी आहट सुनने को बेताब रहती है मेरी रूह
मैं उस मोड़ पर खड़ा हूं जहां सामने बंद गलियां है
फिर भी उसी बंद गलियों में तेरा इंतजार किए जा रहा हूं मैं।
अंधेरी रातों में दिये के समान है तेरा चेहरा
फिर भी चांद का इंतजार किए जा रहा हूं मैं।
हर पल तेरे ख्यालों में खोया रहता है मेरा मन।
फिर भी तेरे इंतजार में क्यों जिए जा रहा हूं मैं।
----रजनीश कुमार
Saturday, November 1, 2008
इंसानी जिंदगी…

इंसानी जिंदगी…
खुशियों की तलाश में दर-दर भटकता है इंसान
कहते हैं न जिसकी जिंदगी में ख्वाहिशें औऱ सपने न हो
उसकी जिंदगी बेरंग हो जाती है
लेकिन तेरी जिंदगी में ख्वाहिशें है सपने भी है
फिर भी तेरी जिंदगी न जाने क्यों बेरंग है।
इस अंधेरी-सुनसान गलियों में न जाने तू अकेला क्यों खड़ा है।
लोग पूछते है तुझसे हजारों सवाल
फिर भी तू कहानियों में क्यों जिए जा रहा है,
कभी तो पलट कर देख अपना मुखड़ा उस दरकते आइने में
जिसमें कभी तू अपनी पूरी तस्वीर देखा करता था।
आज भले ही हालात तेरे खिलाफ हो
फिर भी न जाने तू क्यो गुरूर में जिए जा रहा है।
-----रजनीश कुमार
अब पत्रकार बनता जा रहा हूं मैं...

अब पत्रकार बनता जा रहा हूं मैं...
शब्दों के बाण की बौछार सहता जा रहा हूं मैं
सियासत की गलियों में हर बार जा रहा हूं मैं
खेल के मैदानों में बार बार जा रहा हूं मैं
नेताओं की फितरत को रोज झेलता जा रहा हूं मैं
खिलड़ियों की नफरत को रोज सहता जा रहा हूं मैं
इंसानी जिंदगी को मशीनी बनते देख रहा हूं मैं
क्योंकि अब पत्रकार बनता जा रहा हूं मैं।
Monday, October 27, 2008
क्या हुआ...तुम्हरी जिंदगी को...

हर राह को जलाती धूप के समान है तेरी जिंदगी
खामोश धड़कन की एक तलाश है तेरी जिंदगी।
क्यो ढ़ूढ़ते हो तुम अपनी परछाई को अंधेरों में
क्यों देखते हो तुम सपने दिन के उजालों में ?
क्यों वास्ता नहीं है तुम्हारा हकीकत से
क्यों दूर रहते हो तुम दिन के उजालों से ?
हर राह पर चलने की फिक्र है तुम्हें
हर ख्वाब को पूरा करने की फिक्र है तुम्हें।
फिर भी रात के अंधेरों में भटकते हो तुम,
क्यों नहीं, एक चाहत लिए, जिए जा रहे हो तुम।
तुम्हारी जिंदगी तुम्हारे लिए नासूर बनती जा रही है,
फिर भी न जाने हकीकत से क्यों दूर हो तुम।
-----रजनीश कुमार
