Tuesday, December 2, 2008

आतंकी हमलों की दास्तान

आतंकी हमलों की दास्तान

आतंकी हमलों की तस्वीर किसने देखी ?
धमाकों की गूंज किसने सुनी ?

सबने सुनी हमने सुनी आपने भी सुनी।
अगर किसी ने नहीं सुनी तो नेताओं ने नहीं सुनी।
गोली किसे लगी मातम किसके घर मना ?
आपके घर और बेगुनाहों के घर मना।

क्या कोई नेता इस हमले का शिकार हुआ ?
क्या किसी नेताओं के घर मातम मनाया गया ?
ये सवाल आज आक्रोश बनकर जनतंत्र से निकल रहा है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है गलती किसकी ?

मैं न तो नेताओं की गलती मानता हूं
ना किसी और की
गलती है हमारी और आपकी।
इन नेताओं को गद्धी पर बैठने का मौका किसने दिया ?
इन नेताओं के बेतुकी बयानबाजी करने का मौका किसने दिया ?
हमने और आपने
जो हो गया उस बात पर रोने की आदत किसकी है ?
आपकी और हमारी, न कि इन नेताओं की ।
मुंबई हमले में हताहत हुए लोगों की नींद किसने उड़ा दी
सीधा जवाब आतंकियों ने
सबने माना हमने माना और आपने भी माना।
आज मुंबई आजाद तो है लेकिन आंसू किसके बह रहे है ?

उस बेचारे ताज के जो कभी सीना ताने देश के गौरव के समान था।
भले ही ताज आजाद है लेकिन हम अभी भी गुलाम है
किसके ?
उन नेता रूपी आतंकियों के जो सफेद कपड़ों में हर जगह पाए जाते है।
जिसके लिए 5000 जानों का मतलब 5000 ही होता है
200 जानें गई तो क्या गई ?
लगता है पूरे 5000 का वादा किया था आतंकियो ने इनसे।
इनकी बयानबाजी में ऐसा ही लगता है।
आज रोते हुए ताज और नरीमन हाउस की तस्वीर आंसू बहाती ओवेरॉय होटल
क्या कभी भूल पाएगी इन घटनाओं को ?

------Rajnish Kumar

Saturday, November 29, 2008

गलियारा यादों का


गलियारा यादों का


कॉलेज से पास होते ही सभी को भूला
लेकिन एक चेहरा अभी भी याद है
काश वो चिट्ठी न आती तो वो याद भी न आती।
डाकिये की आवाज अभी भीं गूंज रही है मेरे कानों में
‘साहब जी किसी मैडम ने आपके नाम से ख़त भेजा है’
मैडम से मेरे जेहन में एक नाम ही गूंजा
क्या मां ने भी खत भेजना शुरू कर दिया।
लेकिन हाथ में लिफाफा लिए मैं ठगा सा रह गया
कि डाकिये ने तो मेरी जिंदगी में नया पैगाम दे गया।
खुशबू से भरा वो ख़त देख मुझे वो दिन याद आया
जब वो मेरे हाथों में हाथ लिए कॉलेज की गलियों में घूमा करती थी।
हर दोस्त की निगाहों से बचने की कोशिश में रहता था मैं
हर घड़ी उसके बिछुड़ने के डर से रोया करता था मैं।
लेकिन आज न तो मेरी आंखों में आंसू है
न ही मेरे मन में उसकी य़ादों का बसेरा।
हर पल खिलती कलियों सा उसका चेहरा
हंसी में खनकती एक अजीब सी मिठास
जिसे मैं आज भी महसूस कर सकता हूं।
लेकिन ये ख़त मेरे दिलोजान पर छाया हुआ है
तेरी हर एक अदा ऐसा लगता है मेरे जाम में डुबोया हुआ है।
तेरे आने की आहट आज भी सुनने को बेकरार हूं
क्या करूं तेरी य़े खत दीवार बनकर जो खड़ी है।
तू जन्नत में रहकर भी मुझे याद कर रही है
एक मैं हूं जो रोज तूझे मयखानें में य़ाद करता हूं।
तू उस डल झील के किनारे जाकर मुझे याद करती होगी
मैं यहां तूझे अपनी जामों में छलकता देख याद कर रहा हूं।
अपने शिकवे शिकन को तुम दूर कभी न करना
वरना वो कॉलेज की यादें अधूरी रह जाएगी।
वो कॉलेज की गलियां सूनी रह जाएगी।

---------रजनीश कुमार

Saturday, November 22, 2008

शब्दों के बीच जिंदगी....!


ब्दों के बी जिंगी....!


एक पल के इंतजार में चलता जा रहा हूं मैं


अपनी आवाज को सुनने की चाहत में जिए जा रहा हूं मैं।


वो रहगुजर भी मेरे इंतजार में पलकें बिछाए बैठी है


जिसके आखिरी छोड़ पर मेरी मंजिल मेरे इंतजार में बैठी है।


अपने आप को ढूंढने की फिराक में हर पल गुम होता जा रहा हूं,


अब तो तुम्हारें आने का आसरा भी नही दिखता


फिर न जाने क्यों मैं शब्दों में गुम होता जा रहा हूं।


धीरे धीरे धुंधली पड़ती जा रही है तेरी यादें


अब तो शब्द ही जीने का सहारा बनता जा रहा है।

----रजनीश कुमार

मंजिल तो मिल ही जाएगी......!


मंजिल तो मिल ही जाएगी......!




जिंदगी में बहाने ढ़ूढ़ते हैं वो लोग


जिन्हें जिंदगी खोने का डर हो।


इस भीड़ भरी दुनिया में भागते है वो लोग


जिन्हें अपनी पहचान खोने का डर हो।


अपनी खुशी की तलाश में हर पल रहते है वो लोग


जिसकी जिंदगी में हर पल गमों से वास्ता रहा है।


हर पल दूसरों के बारें में सोचते है वो लोग


जिन्हें खुद के अस्तित्व का पता नहीं होता।


फिर भी निराश नहीं होना तुम अपनी जिंदगी में


क्योंकि जब सफर है तो मंजिल मिल ही जाएगी।


----रजनीश कुमार

Friday, November 7, 2008

खुशियों की तलाश में....इंसान




खुशियों की तलाश में....इंसान

खुशियों की तलाश में दर-दर भटकता है इंसान
कहते हैं न जिसकी जिंदगी में ख्वाहिशें औऱ सपने न हो
उसकी जिंदगी बेरंग हो जाती है
लेकिन तेरी जिंदगी में ख्वाहिशें है सपने भी है
फिर भी तेरी जिंदगी न जाने क्यों बेरंग है।

इस अंधेरी-सुनसान गलियों में न जाने तू अकेला क्यों खड़ा है।
लोग पूछते है तुझसे हजारों सवाल
फिर भी तू कहानियों में क्यों जिए जा रहा है,
कभी तो पलट कर देख अपना मुखड़ा उस दरकते आइने में
जिसमें कभी तू अपनी पूरी तस्वीर देखा करता था।
आज भले ही हालात तेरे खिलाफ हो
फिर भी न जाने तू क्यो गुरूर में जिए जा रहा है।


-----रजनीश कुमार

Wednesday, November 5, 2008

तेरे इश्क में


तेरे इश्क में....



तेरे आने की इंतजार में सूनी गलियों को तकती है मेरी आंखे
हर पल हर घड़ी तेरी आहट सुनने को बेताब रहती है मेरी रूह
मैं उस मोड़ पर खड़ा हूं जहां सामने बंद गलियां है
फिर भी उसी बंद गलियों में तेरा इंतजार किए जा रहा हूं मैं।
अंधेरी रातों में दिये के समान है तेरा चेहरा
फिर भी चांद का इंतजार किए जा रहा हूं मैं।
हर पल तेरे ख्यालों में खोया रहता है मेरा मन।
फिर भी तेरे इंतजार में क्यों जिए जा रहा हूं मैं।
----रजनीश कुमार

Saturday, November 1, 2008

इंसानी जिंदगी…


इंसानी जिंदगी…

खुशियों की तलाश में दर-दर भटकता है इंसान
कहते हैं न जिसकी जिंदगी में ख्वाहिशें औऱ सपने न हो
उसकी जिंदगी बेरंग हो जाती है
लेकिन तेरी जिंदगी में ख्वाहिशें है सपने भी है
फिर भी तेरी जिंदगी न जाने क्यों बेरंग है।
इस अंधेरी-सुनसान गलियों में न जाने तू अकेला क्यों खड़ा है।
लोग पूछते है तुझसे हजारों सवाल
फिर भी तू कहानियों में क्यों जिए जा रहा है,
कभी तो पलट कर देख अपना मुखड़ा उस दरकते आइने में
जिसमें कभी तू अपनी पूरी तस्वीर देखा करता था।
आज भले ही हालात तेरे खिलाफ हो
फिर भी न जाने तू क्यो गुरूर में जिए जा रहा है।
-----रजनीश कुमार

अब पत्रकार बनता जा रहा हूं मैं...



अब पत्रकार बनता जा रहा हूं मैं...


कलम की धार पर चलता जा रहा हूं मैं
शब्दों के बाण की बौछार सहता जा रहा हूं मैं
सियासत की गलियों में हर बार जा रहा हूं मैं
खेल के मैदानों में बार बार जा रहा हूं मैं
नेताओं की फितरत को रोज झेलता जा रहा हूं मैं
खिलड़ियों की नफरत को रोज सहता जा रहा हूं मैं
इंसानी जिंदगी को मशीनी बनते देख रहा हूं मैं
क्योंकि अब पत्रकार बनता जा रहा हूं मैं।

----------रजनीश कुमार

Monday, October 27, 2008

क्या हुआ...तुम्हरी जिंदगी को...


क्या हुआ...तुम्हरी जिंदगी को...




हर राह को जलाती धूप के समान है तेरी जिंदगी
खामोश धड़कन की एक तलाश है तेरी जिंदगी।
क्यो ढ़ूढ़ते हो तुम अपनी परछाई को अंधेरों में
क्यों देखते हो तुम सपने दिन के उजालों में ?
क्यों वास्ता नहीं है तुम्हारा हकीकत से
क्यों दूर रहते हो तुम दिन के उजालों से ?
हर राह पर चलने की फिक्र है तुम्हें
हर ख्वाब को पूरा करने की फिक्र है तुम्हें।
फिर भी रात के अंधेरों में भटकते हो तुम,
क्यों नहीं, एक चाहत लिए, जिए जा रहे हो तुम।
तुम्हारी जिंदगी तुम्हारे लिए नासूर बनती जा रही है,
फिर भी न जाने हकीकत से क्यों दूर हो तुम।


-----रजनीश कुमार

Friday, October 24, 2008

जाति क्या है ?


जाति क्या है ?



जो जाती नहीं वही 'जाति' कहलाती है। हर मनुष्य की फितरत है कि वो अपनी जाति के बारें में कभी न कभी जरूर सोचता है। अगर कोई इंसान यह कहता है कि मैं 'जाति ' विशेष को नहीं मानता हूं, तो वह अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा झूठ बोल रहा है। कभी न कभी इंसानी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ जहां वो अपने स्वार्थ के बारें में ही सोचता है। तब वो अपने सारे वसूलों को ताक पर रखकर अपने और सिर्फ अपने ही बारें में या फिर लाभ के बारें में ही सोचता है। यानि इंसान भले ही कितना बड़ा ही क्यों न हो वह अपनी जाति के बारें में कभी न कभी जरूर सोचता है। तुम भी सोचना मेरे दोस्त क्योंकि मैं नहीं सोच रहा हूं।

-रजनीश कुमार

Sunday, October 19, 2008

मैं निजामों के शहर में था..मैं मुगलों के शहर में हूं...






मैं निजामों के शहर में था.......अब मैं मुगलों के शहर में हूं...







एक धुंध सा भरा सवेरा मैनें, निजामों से शहर में देखा
एक दूसरा सवेरा मैंने मुगलों के शहर में देखा।
याद आती है वो पल जिसे मैंने गुजारा था निजामों के शहर में,
जहां हर दीवारों के जर्रों में एक झलक थी दीवानों की
एक ऐसा शहर जहां मोती खुद को ही पिरोते हुए नज़र आती थी।
जिसकी बिरयानी खुद की स्वादों को चखने के लिए हरपल भूखी नजर आती थी।
जिसके सागर की लहरों में, खुद की उफान को देखने की तमन्ना लिए, पलकें बिछाए रहती थी।
जिसकी फिज़ाओं में दिखती है एक इतिहास के पन्नौं की जैसी कहानी ।
रात होती तो जगते जुगनुओं के समान होती इंसानी जिंदगी
जिसको जीने की तमन्ना लिए आज भी उगते सूरज की ओर देखता हूं मैं।
जब से मैंने छोड़ा निजामों के शहरों को
एक बूंद गिरी मेरी आंखों से, वो आंसू जो आज भी मुझे याद है
जिसे मैने देखा और वो बूढ़ी आंखों ने देखा।
जो मेरे सामने मूक बनकर, मुझे उन्ही आंखो से घूर रहा था।

आज मैं मुगलों के शहर में एक अनजाना परिंदा बनकर घूम रहा हूं
न तो तुम मुझे जानते हो न वो तारें जो मुझे दिलासा दिलाते हैं अपनी काबिलियत की।
दौड़ती जिंदगी के जैसा इस शहर में, हर कोई दिखता है अनजाना
जहां दूसरों से पूछता है, हर कोई अपना ठिकाना।
लोगों को डर है कि इस चलती भीड़ मे गुम न हो जाए..
इसी गुमनामी से डर मैं किनारे पर बैठकर देखता हूं इस भागती भीड़ को।
कितना मुश्किल है इन्सानों की जिंदगी में,
हर कोई सोच कर इसे भूलने की फिराक में रहता है।
अगर कुछ न मिला तो, खुद को ही ढ़ूढ़ने की तलाश में रहता है।
हर कदम पर मिलती मुश्किलों को नकारता जा रहा हूं,
हर बार यही सोच कर चलता जा रहा हूं मैं,
कि निज़ामों के शहर को तो मैं भूल नहीं पाया,
लेकिन मुगलों के शहर में मैं खुद को ही ढ़ूंढ नहीं पाया।
---------------रजनीश कुमार

Thursday, October 9, 2008

ऐ खुदा....मैं हूं अकेला.....!


ऐ खुदा....मैं हूं अकेला.....!



एक सूनापन है उसके बिना मेरी जिंदगी में।
काश वो लौट आती किसी को छोड़कर मेरी जिंदगी में।

अगर वो लौट आती तो आज न होता मैं इस मयखाने में।
आज तू नहीं तभी तो ढूंढ़ता हूं, मैं तुझे उस बेजुबां निशानी में।

पीने के बाद भूलना चाहता हूं, मैं उसको, फिर भी रहती है वो मेरी यादों में।
य़ाद आती है, वो दिन, जब गहरी दोस्ती थी, हम दोनों में।

जीने मरने की कसमें खाते थे, हम दोनों जाकर मंदिर-मस्जिदों में।
कभी मांगा करती थी, वो मुझे अपने मन्नतों में।

आज वो नहीं मैं हूं अधूरा, ऐ खुदा मैं भी नही रहूंगा अकेला,
तेरे इस जन्नत में।


-----रजनीश कुमार

खुदा के नाम जिंदगी…...


खुदा के नाम जिंदगी…...!



जब से तूने मेरा साथ छोड़ा, तो मेरे आंसुओं ने मेरे पलकों का साथ छोड़ दिया।
जब से तूने मेरा साथ छोड़ा, तो मेरी मुस्कुराहट ने मेरे लबों का साथ छोड़ दिया।
जब से तूने मेरा साथ छोड़ा, एक-एक करके सारी खुशियों ने मेरा साथ छोड़ दिया।
एक दिन मैंने अपनी यादों को, अपने दिल में दफन कर दिया।
तेरे जाने के बाद मैंने अपनी जिंदगी मयखानों के नाम कर दी।
तेरे जाने के बाद मैंने हर शाम, उस बेजुबां निशानी के नाम कर दी।

बहुत पीने के बाद अब मैंने अपनी जिंदगी को हकीमों और फकीरों के नाम कर दिया।
फिर भी सुकून नहीं मिला तो अब, अपनी जिंदगी मैनें खुदा के नाम कर दिया।


-----रजनीश कुमार

बदला गया......?


बदला गया......?



रिश्ते बदलते देर नहीं लगी, मगर चेहरा वही था।
रास्ते बदलते देर नहीं लगी, मगर मंजिल वही था।

मुश्किलें बदलते देर नहीं लगी, मगर हालात वही था।
ख्वाब बदलते देर नहीं लगी, मगर नींद वही था।

क्या कभी सोचा है हमने-आपने इस बारें में,
आज वक्त बदल गया, मगर सोचने का तरीका वही है।

अंजाम बदल गया, मगर अपना मकाम वही है।
हर कोई बदल गया, मगर अपना गुरूर नहीं बदला।

आज मंदिर-मस्जिद बदल गया, मगर भगवान नहीं बदला।
सब कुछ बदलते नहीं लगी, मगर आज भी समय नहीं बदला।


------रजनीश कुमार




खामोश दिल


खामोश दिल



उसकी यादों में हर पल जिया करते थे हम,
उनकी सलामती की दुआ मांगा करते थे हम।
आज वो नहीं है फिर भी वो लम्हा याद आती है,
जब उसके कूचे से बेआबरू होकर निकला करते थे हम।
वो हमें देखकर कर पलट जाया करती थी,
फिर भी खामोश दिल को तसल्ली दिया करते थे हम।

हर कोई बताता था उसकी बेवफाई की कहानी,
फिर भी उसकी यादों में खोए-खोए से रहते थे हम।
किसी की बातें नहीं सुनता एक समय रह गया मैं अकेला,
फिर भी उसकी यादों की गहराई में डूबे थे हम।

दुनिया की भीड़ में रह गया था मैं अब अकेला,फिर भी उसकी चाहत में जिए जा रहे थे हम।



--------रजनीश कुमार 'बाबा'

Sunday, October 5, 2008

तुम होती तो...ये जाम न होता..


तुम होती तो...ये जाम न होता...



कभी कभी दिखती थी वो मुझे शामों में
मैं तो खोया रहता था उसकी यादों के जामों में।
कर नहीं पाता अपने मासूम मुहब्बत का इजहार इन फसानों में,
हर पल दिखती है उसकी तस्वीर इन जमानों में।
आवाज है जख्मी फिर भी गाता हूं उसे अपने गानों में,
तकदीर की लकीरों को ढूंढता हूं अपने हाथों में,
दर-दर भटकता हूं तेरे प्यार में,
फिर भी दर्द न होता इन पांवों में।
अगर तू साथ होती तो आज न होता मैं इस मयखानें में।
अगर तू साथ होती तो आज न होता ये जाम मेरे हाथों में।

------रजनीश कुमार


Saturday, October 4, 2008

दाखिला लेने की चाहत




दाखिला लेने की चाहत



याद है मुझे कॉलेज के बाद का वो दिन,
आगे की पढ़ाई जारी ऱखने का टेंशन।
हर कोई दाखिला ले रहा था एम.ए. और एम.बी.ए. में,
मुझे तो दाखिला चाहिए था सिर्फ पत्रकारिता में।
हर कॉलेज, हर विश्व विघालय का चक्कर लगाता था मैं,
वो दिल्ली में गर्मी का दिन जून के महीने में,
वो दाखिला लेने की चाहत मजबूत बनाती थी मुझे।
फार्म खरीदने के लिए लगती थी लंबी कतार,
मगर मजबूत किस्म के लड़को की नहीं होती थी कोई कतार।
आखिर किसी तरह नंबर आता फार्म खरीदने के लिए पैसे बढ़ाता,
काउंटर वाला भी खुदरे पैसे के लिए सभी को तड़पाता।
पर वो दाखिला लेने की चाहत मजबूत बनाती थी मुझे।
फार्म खरीदकर पेड़ों के नीचे बैठता था मैं,
मगर हवा के गर्म थपेड़ों से घबराता था मैं।
वो गर्म हवा हमें एहसास दिलाती थी, अपने काबिलियत की,
वो गर्म हवा की चुभन से सिहर उठता था मैं।
सोचता था कितनी मुश्किलें हैं हमारी जिंदगी में।
मगर वो दाखिला लेने की चाहत मजबूत बनाती थी मुझे।
फार्म खरीदकर घर जाने के लिए बस पकड़ता था,
खिड़की के पास खाली सीट देखकर जल्दी से बैठता था।
जब बस चलती फिर वही गर्म हवा चेहरे से टकराती,
फिर वही मजबूरियां हमें याद आती ।
मगर वो दाखिला लेने की चाहत मजबूत बनाती थी मुझे।


-----रजनीश कुमार

Thursday, October 2, 2008

क्यों ?


क्यों ?

हम है, आज हैं, कल नहीं होंगे,
क्या है, क्यों है, पता नहीं कब होंगे ?
मौत एक अंधेरा है, जिंदगी सवेरा है,
फिर भी जिंदगी साथ क्यों नहीं देती।
एक मौत है पता नहीं साथ क्यों नहीं छोड़ती?
एक जिंदगी है जो हमेशा दगा दे जाती है,
फिर भी मनुष्य को जीने की चाहत क्यों हो जाती है?
मौत कभी बेवफा नहीं होती,हमेशा समय पे ही आती है,
फिर भी मनुष्य न जाने मौत से क्यों घबराता है?

-------रजनीश कुमार