Thursday, June 11, 2009

।।तू ही बता ! ।।





सपनों कि मंजिल को
तू जा रही है छोड़ के।
तू मुड़ के देख यहां पे
तू किसको जा रही है छोड़ के।
वो वादें वो कसमें
वो इरादें वो बातें
वो तन्हाई भरी रातें
तू याद कर फिर सोच ले
तू जा रही है किसको छोड़ के।
हर गम के बसेरों में तेरा साथ मैने पाया है
आज हू मैं अकेला
जा रही है तू मझे छोड़ के।
यादों की दीवारों पे लिखा है नाम तेरा
वो झांकती झरोखों से तेरी आंखे
किसे भूलूं तू ही बता
किधर को जाऊं तू ही बता।

कातिब & कहानीबाज
रजनीश बाबा मेहता 

Monday, March 30, 2009

सारी बंदिशों को तू तोड़ दे


ऐ मुसाफिर....तोड़ दे बंदिशों को।


चलते हुए मुसाफिर तू बता क्या है तेरी रज़ा

क्यों धूप छांव में चल रहा तू

क्यों अपनी मंजिल को मुश्किलों में डाल रहा है तू।

हर उन बंदिशों को तू तोड़ दे

हर उन रास्तों को तू नाप ले

जिसपर चलने की हरपल तेरी मंशा रही है।

ऐ मुसाफिर तू न सोच मेरे बारें में

जिंदगी एक खेल है जहां सोचना है तूझे अपने बारें में।

हर कदम पर हर मोड़ पर तू अपने आपको बचा

सामने वालों को अपनी कमजोरियों को न तू बता।

सच झूठ के इस दलदल में कभी न धंसना।

उस अन्त के शुरूआत के बारें में तू सोच

जिस शुरूआत के अन्त पर तू खड़ा है।

---------रजनीश कुमार

Friday, March 20, 2009

वो फिर मुझसे बातें की


पुरानी पहचान.....या.......कुछ और.....?

हर रात की तन्हाईयों में जीने वाली
आज वो मुझसे हंस कर बातें की।

फैशन में लिपटी वो छरहरी काया
तिरछी नज़रों से निगाहें भी मिलाई।

वर्षों बाद प्यार भरी बातें सुनकर ऐसा लगा
मानो सारे जहां की खुशियां बिखेर दी उसने।

हाथों की लकीरों में देखा था कभी मैने उसे
एक समय वो रूठ कर गई थी मुझसे।

लेकिन आज मै मना लाया उसे।
कब तक चलेगा ये सिलसिला

य़े देखना है मुझे और उसे।

----रजनीश कुमार

Wednesday, March 18, 2009

अपना एहसास


बस एक नज़्म.......!


एक नज़्म कहना है चाहता हूं मैं आपसे
अपने प्यार का पहला पन्ना सुनाना चाहता हूं आपसे।
दिल की बेरूखी तुम मुझे यूं न दिखाओ
अपने पहलू में बिठाकर अश्कों में देखना चाहता हूं आपको।

मिलनसागर की गीतों के सहारें जो पल गुजारा है मैंने
वो गीतों की मालाएं भेंट करना चाहता हूं आपको।
अपने दामन को बेदाग रखा जमाने से बचा के
उसी दामन की छांव में आसरा चाहता हूं मैं आपसे।

अपने निग़ाहों से तुम मुझे दूर न करना
वरना वो नज़्म भूल जाऊंगा
जो सुनाना चाहता था मैं आपसे।
-----रजनीश कुमार

Tuesday, March 17, 2009

नेता से रिश्ता


नेता से रिश्ता....



हर मोड़ से बड़ा है रास्ता
हर रास्तों से बड़ा है रिश्ता।
हर किसी का नहीं है इससे वास्ता।
राजनीति में नहीं होता कोई रिश्ता
मां बीजेपी में तो बेटा का होता कांग्रेस से नाता
हर घड़ी हर क्षण पलटवार के फिराक में रहता है
तभी तो लोग कहते है तू है सबसे बड़ा नेता।
चुनाव आते ही अभिनेता भी बन जाता है नेता
मंच पर चढ़कर पार्टी के सुर में सुर मिलाता है
मौका आने पर गिरगिट की तरह रंग भी बदल लेता है नेता।
हर पार्टी से जिसका है नाता
वो है हमारी देश की बेचारी जनता


--------रजनीश कुमार

Wednesday, February 11, 2009

अंधेरी रात.....?


अंधेरी रात.....?
देखो रात फिर घिर के आई है घनघोर अंधेरा लाई है....
दिल ने मेरा... आज चांद चुरा के लाया है.....
जुगनूओं की जगमग ने आज मुझे रास्ता दिखाया है...
चमकती पेड़ की टहनियों पर दिख रही है ओस की बूदें..
जैसे रात की मालाएं लिए है...ओस की बूंदें...
सूने आसमान की ओर तकती है...मेरी आंखे..
काली घनघोर रातें घूम रही है ...फैलाएं अपनी बाहें
रात में जगमग तारों की कहानी लिए
हवाओं ने नई दिशाओं में उड़ान भरी है...
इन अंधेरी रातों में रास्ता भी मुड़ना भूल गई..
चमकती बिजलियों की गड़गड़ाहट में
बारिश भी बरसना भूल गई....
खेतों की रखवाली करता वो किसना...
इन अंधेरी रातों में सोना भूल गया...
खेतों की पगडंडियों के बीच सन्नाटे में...
कोई चलना भूल गया.....
---- रजनीश कुमार

Wednesday, January 21, 2009

इंतजार औऱ मैं....!


इंतजार औऱ मैं....!


तेरे आने की जिद लिए बैठा हूं मैं...
तेरे यादों में जीने के लिए बैठा हूं मैं...
सूनी राह को तकती है हरपल मेरी आंखें..
वो धूप की छांवों में तेरा इंतजार लिए बैठा हूं..
अपने आप की तलाश में भटकता हुआ
तेरे करीब आने की फिराक में बैठा हूं मैं....
लोंगो की नसीहतों को नकारता जा रहा हूं ..
तुझे बेपर्दा होकर जाते देख रहा हूं मैं...
काश तू एक नजर भर देख लेती मेरी निगाहों को...
तो यूं न तेरे इंतजार में बैठा होता मैं...
-----रजनीश कुमार

Tuesday, January 20, 2009

भूखा बालक


भूखा बालक


चांदनी चौक के चौराहे पर बेचारे की तरह खड़ा था वो
लिए हाथ में काला पेपर औऱ पैरों में सफेद जूते
जून की चिलचिलाती गर्मी को महसूस कर रहा था वो

भरी भीड़ में बैचैन सा कभी चलता
तो कभी रूक कर सामने वाले को निहारता था वो।
उसके चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था
मानों वर्षों से भूखा है वो.....

हाथ की छोटी छोटी उंगलियों को घुमाते हुए...
खुद को परेशान कर रहा था वो....
जब भी भूख लगती एक आवाज लगाता खुद को..
फिर थोड़ी देर बाद अपने आप को शांत करता नज़र आता वो...
रात घिरने को आई स्ट्रीट लाइट भी जल उठी...
फिर अपने घर की ओऱ जा रहा था वो...
रास्ते में इधर उधर देखता.....
शायद खाने को कुछ पा लेता वो.....
घर पहुंचने को आया फिर भी भूखा था….
चेहरे की परेशानी से भागने की फिराक में था वो...
घर पहुंच कर लालटेन की रोशनी में सोचने लगा था वो....
मां की आवाज आयी बेटा सोने का वक्त हो गया...
नन्ही उंगलियों से रोशनी को धीमा करके....
बिस्तर की तलाश में चल पड़ा था वो।

-----रजनीश कुमार

Sunday, January 4, 2009

है जवाब


है जवाब.............?


उस रात की परछाई आज भी याद है मुझे
मैं अपने नीदों के ख्यालों में खोया था...
वो ओस की बूंदे मेरे चेहरे से टकराती...
फिर अपने में ही गुम होकर वो कहीं खो जाती...

रात के जुगनुओं ने भी रची है एक अलग कहानी...
ओस की बूंदों से प्यास मिटाकर बचा रही है अपनी निशानी...
हर पल नए ख्यालों को बुनता जा रहा हूं मैं...
उस राह की मोड़ पर मुड़ना भूल गया हूं मैं....

इन सुनसान मिट्टी भरी गलियों में अकेला चलता जा रहा हूं मैं...
हर कदम पर सवालों से परेशान होता जा रहा हूं मैं..
क्या अपने रास्तों से भटक गया हूं मैं.... ?
क्या एक चेहरे की याद में दूर तलक आ गया हूं मैं ?
-------रजनीश कुमार

Thursday, January 1, 2009

मेरी जिंदगी, तुम्हारी जिंदगी


मेरी जिंदगी, तुम्हारी जिंदगी



जिंदगी ,जिंदगी ,जिंदगी
हर मोड़ पर खड़ी है एक नई जिंदगी..
खुशियों को हर पल तलाशती है जिंदगी
गमों से पार पाना चाहती है जिंदगी...
अंधेरी सुनसान बंद गलियों में खड़ी है हमारी जिंदगी..
वक्त ने दिखाया है आज एक नया आईना...
अंधेरों से निकलकर आज आजाद हुई है हमारी जिंदगी.....
आंखे उठाकर आसमां की ओर देख रहा हूं मैं...
हर एक तारें में दिख रही है हमारी जिंदगी....
पत्थरों की प्यास में झलकती है हमारी जिंदगी....
हर दीवार के जर्रे में है एक जिंदगी....
एक राह पर दौड़ रही है दो जिंदगी.....
फिर भी सोचने को मजबूर है हमारी जिंदगी...
फिर भी रटते रहते हैं हम...
जिंदगी जिंदगी जिंदगी....
हमारी जिंदगी, तुम्हारी जिंदगी...
-- रजनीश कुमार

Tuesday, December 2, 2008

आतंकी हमलों की दास्तान

आतंकी हमलों की दास्तान

आतंकी हमलों की तस्वीर किसने देखी ?
धमाकों की गूंज किसने सुनी ?

सबने सुनी हमने सुनी आपने भी सुनी।
अगर किसी ने नहीं सुनी तो नेताओं ने नहीं सुनी।
गोली किसे लगी मातम किसके घर मना ?
आपके घर और बेगुनाहों के घर मना।

क्या कोई नेता इस हमले का शिकार हुआ ?
क्या किसी नेताओं के घर मातम मनाया गया ?
ये सवाल आज आक्रोश बनकर जनतंत्र से निकल रहा है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है गलती किसकी ?

मैं न तो नेताओं की गलती मानता हूं
ना किसी और की
गलती है हमारी और आपकी।
इन नेताओं को गद्धी पर बैठने का मौका किसने दिया ?
इन नेताओं के बेतुकी बयानबाजी करने का मौका किसने दिया ?
हमने और आपने
जो हो गया उस बात पर रोने की आदत किसकी है ?
आपकी और हमारी, न कि इन नेताओं की ।
मुंबई हमले में हताहत हुए लोगों की नींद किसने उड़ा दी
सीधा जवाब आतंकियों ने
सबने माना हमने माना और आपने भी माना।
आज मुंबई आजाद तो है लेकिन आंसू किसके बह रहे है ?

उस बेचारे ताज के जो कभी सीना ताने देश के गौरव के समान था।
भले ही ताज आजाद है लेकिन हम अभी भी गुलाम है
किसके ?
उन नेता रूपी आतंकियों के जो सफेद कपड़ों में हर जगह पाए जाते है।
जिसके लिए 5000 जानों का मतलब 5000 ही होता है
200 जानें गई तो क्या गई ?
लगता है पूरे 5000 का वादा किया था आतंकियो ने इनसे।
इनकी बयानबाजी में ऐसा ही लगता है।
आज रोते हुए ताज और नरीमन हाउस की तस्वीर आंसू बहाती ओवेरॉय होटल
क्या कभी भूल पाएगी इन घटनाओं को ?

------Rajnish Kumar

Saturday, November 29, 2008

गलियारा यादों का


गलियारा यादों का


कॉलेज से पास होते ही सभी को भूला
लेकिन एक चेहरा अभी भी याद है
काश वो चिट्ठी न आती तो वो याद भी न आती।
डाकिये की आवाज अभी भीं गूंज रही है मेरे कानों में
‘साहब जी किसी मैडम ने आपके नाम से ख़त भेजा है’
मैडम से मेरे जेहन में एक नाम ही गूंजा
क्या मां ने भी खत भेजना शुरू कर दिया।
लेकिन हाथ में लिफाफा लिए मैं ठगा सा रह गया
कि डाकिये ने तो मेरी जिंदगी में नया पैगाम दे गया।
खुशबू से भरा वो ख़त देख मुझे वो दिन याद आया
जब वो मेरे हाथों में हाथ लिए कॉलेज की गलियों में घूमा करती थी।
हर दोस्त की निगाहों से बचने की कोशिश में रहता था मैं
हर घड़ी उसके बिछुड़ने के डर से रोया करता था मैं।
लेकिन आज न तो मेरी आंखों में आंसू है
न ही मेरे मन में उसकी य़ादों का बसेरा।
हर पल खिलती कलियों सा उसका चेहरा
हंसी में खनकती एक अजीब सी मिठास
जिसे मैं आज भी महसूस कर सकता हूं।
लेकिन ये ख़त मेरे दिलोजान पर छाया हुआ है
तेरी हर एक अदा ऐसा लगता है मेरे जाम में डुबोया हुआ है।
तेरे आने की आहट आज भी सुनने को बेकरार हूं
क्या करूं तेरी य़े खत दीवार बनकर जो खड़ी है।
तू जन्नत में रहकर भी मुझे याद कर रही है
एक मैं हूं जो रोज तूझे मयखानें में य़ाद करता हूं।
तू उस डल झील के किनारे जाकर मुझे याद करती होगी
मैं यहां तूझे अपनी जामों में छलकता देख याद कर रहा हूं।
अपने शिकवे शिकन को तुम दूर कभी न करना
वरना वो कॉलेज की यादें अधूरी रह जाएगी।
वो कॉलेज की गलियां सूनी रह जाएगी।

---------रजनीश कुमार

Saturday, November 22, 2008

शब्दों के बीच जिंदगी....!


ब्दों के बी जिंगी....!


एक पल के इंतजार में चलता जा रहा हूं मैं


अपनी आवाज को सुनने की चाहत में जिए जा रहा हूं मैं।


वो रहगुजर भी मेरे इंतजार में पलकें बिछाए बैठी है


जिसके आखिरी छोड़ पर मेरी मंजिल मेरे इंतजार में बैठी है।


अपने आप को ढूंढने की फिराक में हर पल गुम होता जा रहा हूं,


अब तो तुम्हारें आने का आसरा भी नही दिखता


फिर न जाने क्यों मैं शब्दों में गुम होता जा रहा हूं।


धीरे धीरे धुंधली पड़ती जा रही है तेरी यादें


अब तो शब्द ही जीने का सहारा बनता जा रहा है।

----रजनीश कुमार

मंजिल तो मिल ही जाएगी......!


मंजिल तो मिल ही जाएगी......!




जिंदगी में बहाने ढ़ूढ़ते हैं वो लोग


जिन्हें जिंदगी खोने का डर हो।


इस भीड़ भरी दुनिया में भागते है वो लोग


जिन्हें अपनी पहचान खोने का डर हो।


अपनी खुशी की तलाश में हर पल रहते है वो लोग


जिसकी जिंदगी में हर पल गमों से वास्ता रहा है।


हर पल दूसरों के बारें में सोचते है वो लोग


जिन्हें खुद के अस्तित्व का पता नहीं होता।


फिर भी निराश नहीं होना तुम अपनी जिंदगी में


क्योंकि जब सफर है तो मंजिल मिल ही जाएगी।


----रजनीश कुमार

Friday, November 7, 2008

खुशियों की तलाश में....इंसान




खुशियों की तलाश में....इंसान

खुशियों की तलाश में दर-दर भटकता है इंसान
कहते हैं न जिसकी जिंदगी में ख्वाहिशें औऱ सपने न हो
उसकी जिंदगी बेरंग हो जाती है
लेकिन तेरी जिंदगी में ख्वाहिशें है सपने भी है
फिर भी तेरी जिंदगी न जाने क्यों बेरंग है।

इस अंधेरी-सुनसान गलियों में न जाने तू अकेला क्यों खड़ा है।
लोग पूछते है तुझसे हजारों सवाल
फिर भी तू कहानियों में क्यों जिए जा रहा है,
कभी तो पलट कर देख अपना मुखड़ा उस दरकते आइने में
जिसमें कभी तू अपनी पूरी तस्वीर देखा करता था।
आज भले ही हालात तेरे खिलाफ हो
फिर भी न जाने तू क्यो गुरूर में जिए जा रहा है।


-----रजनीश कुमार

Wednesday, November 5, 2008

तेरे इश्क में


तेरे इश्क में....



तेरे आने की इंतजार में सूनी गलियों को तकती है मेरी आंखे
हर पल हर घड़ी तेरी आहट सुनने को बेताब रहती है मेरी रूह
मैं उस मोड़ पर खड़ा हूं जहां सामने बंद गलियां है
फिर भी उसी बंद गलियों में तेरा इंतजार किए जा रहा हूं मैं।
अंधेरी रातों में दिये के समान है तेरा चेहरा
फिर भी चांद का इंतजार किए जा रहा हूं मैं।
हर पल तेरे ख्यालों में खोया रहता है मेरा मन।
फिर भी तेरे इंतजार में क्यों जिए जा रहा हूं मैं।
----रजनीश कुमार

Saturday, November 1, 2008

इंसानी जिंदगी…


इंसानी जिंदगी…

खुशियों की तलाश में दर-दर भटकता है इंसान
कहते हैं न जिसकी जिंदगी में ख्वाहिशें औऱ सपने न हो
उसकी जिंदगी बेरंग हो जाती है
लेकिन तेरी जिंदगी में ख्वाहिशें है सपने भी है
फिर भी तेरी जिंदगी न जाने क्यों बेरंग है।
इस अंधेरी-सुनसान गलियों में न जाने तू अकेला क्यों खड़ा है।
लोग पूछते है तुझसे हजारों सवाल
फिर भी तू कहानियों में क्यों जिए जा रहा है,
कभी तो पलट कर देख अपना मुखड़ा उस दरकते आइने में
जिसमें कभी तू अपनी पूरी तस्वीर देखा करता था।
आज भले ही हालात तेरे खिलाफ हो
फिर भी न जाने तू क्यो गुरूर में जिए जा रहा है।
-----रजनीश कुमार

अब पत्रकार बनता जा रहा हूं मैं...



अब पत्रकार बनता जा रहा हूं मैं...


कलम की धार पर चलता जा रहा हूं मैं
शब्दों के बाण की बौछार सहता जा रहा हूं मैं
सियासत की गलियों में हर बार जा रहा हूं मैं
खेल के मैदानों में बार बार जा रहा हूं मैं
नेताओं की फितरत को रोज झेलता जा रहा हूं मैं
खिलड़ियों की नफरत को रोज सहता जा रहा हूं मैं
इंसानी जिंदगी को मशीनी बनते देख रहा हूं मैं
क्योंकि अब पत्रकार बनता जा रहा हूं मैं।

----------रजनीश कुमार